इन दिनों सोचने लगी हूँ
एक दिन मेरे कर्मों का
हिसाब करती
प्रकृति ने पूछा कि-
महामारी के भयावह समय में
तुम्हें बचाये रखा मैंने...
एक दिन मेरे कर्मों का
हिसाब करती
प्रकृति ने पूछा कि-
महामारी के भयावह समय में
तुम्हें बचाये रखा मैंने...
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आवरणहीन देखकर
लज्जा से
फूट-फूटकर रो पडूँगी
तब प्रकृति मुझे
मुट्ठीभर रेत बनाकर
मरूस्थल में बिखेर देगी।
लज्जा से
फूट-फूटकर रो पडूँगी
तब प्रकृति मुझे
मुट्ठीभर रेत बनाकर
मरूस्थल में बिखेर देगी।
उपर्युक्त पंक्तियाँ एक ऐसी कविता से ली हैं जो पाठक को अपनी आत्मा से मिलने का , और स्वयं के आकलन का एक मौका देती है . आज की ये एक विशेष कविता है जिसे आज विशेष लिंक की हैसियत से ही चर्चा में शामिल किया है . आपमें से बहुत से पाठक इस कविता को पढ़ चुके होंगे ..लेकिन हो सकता है यहाँ लिंक लगाने से कुछ और भी प्रबुद्ध पाठक इस कविता के लिंक पर जा कर पूरी कविता (जी हाँ यहाँ केवल बानगी दी गयी है ) पढ़ कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएँ .लिंक चित्र में और रचनाकार के नाम में समाहित हैं .
प्रारंभ करते हैं आज की चर्चा ....
जैसा कि आज की चर्चा का विषय लिया है तो निश्चय ही मन बहुत अनमयस्क सा है ... .. दिन प्रतिदिन महामारी का फैलाव सबके मन मस्तिष्क पर हावी होता जा रहा है .... ऐसे समय में सकारात्मक उर्जा समेटना कठिन हो रहा है ,
इसी लिए आज की रचनाओं में सबके मन के भाव प्रमुखता से उतर कर आये हैं ...
ज्यादा कुछ न कहते हुए आप सबके सामने आज के पाँच लिंक रखने जा रही हूँ ......आशा है इन रचनाओं से आप मेरे मन की मनोदशा भी समझ पायेंगे ..
सुश्री मीना भारद्वाज जी अपनी त्रिवेणी के माध्यम से ईर्ष्या और रंजिश से होती हुई कोरोना की भयावहता तक पहुंची हैं ...
आपने पढ़ा कोरोना की भूख शांत नहीं हो रही ... चारों ओर एक भयावह मंज़र महसूस होता है ..... और इसी मंज़र को शब्द दिए हैं शैल जी ने अपनी रचना में ....
हर ओर है पसरा सन्नाटा
चहुँओर ख़ौफ़नाक है मंज़र
मची तबाही शहर गली में
इक वायरस ने घोंपा है ख़ंजर ,
एक ओर जहाँ सब कोरोना से पीड़ित हैं वहीँ हमारे महानुभाव पत्रकार कोरोना से कम नहीं . अलकनंदा जी ले कर आई हैं अपने लेख में ....
कोरोना की भयावहता के इस दौर में जिसे हम एकमात्र आशा कह सकते हैं, वह है मानवीयता। किसी को पथभ्रष्ट करने के लिए मानवीयता और अमानवीयता के बीच एक बारीक सी लाइन होती है। और यह पथभ्रष्टता अपने चरम पर तब पहु़ंचती दिखाई देती है जब सत्य दिखाने का दावा करने वाले पत्रकार ‘चुन चुन कर’ उन तथ्यों को अपनी लिस्ट में रखते हैं जो अराजकता और भय फैला सकें।
अरुण चन्द्र राय ऐसे समय कह रहे हैं कि ये समय श्रद्धांजलि लिखने का नहीं है ..... आखिर उनके मन में चल क्या रहा है जानते हैं इस लिंक पर जा कर .....
और इस शोक के समय भी ऋतुएँ तो अपने वक़्त के अनुसार आती हैं , जाती हैं ..... कवि हृदय उनको किस प्रकार महसूस करता है इसकी बानगी देखिये ओंकार जी की कविता में .....
शाख़ें लदी हैं फूलों से,
मगर ख़ुशबू ग़ायब है,
आज बस इतना ही ... कुछ ज्यादा न तो कहने का मन है और न ही लिखने का ... बस सब सुरक्षित रहें ... स्वस्थ रहें ..... इसी प्रार्थना के साथ विदा लेती हूँ ..... फिर मिलेंगे अगले सप्ताह सोमवार को इसी मंच पर ....
नमस्कार
संगीता स्वरुप
