सादर अभिवादन
लीजिए आज नवंबर भी बिदा हो रहा उंगलियों से जानिए
ठीक इकतीस दिन बाद हम 2026 में होंगे
कुछ रचनाएं मिली है देखिए...
रातों जागकर भी कोई किताब रास न आई,
ठोकरें खूब लगीं, सफलता पास न आई।
शाला में पिछड़ा, मिला असफलता का उपहार,
अपनों की आँखों में देखी, निराशा और हार।
मेरी कूची के सब रंग फीके
मेरे गीतों के बोल अधूरे
हर क्षण हर पल मिलती खुशी अधूरी
तुम से ये कैसी जन्म जन्म की दूरी।।
लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अंताक्षरी खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवाई गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।
अब जान-बूझकर
छोड़ देता हूँ एक न एक त्रुटि—
ताकि वो डाँटें,
बुदबुदाएँ,
और फिर होंठों की कोरों पर
हल्की-सी जीत की मुस्कान लिये
चलती फिरें पूरे घर में।
ऐसे ही होते हैं रिश्ते,
पकड़ लेते हैं कसकर,
नहीं मिलता इनसे
आसानी से छुटकारा,
नहीं होती रिश्तों की
कोई लाइफ़लॉन्ग वारंटी।
आदिवासी बच्चियां
ठंड में भी कम
वस्त्र में आदिवासी बच्चियां
टहनियां बीन लाती हैं बगीचे से
खाना पकाने के लिए
वह ईंधन की व्यवस्था करती हैं
सहती हैं हर मार प्रकृति की
फिर भी नहीं टूटती हैं बच्चियां
आज बस
कल फिर


