सादर नमस्कार
अक्टूबर जाते जाते कुछ अलग सा ही करना चाह रहा है
होइहें वही जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढ़ावे साखा
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दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्रोफेसर आलोक राय ने, जो ऑर्सीनी को दशकों से जानते हैं, कहा, ‘वे हिंदी सीखने भारत आईं और उन्हें इस देश से प्यार हो गया। उनका पहला बड़ा काम हिंदी के सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण पर था, और फिर उन्होंने उससे भी आगे बढ़कर काम किया। उन्होंने पुराने ग्रंथों पर विस्तृत पाठ्य-लेखन किया है और वे एक बहुत ही बारीकी से लिखी जाने वाली पाठ्य-विद्या हैं। वह उर्दू की भी विद्वान हैं... और उन्होंने फ़ारसी का अध्ययन भी किया है।’
थाल सजाओ
यम द्वितीया पर्व
टीका लगाओ
उज्जवल हो
यशस्वी, दीर्घायु हो
जीवन भैया
ह्रदय शुद्ध हो
भाव विमल हों
मन भी खाली-खाली अपना
जीवन जैसे कोई लीला
या फिर भोर काल का सपना !
और जब मौन भी
अपने अर्थ खोने लगे,
देह की अग्नि में
अपने ही विचारों का कोयला डालना —
और थोड़ा और धधकना,
जैसे हवन-कुंड में
शाम की आँच सुलगती हो।
आज बस
भाई रविंद्र जी का भतीजा अस्पताल में भर्ती है
अभी समाचार मिला है
ईश्वर शीघ्र स्वस्थ करें
सादर



