सादर अभिवादन
व्यंग्य कोई कांटा नहीं,
कलम कोई नश्तर नहीं
व्यंग्य कोई कांटा नहीं-
फूल के चुभो दूं ,
कलम कोई नश्तर नहीं-
खून में डूबो दूं
दिल कोई कागज नहीं-
लिखूं और फाडूं
साहित्य कोई घरौंदा नहीं-
खेलूं और बिगाडूं!
-गोपाल प्राद व्यास
आज की रचनाएं
सराहते हैं अपना भाग्य
कि प्रयागराज में उनसे
मिलने धरा पर आये हैं स्वयं शंभू,
नत मस्तक हो अपार श्रद्धा से
दोहराते हैं वे भी मन ही मन
जय महा कुम्भ, जय-जय भोले
उनके आने का आभास तो शुक्रवार सुबह ही हो गया था और शाम तक तो उपस्थिति भी दर्ज हो चुकी थी। पर नौकरी-पेशा लोगों की कुछ मजबूरियां होती हैं, पर इसका अहसास उन्हें क्यूंकर हो सकता था ! उन्हें तो सिर्फ अपनी खातिरदारी और मेहमानवाजी से मतलब था ! उस पर, उनके आ पहुंचने की जानकारी के बावजूद, मेरे शनिवार को काम पर चले जाने को उन्होंने अपनी उपेक्षा के रूप में ले लिया, और नाराज हो गए ! वैसे उनका नाराज होना बनता भी था इसलिए जायज भी था ! पर मेरी तो मति ही मारी हुई थी !
आज सुबह से ही ठंडी हवा चल रही है जो ‘तौकते’ चक्रवाती तूफ़ान के कारण है। यह तूफ़ान अरब सागर की ओर बढ़ रहा है। चार दिन बाद गुजरात पहुँचेगा। कल भारी वर्षा होने की आशंका है। कल से महरी नहीं आएगी, उसके गाँव में कोरोना के कई केस हैं, न आना ही बेहतर है। कर्नाटक में स्थिति में सुधार नहीं आ रहा है।
उतरायणी है पर्व हमारा,
समता को दर्शाता है।
कहीं मनाते लोहड़ी इस दिन,
कोई बिहू मनाता है।
महास्नान गंगासागर में,
जो उतरायणी को करता।
जप,तप,दान और तर्पण कर,
मानस मन उज्जवल होता।
देवालय में लगते मेले,
तिल, गुड़ के पकवान बनाते।
इसी तरह हो मीठा जीवन,
आपस में सब मिलजुल गाते।
आटे में गुड़ मिला गूंथकर,
घुघुते और खजूर बनाते।
इन्हें पिरोकर माला में फिर,
बच्चे काले कौवा गाते।
अच्छे की यही परेशानी हैं
कि वह सभी से
अच्छे की उम्मीद करता हैं
सबको अच्छा देखना
चाहता हैं
सभी को अच्छा बनाने की
कोशिश में लगे रहता हैं
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आज यशोदा को आना था पर
वो अचानक व्हेन्टिलेटर से बुलावा आ गया
खैर जो भी हो
आज यशोदा को आना था पर
वो अचानक व्हेन्टिलेटर से बुलावा आ गया
खैर जो भी हो
आज बस
वंदन


