सादर अभिवादन....
आज का अंक हमारे जिम्मे....
कोशिश करते हैं
अद्यतन रचनाएँ पढ़वाने की....
स्वप्न....श्वेता सिन्हा

दरबार में ठुमरियाँ हैं सर झुकाये
सहमी-सी हवायें शायरी कैसे सुनायें
बेहिस क़लम में भरुँ स्याही बेखौफ़
तोड़कर बंदिश लबों की, गीत गाऊँ
पहले मिलन का एहसास..... रेवा

हर बार जाने किस
तलाश में ये वाक्या
बयान करती हूं
पर जितनी बार लिखती हूँ
लगता है
कुछ रह गया लिखना
अलमारी...... मुदिता

देखा था
‘अम्मा‘ को
रहते हुए मसरूफ
ब्याह में साथ आई
शीशम की नक्काशीदार अलमारी को
सहेजते संजोते ....
पुरखों का इतिहास....विश्वमोहन कुमार
बिछुड़ गया हूं
खुद से।
तभी से,
जब डाला गया था,
इस झुंड में।
चरने को,
विचरने को,
धंसने को,
फंसने को,
रोने को,
हंसने को।
घनाक्षरी छंद... अनीता सैनी

मोहब्बत से सराबोर आँखें बरस रही ,
लफ़्ज ख़ामोश रहे धड़कन कह रही |
जज़्बात मोहब्बत के उर से उफ़न रहे,
आँखों में तैरते सपनें दास्तां कह रहे |
चहरे पर दिखाई देते भाव.... आशा सक्सेना

चेहरे पर भाव विषाद के
किसी को क्या दिखाना
साथ में हंसता खिलखिलाते
चेहरे की झंडी हाथ में लिए घूमते
कोई नहीं जानता किस लिए ?
दो भाव एक साथ क्यूँ ?
उलूक टाईम्स की ताजा कतरन
विदाई 2018 की

रहने दे
मत खाया कर
कसम ‘उलूक’
नहीं लिखने की
लिख
भी देगा
तब भी
साल
इसी तरह
गुजरते
चले जायेंगे
-*-*-*-*-
आज बस इतना ही
फिर मिलेंगे
दिग्विजय
कोशिश करते हैं
अद्यतन रचनाएँ पढ़वाने की....
स्वप्न....श्वेता सिन्हा

दरबार में ठुमरियाँ हैं सर झुकाये
सहमी-सी हवायें शायरी कैसे सुनायें
बेहिस क़लम में भरुँ स्याही बेखौफ़
तोड़कर बंदिश लबों की, गीत गाऊँ
पहले मिलन का एहसास..... रेवा
हर बार जाने किस
तलाश में ये वाक्या
बयान करती हूं
पर जितनी बार लिखती हूँ
लगता है
कुछ रह गया लिखना
अलमारी...... मुदिता
देखा था
‘अम्मा‘ को
रहते हुए मसरूफ
ब्याह में साथ आई
शीशम की नक्काशीदार अलमारी को
सहेजते संजोते ....
पुरखों का इतिहास....विश्वमोहन कुमार
बिछुड़ गया हूं
खुद से।
तभी से,
जब डाला गया था,
इस झुंड में।
चरने को,
विचरने को,
धंसने को,
फंसने को,
रोने को,
हंसने को।
घनाक्षरी छंद... अनीता सैनी

मोहब्बत से सराबोर आँखें बरस रही ,
लफ़्ज ख़ामोश रहे धड़कन कह रही |
जज़्बात मोहब्बत के उर से उफ़न रहे,
आँखों में तैरते सपनें दास्तां कह रहे |
चहरे पर दिखाई देते भाव.... आशा सक्सेना
चेहरे पर भाव विषाद के
किसी को क्या दिखाना
साथ में हंसता खिलखिलाते
चेहरे की झंडी हाथ में लिए घूमते
कोई नहीं जानता किस लिए ?
दो भाव एक साथ क्यूँ ?
उलूक टाईम्स की ताजा कतरन
विदाई 2018 की

रहने दे
मत खाया कर
कसम ‘उलूक’
नहीं लिखने की
लिख
भी देगा
तब भी
साल
इसी तरह
गुजरते
चले जायेंगे
-*-*-*-*-
आज बस इतना ही
फिर मिलेंगे
दिग्विजय
