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सोमवार, 11 मई 2026

4739 तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन ......

सादर अभिवादन

मातृ दिवस कल सम्पन्न हुआ
पर रचनाएं हफ्तों आती रहेंगी
और माँ तो ताजिंदगी साथ नहीं छोड़ती है

रचनाएं




तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन,
कबहूँ-कबहूँ लागेला थोड़ा हिसाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल उठेला जिनगी के मौसम,
छँट गइल अन्हेरा काहे कि रात महताबी हौ।




क्या इस बार भी  
खूबसूरत आभासी गुलदस्ते, 
तरह-तरह के आभासी केक 
और वचना भरे शुभकामना सन्देश
भेज कर मना लोगे तुम
‘मदर्स डे’,
और खुश हो जाओगे  





कोई चाहता है 
हम पूर्ण विकसित हों 
इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम 
सब के साथ पूर्णता की चाह भी 
भर देता है !! 





उस दिन के बाद मणिकर्णिका पर 'कालू' कभी नहीं दिखा। पर लोग कहते हैं अमावस की रात जब कोई अकेला घाट पर रोता है, तो हवा में हल्की सी आवाज़ आती है —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे...

और रोने वाले को लगता है जैसे किसी ठंडे हाथ ने नहीं, किसी माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।

कहानी का सार: मंत्र में बिजली नहीं, ममता होती है। पिशाच की सबसे बड़ी प्यास खून नहीं, स्पर्श थी। और जब इंसान डर कर भागने की जगह गले लगा ले, तभी निर्वाण होता है।




आँखों के नम होनें का ,सबब ना पूछो दोस्तों 
यहाँ तो ये किस्सा आम हो गया है
आती हैं खबरें अखबारों में 
एक लाइनों में ,जिंदगी की कीमत 
हो जाती है बयाँ ..... 





“बब्बन भाई, मैं नहीं, आकाश जा रहे हैं.” प्रिया ने आकाश की ओर इशारा करते हुए कहा,
“ये मेरे मित्र हैं, जयपुर से आए हैं. इन्हें विक्रोली में अपनी कंपनी के गेस्ट हाउस जाना है.
आप छोड़कर आइएगा.”

“बिलकुल, दीदी.”

आकाश, प्रिया और आटोरिक्शा चालक के बीच के वार्तालाप को चकित होकर देख रहा था.
उसके विस्मय को देखकर प्रिया ने आकाश को कहा, “आकाश, बब्बन भाई आटोरिक्शा
चालक यूनियन के कार्यकर्ता हैं. ये तुम्हें ठीक गेस्ट हाउस ले जाकर छोड़ेंगे.”

आकाश के चेहरे से विस्मय अब कम नहीं हुआ था. वह प्रिया के व्यक्तित्व के
विस्तार को देखते हुए ही आटोरिक्शा में बैठ गया.


सादर समर्पित
सादर वंदन

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