सादर नमस्कार
अब रचनाएँ पढ़िए
जब सोलह श्रृंगार किया
तो बैरी हुआ सलोना प्रीतम
भूल गई अपनी परछाई
बैठ बजाती रही मृदंगम
जितने फेरे लिए अग्नि के
उतने युग प्रीतम ने लूटा
अग्नि वही समिधा भी वह है
वेदी व ‘होता’ भी वही है,
नव प्रेरणा उमंग ह्रदय की
उलझ-पुलझ में वही सही है !
दीमकें मसि पी रहीं जब
खोखले से भाव हैं
खिलखिलाती व्यंजनाएँ
द्वंद्व के टकराव हैं
भाष्य भी फिर काँपता
वस्त्र पहने शीत के।।
बहुत विचित्र है मन भी
जहाँ भी जाना होता है ,
चल देता है हुमक कर
मुझसे पहले ही ।
बावज़ूद इसके कि
कोई नहीं जानता इसे ।
जो बार - बार मायूस हुआ है वो
फिर कभी लौटकर नहीं आयेगा
जब तुम देर -सवेर मन के दरवाजे खोलोगे
तो सन्नाटा ही पाओगे
ये जो तुम्हारी भागने की आदत है ना
एक दिन तुम सच में बहुत पछताओगे..
मैं तुझे किस्से कहानियों में ढूँढता रहा,
तेरा किरदार तो मेरी हस्ती का सरमाया था।
*****
बस



