सादर अभिवादन..
आज संगीता दीदी नही हैं
मै कामचलाऊ चर्चाकारा
उनके जैसा तो नही लिख-पढ़ सकती
पर हाँ , उनकी ढंकी-छुपी रचनाएं
अवश्य पढ़वा सकती हूँ...
आइए देखें....
मैं -
आसमान हूँ ,
एक ऐसा आसमान
जहाँ बहुत से
बादल आ कर
इकट्ठे हो गए हैं
छा गई है बदली
और
आसमान का रंग
काला पड़ गया है।
मैंने ---
अपनी सारी भावनाओं ,
सोच , इच्छा ,
उम्मीद और अनुभवों को
कैद कर दिया है
एक ताबूत में ,
और
ठोक दी है उसमें
एक अन्तिम कील भी ।
सोचो में तुम , ख्वाहिशों में तुम , ख़्वाबों में तुम
ज़िन्दगी की हर राह जैसे उलझ सी गई है।
उलझन ही होती तो शायद सुलझा भी लेते ,
हर चाह ज़िन्दगी की मध्यम पड़ गई है ।

रिश्तों की गांठें खोल दो
और
आजाद हो जाओ सारे रिश्तों से
फिर देखो
ज़िन्दगी कितनी
सुकून भरी हो जाती है
एक तरफ़
न तुम किसी के होंगे
और न कोई तुम्हारा
ख़्वाबों में अक्सर
देखा है मैंने ख़ुद को
किसी ऊँची
पहाडी की चोटी पर खड़ा
जब भी झांकती हूँ
नीचे की ओर
तो डर के साथ
एक सिहरन भी होती है
आज बस
कल फिर



