"हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं,
फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूंगा"
- वाल्टेयर
यशोदा जी से सुबह सुबह ईमेल मिला, और इसके बाद जो हुआ वो आज की ये हलचल है... उनका ई-मेल आना और ये हलचल बनना दोनों ही अपनी जिंदगी में पहली बार हुआ है.
पढ़ कर बताइयेगा जरूर कि जो हुआ वो कितना सटीक हुआ??
"बढ़िया और उत्तम साहित्य हमारे सामने आना ही चाहिए ताकि हम नवीन से नवीनतम साहित्य को जन्म दे सकें।"
तो चलिए सृजन की गहराई में उतर के देखते है
इस उपजाऊ भूमि को जोत कर देखते हैं-
मेरी पसंदीदा रचनाएँ.....
पाप करे तो मान दे धर्म करे अपमान ।।१ ।।
भावार्थ : विद्यमान समय में जगत के सभी नीति नियम रीतिगत
न होकर विपरीत हो चले हैं। पाप करो तो यह सम्मानित करता है
और यदि धर्म करो तो यह अपमानित करता है।
न होकर विपरीत हो चले हैं। पाप करो तो यह सम्मानित करता है
और यदि धर्म करो तो यह अपमानित करता है।
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प्रीति साँची सोइ कहो होइब मीन समान ।
पिय पानि बिलगाइब जूँ छूटे तलफत प्रान ।। २ ।।
भावार्थ : सच्ची प्रीत वही है जो मीन की प्रीत के समान हो।
प्रियतम रूपी पानी अथवा प्रियतम का हाथ वियोजित होते ही
तड़पते हुवे प्राण निष्कासित हों।
-*-*-*-*-
आग के मॉफिक फैलती है यहाँ खबर
भाई दिलबाग सिंह जी विर्क

नहीं आता है मुझको जीना, झुकाकर नज़र
गर ख़ताबार हूँ मैं, तो काट डालो मेरा सर।
मुझ पर भारी पड़ी हैं मेरी लापरवाहियाँ
तिनका-तिनका करके गया आशियाना बिखर।
-*-*-*-*-
जब वो सब सीख गयी तो उसने पाया कि वो किसी और के
संग जीना सीख चुका था...हरसिंगार झरे पड़े थे
धरती पर...इसी मौसम में...प्रतिभा कटियार जी

हरसिंगार खिलने के महीने को अक्टूबर क्यों कहा गया होगा लड़की को पता नहीं लेकिन उसने हथेलियों में हरसिंगार सहेजते हुए हमेशा कुछ ताकीदें याद कीं जो इस मौसम में उसे दी गयी थीं. इसी मौसम में उसने आखिरी बार थामा था एक अजनबी हाथ, इसी मौसम में उसने निगाह भर देखा था उसे. शहर की सड़कों पर उन दोनों ने इसी मौसम में एक साथ कुछ ख़्वाब देखे थे.
-*-*-*-*-
स्थिर... शीर्षक देकर श्री अनिल जी दायमा "एकला" जी
ने एक इतिहास सा रच डाला है

मौसम का क्या उसे तो बदलना है
सूरज का क्या उसे तो ढलना है
ये हवा भी ठहर जानी है
फूलों को खिल कर बिखरना है
ये चाँदनियाँ भी तो छुप जानी है
-*-*-*-
छाया से जो डरे नहीं....
जी हाँ यही शीर्षक दिया है अनीता जी ने
लेकिन अहंकार इसमें बाधक बनता है, यही द्वंद्व मानव को सुखी
होने से रोकता है. यह सुनकर साधक अहंकार को मिटाने का प्रयत्न करने लगते हैं, किन्तु छाया से भयभीत होना ही सबसे बड़ा अज्ञान
है, क्योंकि छाया का अपना कोई अस्तित्त्व नहीं है. छाया को
मिटाया भी नहीं जा सकता, हाँ, प्रकाश के बिलकुल नीचे खड़े
होकर छाया को बनने से रोका जा सकता है.
चलते -चलते एक हनफ़ी साहब की एक ग़ज़ल पढ़िए

दोस्तों नजरे फसादात नही होने की
जान दे कर भी मुझे मात नहीं होने की
उन से बिछड़े तो लगा जैसे सभी अपनो से
आज के बाद मुलाकात नहीं होने की
ये कड़े कोस मसाफत के बरस दिन तक है
ओर दोराने सफर रात नही होने की
आभार भाई रोहिताश जी
विविधता से भरी रचनाएँ पढ़वाई आपने
रोहित जी का परिचय उन्हीं के शब्दों में

मैं रोहिताश घोड़ेला बदलाव के लिए लिखना पसंद करता हूँ. पुराने जज्बातों को जो बारम्बार लिखे जा चुके हैं उनको नये अल्फाजों में लिखने से परहेज है. महफ़िल में अक्सर तन्हाई गजल सुना जाती है और तन्हाई में कोई कविता जन्म ले लेती है. कभी जानबूझ कर लिखने की कोशिश तक नहीं करने की आदत है..........."सरहाना नहीं चाहता किसी से, बस मोहब्बत कर लो मुझी से"
धन्यवाद
प्रियतम रूपी पानी अथवा प्रियतम का हाथ वियोजित होते ही
तड़पते हुवे प्राण निष्कासित हों।
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आग के मॉफिक फैलती है यहाँ खबर
भाई दिलबाग सिंह जी विर्क
नहीं आता है मुझको जीना, झुकाकर नज़र
गर ख़ताबार हूँ मैं, तो काट डालो मेरा सर।
मुझ पर भारी पड़ी हैं मेरी लापरवाहियाँ
तिनका-तिनका करके गया आशियाना बिखर।
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जब वो सब सीख गयी तो उसने पाया कि वो किसी और के
संग जीना सीख चुका था...हरसिंगार झरे पड़े थे
धरती पर...इसी मौसम में...प्रतिभा कटियार जी

हरसिंगार खिलने के महीने को अक्टूबर क्यों कहा गया होगा लड़की को पता नहीं लेकिन उसने हथेलियों में हरसिंगार सहेजते हुए हमेशा कुछ ताकीदें याद कीं जो इस मौसम में उसे दी गयी थीं. इसी मौसम में उसने आखिरी बार थामा था एक अजनबी हाथ, इसी मौसम में उसने निगाह भर देखा था उसे. शहर की सड़कों पर उन दोनों ने इसी मौसम में एक साथ कुछ ख़्वाब देखे थे.
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स्थिर... शीर्षक देकर श्री अनिल जी दायमा "एकला" जी
ने एक इतिहास सा रच डाला है

मौसम का क्या उसे तो बदलना है
सूरज का क्या उसे तो ढलना है
ये हवा भी ठहर जानी है
फूलों को खिल कर बिखरना है
ये चाँदनियाँ भी तो छुप जानी है
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छाया से जो डरे नहीं....
जी हाँ यही शीर्षक दिया है अनीता जी ने
लेकिन अहंकार इसमें बाधक बनता है, यही द्वंद्व मानव को सुखी
होने से रोकता है. यह सुनकर साधक अहंकार को मिटाने का प्रयत्न करने लगते हैं, किन्तु छाया से भयभीत होना ही सबसे बड़ा अज्ञान
है, क्योंकि छाया का अपना कोई अस्तित्त्व नहीं है. छाया को
मिटाया भी नहीं जा सकता, हाँ, प्रकाश के बिलकुल नीचे खड़े
होकर छाया को बनने से रोका जा सकता है.
चलते -चलते एक हनफ़ी साहब की एक ग़ज़ल पढ़िए

दोस्तों नजरे फसादात नही होने की
जान दे कर भी मुझे मात नहीं होने की
उन से बिछड़े तो लगा जैसे सभी अपनो से
आज के बाद मुलाकात नहीं होने की
ये कड़े कोस मसाफत के बरस दिन तक है
ओर दोराने सफर रात नही होने की
आभार भाई रोहिताश जी
विविधता से भरी रचनाएँ पढ़वाई आपने
रोहित जी का परिचय उन्हीं के शब्दों में

मैं रोहिताश घोड़ेला बदलाव के लिए लिखना पसंद करता हूँ. पुराने जज्बातों को जो बारम्बार लिखे जा चुके हैं उनको नये अल्फाजों में लिखने से परहेज है. महफ़िल में अक्सर तन्हाई गजल सुना जाती है और तन्हाई में कोई कविता जन्म ले लेती है. कभी जानबूझ कर लिखने की कोशिश तक नहीं करने की आदत है..........."सरहाना नहीं चाहता किसी से, बस मोहब्बत कर लो मुझी से"
धन्यवाद

