सादर अभिवादन
देव दिवाली भी निपट गई
अब छटपटाते जीवों को
राहत देने की बारी आई है
बेचारे दो साल आपस मे फोन पर
बतियाते कई फोन बदल लिए
पुराने सारे चित्र डिलीट कर रहे हैं
अब वे ऐसे मिलेंगे जैसे ..
अभी -अभी वीजा मिला हो..
कविता जैसी बन गई आज की भूमिका
रचनाएँ....
नदी,नाले
पहाड़ी और
टीले याद आते हैं,
अभी भी
लौटकर बचपन में
हम कंचे सजाते हैं,
विरहिणी
गाँव में
परदेस की चिट्ठी सजाती है ।
सिलवटें सुलग रही है चादर की अभी,
लगता है रात भयानक गुजरी है,
एक नम कतरा लडता रहा थपेडो से,
गर्म हवा को क्या पता ,उस पर क्या गुजरी है,
लोग देखते रहे सुर्ख लाली का रंग,
पास आओ तो बतलाएं ,
हम पर क्या गुजरी है,उन पर क्या गुजरी है।
चंद्रशेखर बनले एह बलिया के थाती।
बागी ह बलिया ई भोजपुरिया खांटी।।
लोरिक के बलिया बनल मतवाला।
जब लिट्टी-चोखा के अहरा जोराला।।
बिरहा आ कजरी धुन सगरे सुनाला।
सत्तूआ के देख मन अलगे अगराला।।
बहुत कमाया खर्चा ज्यादा
बजट बिगाड़ा पूरा
रहें बटोरे निशदिन हर पल
भग्न स्वप्न का चूरा
वांछा में आलोड़ित अंतर
कच्ची माटी तोले।।
एक अप्रकाशित बाल कविता
बंदर की दुकान ....डॉ. ज्योत्सना शर्मा

बन्दर बैठा खोल दुकान
लाया सब बढ़िया सामान
कपड़े-लत्ते , पुस्तक, बर्तन टॉफ़ी ,
केक , मिठाई देख-देख बिल्लू
बिल्ले की तबियत कुछ ललचाई
कैसे मुझको मिले मिठाई सोचे
खूब लगाकर ध्यान
बन्दर बैठा खोल दुकान
बोला बिल्ला ज़रा मिठाई
चखकर देखूँ भैया
बन्दर बोला चखने का भी होगा
एक रुपैया पास नहीं धेला
बिल्लू के टूट गए सारे अरमान
बन्दर बैठा खोल दुकान
भरी उदासी मन में ,
बिल्लू लौटा मुँह लटकाकर
बन्दर ने दी बालूशाही
तरस ज़रा सा खाकर
बोला बिल्लू –
भाईजान कल लाऊँगा मीठा पान
तेरी बढ़िया बहुत दुकान
इसकी अजब निराली शान
....
बस
कल सखी पम्मी जी आएंगी
सादर
इसकी अजब निराली शान
....
बस
कल सखी पम्मी जी आएंगी
सादर



