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रविवार, 10 मई 2026

4738...माँ खुल कर मुस्काई होगी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया रेणु बाला जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

मातृ दिवस: आस की गूँज

पहला तारा

माँ सिखला रही है

गाँठ खोलना

*****

माँ के लिए दो कविताएँ

जब माँ- बेटी ने मिल कर
कुछ रातें संग बिताई होंगी
जी भर गुरबत कर बेटी से
माँ खुल कर मुस्काई होगी।

*****

धूप और छाँव के बीच

और तब लगता है

दुनिया में उतरना नहीं,

उतरने का अभिनय करना भर ही

अब शेष रह गया है।

*****

माँ 

मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है

सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली

माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची

तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु

अभिलाषा मन की,

*****

भीतरी मोर्चा

19 मई को सुबह आकाश मुंबई पहुँच रहा था. प्रिया ने उसे अपने यहाँ आने को कहा था लेकिन उसने मना कर दिया. आकाश ने मना करते समय जो बात कही थी, उसकी गूंज उसके ज़ेहन से नहीं जा रही थी. "यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके." फिर भी आकाश के मुंबई आते ही उससे मिलना चाहती थी.

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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