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शनिवार, 24 जनवरी 2026

4632 ..सब तो हो ही रहा है न, अब भी तुम्हारे बिना भी

सादर अभिवादन 

लगभग एक महीने के अंतराल के बाद
सोच रहा था कोई चमत्कार होगा
वो आकर प्रस्तुति लगा जाएगा
पर जादू तो सिनेमा में ही होता है
यहां तो काम करना पड़ता है
चलो शुरू हो जाओ...


.... सब तो हो ही रहा है न अब भी
तुम्हारे बिना भी
नहीं रुकी है यह दुनिया किसी बिना भी
हमे ही यह अहम और वहम होता है 
कि हम ही हैं सब कुछ
दिया जाता है इतना दबाव, प्रभाव और तनाव
लगता है चौबीस घंटे हम न रहें तो सब थम जाएगा..
अपने आप पर ही आने लगता था गुस्सा
क्या जरूरत थी बीमार होने की
अब मन की सोच यही है कितना 
सारा सुकून खोया है मैंने
और बदले मे पाया बस एक वाक्य
"आपकी जगह कोई नहीं ले सकता"



बस तकलीफ मुझे हो रही थी, 
तुम्हें आराम जो देना था सो आपको
गया जी के गद्दे पर आसीन कराया और 
एक घड़ा जल प्रयागराज  
से लाकर आपके बगल में रखा
आराम से रहिए..




यह बेचैनी ऐसी है
कि इससे पार निकलना आसान नहीं।
यह खुद बेचैनी का शहर है।
यह बगुलों का शहर है।

यहाँ शक पर शक छाया है,
यक़ीन के नाम पर भी भ्रम है।
यह भ्रम भी एक और भ्रम है।
यह बगुलों का शहर है।




ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !




निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, 

इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, 
पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    




इन वासंती हवाओं के टूटे पत्ते
बुलाते रास्ते पर आज भी मिल जायेंगे 
उसी ताजगी के एहसास को लिए भोर में 
अपनी महक को घोलते हुए कलियों के पहरुए
वे कपोलें नव पिछली बार देखे थे 





पौष-माघ की ठिठुरन में
है गरम रजाई माँ
तपती जेठ दुपहरी में
ठंडी अमराई माँ ।





कोई नहीं जानता 
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है 
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,





उसी रात उसे अपने बचपन की याद आ गई—दुकानों वाली गली, सुबह का कोहरा, और एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाने वाला बुजुर्ग दंपती। लोग उन्हें “चाय वाली अम्मा” और “सुनार बाबा” कहते थे। वे खून के रिश्तों से नहीं, मगर मोहब्बत से सबके अपने बन गए थे। उनका कोई अपना नहीं आता था, फिर भी पूरा कस्बा उनका परिवार था। एक दिन चाय वाली अम्मा चली गई, और ठीक एक महीने बाद सुनार बाबा भी। तब कस्बे ने ही उनका अंतिम संस्कार किया, उनकी याद में रोया। उस छोटी लड़की ने पहली बार समझा था—खून का रिश्ता ही सब कुछ नहीं होता। सुबह होते ही वह युवती फिर उसी जगह गई, बूढ़े बाबा को खोजने



गरीब के हिस्से में आया तो
सिर्फ़ इंतज़ार, सिर्फ़ संघर्ष,
और फिर वही उम्मीद,
जो रोज़ शाम को थककर
उसकी पलकों पर सो जाती है।

जीवन के कितने ही बसंत
इंतज़ार में बीत गए,
पर उसके जीवन में
अब तक बसंत नहीं आया।


आज बस
सादर वंदन

काफी दिनों के बाद प्रस्तुति लगा रहा हूँ
कुछ भूला-भटका सा लग रहा है
हो सकता है कोई प्रस्तुति दुबारा लग गई हो
तो भी पढ़ लीजियेगा

अगर कसमें सच्ची होती हो 
तो तो सबसे पहले खुदा मरता


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