सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
शनिवार मेरा खुद से चयनित दिवस है
क्यूँ ना इस बार शनिवार को पोस्ट हुए ही
सारे के सारे पोस्ट पढ़े जाएँ
आज कब आओगी ।
और क्या पकाओगी ?
और सूखी लकड़ियों ने
ख़ुशी मनाई ।
आज वह जलने से ,
बच गयीं ।
"भला कलयुग में सत्य का क्या काम?", उसने गुहार लगाया
और दिये को न्याय की तराजू में बैठने को मजबूर कर दिया.
"सम्पूर्ण सृष्टि जब आकंठ कलयुग में समायी हुई है तो
फिर सतयुगी प्रतीक का क्या औचित्य, यदि न्यायधीश हैं
तो पट्टी हटा मेरे अस्तित्व को चुतौती देने वाले को सजा दें ?"
गरीबी और अशिक्षा का सीधा असर रोजगार पर पड़ता है
और सरकारी नौकरियों में उनका बहुत कम प्रतिनिधित्व है.
इस समुदाय के अधिकांश लोग स्व-रोजगार से जुड़े हैं
और यह स्व-रोजगार भी उनके लिए "जैसे-तैसे पेट भरने" का माध्यम भर होते हैं,
उनकी आर्थिक उन्नयन का माध्यम नहीं. यही कारण हैं कि
मुस्लिमों में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 3.9% तथा शहरी क्षेत्रों में 2.6% है.
मेरा बेटा कभी हार मान ही नही सकता,
क्योंकि उसे तो दुनिया की हर एक ख़ुशी,
मेरे इस आँचल में ला कर डालनी है ना।
तुम खुश हो तो खुश हूँ मैं, ये सिर्फ एक माँ कहती है,
मैं कहता हूँ, माँ साथ है तो हर जंग में जीत पक्की है,
फल वाला – ठीक है. 80 के 8 ले लो
लड़की –
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थैंक यू सो मच भैया दे दो😆😆😆😆😆😆
एक स्त्री बुन लेती है कविता
पुराने कपड़े की सीवन उधेड़ते हुए
घूम आती है चाँद पर
रसोई में गोल- गोल रोटियाँ बनाते हुए
एक स्त्री कल्पनाओं के शहर में
स्वर्ग बना लेती है अपना
और जी लेती है अनकहे ... अनगिनत खूबसूरत लम्हे
ढेर सारी बधाईयाँ पाकर
खुशह हो जाया करते हैं...
जब बहुत सारे लोग करते हैं विश हमें
जन्मदिन तो है ही सबका कोई ना कोई दिन
मगर हर दिन को खुशियों से जी लें
अपनी समस्त जिम्मेवारियों के बावजूद
अपने तमाम दुखों और पीडाओं के बाद भी
तो दोस्तों...इस जीवन का कोई अर्थ है...
है ना दोस्तों मेरे प्यारे दोस्तों....
तो आज मेरे जन्मदिन से
फिर मिलेंगे ..... तब तक के लिए
आखरी सलाम
विभा रानी श्रीवास्तव
