सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
माँ मैके आकर चली गईं... पुतला रावण जला दिया गया
इंसान कबतक दम साधे रहेगा
उतारेगा कभी न कभी अपने चेहरे से
जिनसे चुभन बढती है
अकेलेपन का अँधेरा
फैल जाता है
जीवन का खालीपन
और गहराता है
लोग सांत्वना के
दो बोल बोलते हैं
मुखौटे
अन्दर का राम जला दिया,
कैसे उल्टे पड़े दशहरे हैं |
अपनी ही आवाज़ सुन ना पाएं,
पूर्ण रूप से बहरे हैं |
मुखौटा
रंगे शराब से मेरी नियत बदल गई
वाईज की बात रह गई साकी की चल गई
तैयार थे नमाज पे हम सुन के जिक्रे-हूर,
जलवा बुतों का देख के नियत बदल गई

मुखौटा
कुछ ऐसे भी चेहरे दिखते है
जो प्रेम-अनुराग में भी ज़हर भर देते हैं
यहाँ सब अपना असली रूप छिपाते हैं
मन ही मन में हैं गारियाँ देतें
पर ऊपर से मुस्कुराते हैं
रखते दिल के अंदर खोट ही खोट
और सिर्फ झूठा प्यार जताते हैं
मुखौटा
कलाकार छोटे बड़े
सब राम की सेना में
नाम लिखाते हैं
और तुमने
अपना नाम लिखाया
रावण की सेना में।
फिर मिलेंगे...
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का इकतालीसवें क़दम का
'वज़ह'
...उदाहरण...
तेरे होने न होने का अब फर्क नहीं पड़ता,
बीती बातों का क्यों अफसोस है तुझे,
ग़ज़ल लिखने की क्या थी वज़ह।
मगरूर हुए वो कुछ इस तरह,
दिल टूट बिखर जाने की क्या थी वज़ह।
-पंकज शर्मा
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
अंतिम तिथिः शनिवार 20 अक्टूबर 2018
प्रकाशन तिथिः 22 अक्टूबर 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
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