सादर अभिवादन
खबर कोई खास नहीं
जनवरी माह को 18 वां दिन
वसंत आगमन भीनी सी
उत्तेजित हवाएं चल रही है
ऐसे में चार पंक्तिया तो बनती ही है
गीली माटी की सोंधी खुशबू
सरसों की भीनी भीनी खुशबू संग
घर आंगन को महका रहीं।
मंद हवा संग सुनहरी किरणें
ओस से गीले खेतों की चमक बढ़ा रही.
आज की रचनाएं
उद्भव से अग्रसर होते हुए
शैवालिनी के प्रवाह का और
बहते हुए मन के भावों का
अद्भुत तालमेल है...
दोनों में तिरते हुए
समन्वित अनुरक्त प्रकृति का
चेतनामय खेल है...
इस युग में जब तस्वीरों से पटी पड़ी है दुनियाँ
छायाचित्रों के सैलाब में डूब रहा है विश्व
अपने अस्तित्व को बचाने में
बेहद थका और निराश सा लग रहा थ
वह बूढ़ा छायाकार ।
जब मचा हुआ है चारों ओर रंगों का आतंक
उसके गैलरी में बड़े बड़े कलाकारों के
वे अनमोल क्षण फांक रहें हैं धूल
श्वेत-श्याम में !
हँसी-ख़ुशी कभी टिक कर नहीं
वह तो पंख लगाकर उड़ जाती है
सुखभरी मधुर घड़ियाँ बड़ी
जल्दी-जल्दी बीत जाया करती है!
ऐसा कोई आदमी नहीं जो
दुःख व रोग से अछूता रह पाता है
भाग्य हमें कुछ भी दान नहीं देता
वह तो केवल उधार देता है!
एक गीत कुछ पुराना सा, मीठा सा
ओ वसंती पवन पागल ना जा रे ना जा
ओ वसंती पवन पागल ना जा रे ना जा
आज बस
वंदन

