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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

1976...आदमी बने कोई इससे पहले इंसानियत कुएं में रख कर आइये

सादर नमस्कार

जीवन की आपाधापी, राजनीति की उठा-पटक,समाजिक मुद्दों 
पर जरुरी-गैर जरूरी बहस, दैनिक जरुरतों की भाग-दौड़ के 
बीच आपने महसूस किया क्या मौसम के बदलते मिज़ाज को?

अक्टूबर की दस्तक के साथ सुबह शाम हवाओं की 
मीठी गुनगुनाहट, बागों मेंं नारंगी,पीले गेंदा, 
चंद्रमालिका की फूटती कलियों की महक से बौराये, मंडराते 
भँवरेंं और तितलियाँँ, चिड़ियों का मीठा कलरव,
कास के धवल फूलों से आच्छादित नदी,नहर,खाली 
मैदान। मुस्कुराती प्रकृति जो हौले से कह रही है फिजाँ बदलने वाली है पहाड़ों का मौसम वादियों में जल्दी ही उतर आयेगा।  कभी  सुबह की चाय के साथ
आनंद लीजिए प्रकृति का जीवन में एक नयी ऊर्जा महसूस करेंगे।

एक गीत की दो पंक्तियाँ ज़रा गुनगुनाकर सोचिये
आगे भी जाने न तू,पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस यही एक पल है


★★★
आदरणीया नूपुरं जी की कृति

इस पथ पर चलने वाला
क्लांत पथिक क्या,
मेरी तान सुन कर
कुछ पल चैन पाएगा ?
यदि ऐसा हो पाएगा,
उसकी थकान दूर कर
मेरा मन सुख पाएगा ।
★★★★★
आदरणीय रवींद्र जी की सार्थक अभिव्यक्ति

ज़रूरी है-  
दिमाग़ी  कचरा साफ़ हो 
साफ़ नियत-नीति की बात हो 
ख़ज़ाने की सफ़ाई में जुटे
लुटेरों पर लग़ाम हो 
सीवर-सफ़ाई का 
आधुनिक इंतज़ाम हो 
दिखेगा तब 
स्वच्छ भारत !
समृद्ध भारत !!
★★★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की रचना


ये निशा प्रहर भई दुष्कर,
न माने ये बतियां!

संग रैन चले, न ये निशा ढ़ले,

दिशा-दिशा भटके,
न ही नैनो में नींद पले,
उलझाए कर के उलझी बतियाँ,
निशाचर सी दो अखियाँ.....
★★★★★★
आदरणीय लोकेश जी की शानदार ग़ज़ल

दिलों के दरम्यां रह जाये न दूरी कोई 
चराग़ दिल में कुर्बतों का जले प्यार करें 
तमाम नफ़रतें मिट जाये दिलों से अपने 
तंग एहसास कोई जब भी खले प्यार करें 

★★★★★

आदरणीय शशि जी का जीवन-दर्शन और आत्ममंथन
से प्रेरित भावात्मक अभिव्यक्ति




सच कहूँ, तो मेरा अब तक का अपना चिन्तन जो रहा है, वह यह है कि पुरुष व्यर्थ में श्रेष्ठ होने के दर्प में जी रहा है ,क्यों कि वह नारी ही जो अपने प्रेम, समर्पण और सानिध्य से उसे सम्पूर्णता देती है। यहाँ उसका सहज कर्म योग है। इस पथ पर चल कर जीवन की राह में भ्रमित होने की गुंजाइश कम होती है। नहीं तो बिन स्त्री के करते रहें न हठयोग, जीवन इसे साधने में ही निकल जाएगा, यदि कहीं पांव डगमगाया तो  सारी साधना, सारा स्वाभिमान, सारा सम्मान क्षण भर में धूल में मिल जाएगा। इससे भी कहीं अधिक एकाकीपन का बड़ा रोग है..।
★★★★★

और.चलते-चलते उलूक के पन्नों से आदरणीय सुशील सर जी की सारगर्भित अभिव्यक्ति

लाईन 
में लगे हुऐ 


अपनी तरह के 

ढपोर शंखों 

की सेना से 
बिगुल बजवाइये
★★★★★
आज का अंक आपको कैसा लगा?
कृपया अपनी प्रतिक्रिया 
से हमें आपके बहुमूल्य सुझाव
जरुर दीजिए।

हमक़दम के विषय में

आज के लिए इतना ही
कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ


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