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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

3090...चाँद उतरा, बर्फ़ पिघली, ये जहाँ महका दिया

 सादर अभिवादन

गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है.

लीजिए पढ़िए कुछ चुनिंदा रचनाएँ-


चाँद उतरा, बर्फ़ पिघली, ये जहाँ महका दिया : दिगंबर नासवा 

बादलों के पार तारों में कहीं छुड़वा दिया I

चन्द टूटी ख्वाहिशों का दर्द यूँ बिखरा दिया I

एक बुन्दा क्या मिला यादों की खिड़की खुल गई,

वक़्त ने बरसों पुराने इश्क़ को सुलगा दिया.


ग़ज़ल |रूह तन्हा है | डॉ.(सुश्री) शरद सिंह

रूह तन्हा है, ज़ख़्म गहरा है

ग़म सरे-शाम आ के ठहरा है

याद आती हैं उड़ाने लेकिन

आसमानों पे आज पहरा है

 .  

डर कर मेरे घर, कोई आया ना गया -- डॉ . टी . एस . दराल . 


याद हैं वो दिन जब ,

होती थीं खूब मुलाकातें। 

जाम लिए हाथ में 

करते थे ढेरों सी बातें।  

देखते देखते फिर 

आ गईं कर्फ्यू की रातें। 


सार्थक चिंतन - कुछ हाइकु

 अब न मिलें

ऐसे सुअवसर

वक्त की घात

 

माता का प्यार

चोंचला अमीरों का

खाते हैं मार


इक बगल में ... सुबोध सिन्हा 



आना कभी
तुम ..
किसी
शरद पूर्णिमा की,
गुलाबी-सी 
हो कोई जब
रूमानी, 
नशीली रात,
लेने मेरे पास
रेहन रखी 

आज की प्रस्तुति रविन्द्र जी की ही है । कुछ लिंक्स इंटरनेट की असुविधा के कारण नहीं लगा पाए थे तो मैंने प्रयास किया कि समय से इसे प्रस्तुत किया जा सके । 
बहुत जल्दबाजी में लगाई गई है । यदि त्रुटि हो तो क्षमा कीजियेगा । 
आज बस इतना ही ....

नमस्कार 



 



 



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