आज की चर्चा में सोचा तो था कि किसी विधा का विशेषांक लगायेंगे .... लेकिन जब ब्लॉग भ्रमण पर निकले तो सोचा हुआ धरा की धरा रह गया .... ढूँढने कुछ और गयी और मिल कुछ और गया .... तो सोचा जो मिल रहा उसी को समेट लो ... न जाने फिर ये मिले या न मिले ...तो हाज़िर हैं आज के लिंक्स जो अनजाने ही मेरे हाथ बटेर की तरह लग गए ...अब देखना ये है कि आप लोगों को कैसे लगते हैं .... और कैसे तो तभी पता चलेगा जब आप पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे ......देंगे न ? पाँच ही तो लिंक हैं ....पढ़ ही लीजियेगा ...
आज वाकई में कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा ला कर भानुमती का कुनबा जोड़ा है .... नहीं कर रहे न आप विश्वास ? चलिए मेरे साथ और देखिये कैसे कैसे अजब गज़ब लिंक्स हैं ... सबसे पहले भानुमती से ही मिलवा देती हूँ ....लेखिका बता रहीं अपने मन की बात ... कि कैसी कैसी होती हैं लुगाइयाँ ...... वैसे सोचा नहीं था कि इस शीर्षक के तहत हमें भुक्त भोगी संस्मरण पढने को मिलेगा ....
महिलाओं के मन की बात महिलाएँ ही जान सकती हैं ....
अरे आपको मन की बात जाननी है तो यहाँ चलिए मेरे साथ और पढ़िए कि इन मोहतरमा को आज क्या इच्छा जागृत हुई है .... मतलब कि ये उन पलों से बाहर ही नहीं आना चाहतीं ... जितनी बार देखें वो लगे कि पहली बार देख रहीं हैं ----
एक ओर बेइन्तिहाँ प्रेम की अनुभूति है तो दूसरी ओर ज़िन्दगी में रिश्तों को निबाहने की ज़द्दोजहद ... बाबू मोशाय...... ये ज़िन्दगी है ...हर रंग मिलते हैं ....आसक्ति है तो विरक्ति भी है ...
अभी मैं आपको विरक्ति तक लायी ही थी कि फिर चक्र घूम गया और प्रेम कब पागलपन की सीमा तक जा बैठा कि समझ से परे है ...जब तक कुछ अलभ्य है तब तक ही लालसा है ... प्राप्त होते ही प्राप्य का मूल्य कुछ भी नहीं ....
पुरुष की फितरत को सही शब्द दिए और स्त्री के समर्पण को नया अंदाज़ । आप भी आस्वादन करें और विचारें कि तुम और वो में कितना अंतर है ...
इस लिंक को पढ़ कर सोचने पर तो सभी मजबूर हुए होंगे .... खैर ...चलिए अब आप मेरे साथ एक ऐसे विचारक के पास जो बात स्वयं से शुरू करते हैं और किस्से के साथ क्या क्या सन्देश देते चलते हैं ये पाठक को खुद तय करना पड़ता है ... आज कल ब्लॉग पर थोडा निष्क्रिय हैं ...लेकिन हो सकता है शीघ्र ही अपने ब्लॉग को सजीव करें ... मुझे ऐसी उम्मीद है ...कहते हैं न कि एक बिहारी सब पर भारी ....तो मैं तो अब हट रही हूँ आपके और भाई बिहारी उप्प्स सलिल जी के बीच से ...वो खुद ही कह रहे चला बिहारी ब्लॉगर बनने ... जी हाँ ये उनके ब्लॉग का नाम है ... आइये करते हैं उनसे मुलाकात उनके ही ब्लॉग पर जहाँ वो फ़रिश्ते की बात कर रहे हैं ...
पढ़ा आपने ? सलिल जी ने बात शुरू की थी सांता की, उसके उपहारों की और अंत में छोड़ दिया सोचने के लिए कि समाज में कितनी विसंगति है ....
उम्मीद करती हूँ कि आज भी आपको सभी लिंक्स ज़रूर पसंद आयेंगे ... लेकिन मुझे कैसे पता चलेगा ? प्रतिक्रिया देंगे न आप पढ़ कर ? आप सभी की प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मूल्यवान हैं ... आप ही मुझे लिंक्स खोजने में सहायक हैं ...आपके सुझाव हमें बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं ...
आज बस इतना ही .... फिर मिलते हैं .....अगले सोमवार को इसी मंच पर ... कुछ नए पुराने चिट्ठे ले कर .... तब तक के लिए नमस्कार ...




