प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे
तब दुगुने वेग से
दागने चाहिये सवाल
सवाल,सवाल और सवाल
अनगिनत ,अनवरत
प्रश्न ही प्रश्न पूछे जाने चाहिये
तभी यह अघोषित आपातकाल
प्रश्नकाल में बदल सकता है.
सादर वन्दे ....
आज की रचनाएँ ...

दिए का मोल करने लग गईं अनमोल आँखें
गगन में उड़ चलें लाखों पतंगे खोल पाँखें
ये मिट्टी से बना दीपक है या है धातु निर्मित
अलौकिक ज्योति इसकी कर रही है विश्व जागृत

झील सी, दो नीली आँखें,
झुकी, पर्वतों पर, अलसाई सी पलकें,
कजराए नैनों में, नींदों के पहरे,
कुछ, तुझे कहने से पहले,
जिक्र थोड़ा,
बादलों का, कर लूँ!

राम चले वनवास सखी,
नयना सबके नदियाँ बहती।
लोचन पंकज से दिखते,
सुन बात सभी सखियाँ कहती।

जो कुछ भी बिखरा हुआ है मेरे
आसपास, उन्हीं को मैंने
माना है ज़िन्दगी
का इतिहास,
कुछ
धूसर चेहरों में आज भी खेलते हैं

कवि को कल्पना के पहले,
गृहणियों को थकान के बाद,
सृजक को बीच-बीच में और
मुझे कभी नहीं चाहिए..'चाय'
आज शाम में भी चकित होता सवाल गूँजा
कैसे रह लेती हो बिना चाय की चुस्की?
.....
आज बस इतना ही
सादर नमन
आज बस इतना ही
सादर नमन