सादर अभिवादन
गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है.
लीजिए पढ़िए कुछ चुनिंदा रचनाएँ-
चाँद उतरा, बर्फ़ पिघली, ये जहाँ महका दिया : दिगंबर नासवा
बादलों के पार तारों में कहीं छुड़वा दिया I
चन्द टूटी ख्वाहिशों का दर्द यूँ बिखरा दिया I
एक बुन्दा क्या मिला यादों की खिड़की खुल गई,
वक़्त ने बरसों पुराने इश्क़ को सुलगा दिया.
ग़ज़ल |रूह तन्हा है | डॉ.(सुश्री) शरद सिंह
रूह तन्हा है, ज़ख़्म गहरा है
ग़म सरे-शाम आ के ठहरा है
याद आती हैं उड़ाने लेकिन
आसमानों पे आज पहरा है
.
डर कर मेरे घर, कोई आया ना गया -- डॉ . टी . एस . दराल .
याद हैं वो दिन जब ,
होती थीं खूब मुलाकातें।
जाम लिए हाथ में
करते थे ढेरों सी बातें।
देखते देखते फिर
आ गईं कर्फ्यू की रातें।
सार्थक चिंतन - कुछ हाइकु
अब न मिलें
ऐसे सुअवसर
वक्त की घात
माता का प्यार
चोंचला अमीरों का
खाते हैं मार
इक बगल में ... सुबोध सिन्हा