।।भोर वंदन।।
"लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम"
गोपाल सिंह नेपाली
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए...✍️
बड़े - बुजुर्गों को समझाना, अच्छा है पर कभी कभी
बच्चे को भी आँख दिखाना, अच्छा है पर कभी कभी
ज्ञान - वमन अक्सर वो करते, जिनका ज्ञान अधूरा है
ज्ञानवान का चुप रह जाना, अच्छा है पर कभी कभी ..
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किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है..
दर्द की तह में गुलज़ार बाक़ी है
मेरे ज़िगर में ख़ुशबू ए यार बाक़ी है
तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो
किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,..
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अब बहुत दिन हो गए, काफी समस्याएं जल्दी शुरू हुई थी लो ब्लड प्रेशर से चक्कर आना। इससे ही समस्याएं बढ़ी। 1 2 3 4 डॉक्टर को दिखाया न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजिशियन, ई एन टी और फिर फिजिशियन। सबका ट्रीटमेंट चल रहा था,
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बाहर जाते पुल ढहते,
सड़कें धँसतीं, गड्ढे हँसते,
वो केवल ‘फू-फा’ करते!
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कभी दोस्त बन के आइए
जिगर में ही समाइये
कसक सी उठती है दिल में
यूँ न हमें आज़माइए
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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बुधवार, 9 सितंबर 2026
4860..गुलज़ार बाक़ी है
मंगलवार, 8 सितंबर 2026
4859...दायरा समझ गये
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
प्रकृति कभी स्वार्थी नहीं रही; उसने हमेशा जीवन का पोषण किया है। लेकिन जब मनुष्य उसके धैर्य की सीमा लांघ जाता है, तो संतुलन बनाने के लिए प्रकृति अपना रूप बदलती है। ये प्रलयंकारी आपदाएँ वास्तव में मानव सभ्यता के लिए एक अंतिम चेतावनी हैं। यदि हमने अब भी अपनी जीवनशैली, लालच और प्रकृति के प्रति अपने रवैये को नहीं बदला, तो आने वाली नस्लों के लिए अस्तित्व का संकट और गहराता जाएगा।
मद्धम और शांत संगीत की तरह है
जिसकी स्वर्णिम आभा में बहती गुनगुनाहट को
केवल एकाग्र और शांत मन से ही
महसूस किया जा सकता है।
परंतु, दिन की आपाधापी,
दौड़-भाग और कोलाहल में
आत्मा को तृप्त करने वाली मधुर ध्वनि
कहीं लुप्त हो जाती है।
फिर जब ढलती शाम के धुंधलके में
सृष्टि का कोलाहल शांत होने लगता है,
तब वही नीरवता चुपके से पास आकर
जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—
कि कुछ पाने और हासिल करने की लालसा में
हम निरंतर भागते तो रहते हैं,
किंतु जीवन का वास्तविक आनंद, सत्य और सार
केवल भागने में नहीं,
बल्कि अंततः ठहर जाने और शांत हो जाने में ही है।
ज्ञान की पहली सीढ़ी यही है कि
हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर लें,
जो बीत गया वह विधि का विधान था,
किंतु आने वाला कल अब भी हमारे संकल्पों के अधीन है।
यदि मन में जानने की सच्ची तड़प हो
और जीवन में त्याग का भाव समाहित हो,
तो समय का हर क्षण एक नया मार्गदर्शक बन जाता है।
बहती नदी की भांति निरंतरता ही
मन और चरित्र को निर्मल बनाए रखती है;
जहाँ निष्काम भाव से कर्म करते हुए
परिणामों को ईश्वर अथवा समय के
चरणों में सौंप दिया जाता है।
इस निष्काम कर्म तथा निस्वार्थ समर्पण की नींव
केवल और केवल 'प्रेम' ही हो सकती है,
क्योंकि प्रेम के बिना सच्चा समर्पण संभव ही नहीं।
हमारी खामोशी को गलती मान लिया गया,
असल में हम इस दुनिया का दस्तूर और चालाकी बहुत जल्दी समझ गए।
जब महफिल में हमारा परिचय हो रहा था,
तब किसी खास की चुप्पी
असलियत बयान कर गई।
हमने हमेशा अपनी सीमाओं को स्वीकार किया ,
क्योंकि हम खुद को असीम दरिया नहीं,
बल्कि एक सीमित दायरा में रहने वाला इंसान मानते हैं।
सिर्फ़ वाह-वाही और तारीफ पाने के लिए नहीं लिखी
कभी हमने दास्तां अपनी
आपने हमारी आत्मा की पुकार को महज एक मुशायरे की नुमाइश समझ लिया।
हम तो बस कुछ पल के लिए क़लम बदलने ओझल हुए थे,
और आपने इतनी ही देर में हमें हमेशा के लिए लापता मान लिया।
अक्सर परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव या समय की विपरीत चाल में जो लोग लापरवाह होते हैं, वे संयोगवश सफल और सही दिखाई देने लगते हैं, जबकि अपनी जिम्मेदारी और नियमों का ईमानदारी से पालन करने वाले लोग असमंजस में पड़कर असफल या बेवक्त साबित हो जाते हैं।
किंतु दुनिया का यह अन्याय या अनिश्चितता हमारे सिद्धांतों को बदलने का आधार नहीं बननी चाहिए। बाहरी परिणाम और दुनिया की सराहना चाहे जैसी भी हो, व्यक्ति को समय की कद्र, अपनी जिम्मेदारी और अपने नैतिक मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए। सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर बने रहना ही जीवन का वास्तविक धर्म है।
मिट्टी की सोंधी महक महसूस करना
अपनी जड़ों की ओर लौटते मन की एक पुकार है,
जहाँ प्रकृति के आंगन में खिलते जीवन की रंगत
और समाज की विविध परतों का सच सिमटा हुआ है।
इंसानी रिश्तों के अनसुलझे ताने-बाने,
दिलों में पनपते प्रेम, करुणा और संघर्ष के भाव,
और बदलती दुनिया के बीच
मेरी माटी तेरा मोह न छूटे वाली
अनवरत तड़प
इस जीवन का हर एक पृष्ठ
मनुष्य के व्यवहार और स्वभाव का दर्पण है,
जो यह याद दिलाता है कि इंसान
चाहे कितना भी उड़ ले,
उसकी आत्मा का अंतिम विश्राम
अपनी ही माटी के आँचल में है।
-श्वेता
सोमवार, 7 सितंबर 2026
4858...इतनी बजे बाद यह मत किया करो...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में आज पढ़िए पाँच
चुनिंदा रचनाएँ-
आ गईं दिवस इक देवि गंगा,
था साथ में उनका पुत्र
देवव्रत।
कर रही प्रार्थना अब गंगा थी,
भगवन! शिष्य बना लो
देवव्रत।।
*****
पर इतना ज़रूर है
कि वफ़ादार
एक किरायेदार है
जिसे मकान मालिक
कभी भी निकाल सकता है
किराया बढ़ा सकता है
यहाँ यह मत करो
वहाँ ये मत करो
इतनी बजे बाद यह मत किया
करो
50 प्रतिबंध लगा सकता है
*****
परम कृपा के हम अभिलाषी
वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये,
भाषा का विकास हो प्रतिपल
शब्दों में भी मौन समाये!
*****
राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक
यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "
इसलिए जीवन में न तो अपनी तारीफ सुनकर घमंड करना चाहिए और न
ही किसी को इतना सिर पर चढ़ाना चाहिए कि वह दूसरों को छोटा समझने लगे। असली ताकत
ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि
अपने व्यवहार, संयम और विनम्रता में होती है। जो लोग खुद को साबित करने के
लिए शोर नहीं मचाते, उनका खामोश आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनता है।
*****
रविवार, 6 सितंबर 2026
4857 ..जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
सादर अभिवादन
सभी शिक्षकों को नमन करते हैं जिनकी वजह से हमें पढ़े-लिखे का दर्जा मिला है।
शनिवार, 5 सितंबर 2026
4856...हराम की नहीं खाता वो...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया रोली अभिलाषा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आज शिक्षक दिवस है। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति(1952-62) व दूसरे राष्ट्रपति(1962-67) रहे डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन मूलतः एक शिक्षक थे,दुनिया उन्हें एक महान दार्शनिक,शिक्षाविद,लेखक और चिंतक के रूप में जानती है। उन्होंने हिंदू-धर्म(Hinduism) की महान शिक्षाओं और मर्म को दुनिया के समक्ष प्रचारित और प्रसारित किया। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के एक गाँव में हुआ था। उन्होंने अपना जन्मदिवस शिक्षकों को समर्पित किया था।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का यादगार कथन-
“यदि मानव दानव बन जाता है तो यह उसकी हार है, यदि मानव महामानव बन जाता है तो यह उसका चमत्कार है। यदि मनुष्य मानव बन जाता है, तो यह उसकी जीत है।”
'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से शिक्षक-वर्ग को हार्दिक शुभकामनाएँ।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
तेरा तसव्वुर था
या मेरी खामखयाली थी
नहीं जानती
बस जानती हूँ तो सिर्फ यह
कि मुद्दतों बाद एक आस जगी थी
*****
कविता | सुबह की चाय संग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भीगते हैं
इस क़दर वे
कि जैसे आंसुओं से
भीगते है शब्द अकसर
वे आंसू भी कभी
ग़म के, ख़ुशी के
कि बारिश से हुए तर
नीम पर
*****
न हीं इस फिराक में रहता है
कि कोई दुम हिलाए उसके सामने
या फिर मांगे माफ़ी
जो होता है बस वही दिखता है
घिनौना, वाहियात, लिजलिजा
हराम की नहीं खाता वो
*****
एक
बड़ा ही
वजनी पत्थर,
रखा है सीने के ऊपर
पूछो न मुझसे ऐ दोस्तों
कसकें दबीं हुईं हैं
कितनी सारी
इस सिला
तले
*****
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
प्रार्थना: समस्त चयनित रचनाकारों से क्षमा याचना कि तकनीकी कारणों से आमंत्रण सूचना संबंधित रचनाकार के ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं हो पा रही है, असुविधा के लिए खेद है।
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
4855.....जीवन क्षणभंगुर है
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
अर्थात्
मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ, अग्नि में उष्मा हूँ, समस्त प्राणियों में वायु रूप में प्राण हूँ और तपस्वियों में तपस्या भी मैं ही हूँ।
गीता में कृष्ण ने स्वयं कहा है कि
संसार के समस्त प्राणियों में उनका अंश है फिर
जीवन में कर्म ही प्रधान है,सर्वोपरि है।
श्री कृष्ण एक ऐसा चरित्र है जो बाल,युवा,वृद्ध,स्त्री पुरुष सभी के लिए आनंदकारक हैं।
कृष्ण का अवतरण अंतःकरण के ज्ञान चक्षुओं को खोलकर प्रकाश फैलाने के लिए हुआ है।
भगवत गीता में निहित उपदेश ज्ञान,भक्ति,अध्यात्म,सामाजिक,वैज्ञानिक,राजनीति और दर्शन का निचोड़ है जो जीवन में निराशा और नकारात्मकता को दूर कर सद्कर्म और सकारात्मकता की ज्योति जगाता है।
*बिना फल की इच्छा किये कर्म किये जा।
*मानव तन एक वस्त्र मात्र है आत्मा अजर-अमर है।
*क्रोध सही गलत सब भुलाकर बस भ्रम पैदा करता है। हमें क्रोध से बचना चाहिए।
*जीवन में किसी भी प्रकार की अति से बचना चाहिए।
*स्वार्थ शीशे में पड़ी धूल की तरह जिसमें व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख पाता।
*आज या कल की चिंता किये बिना परमात्मा पर को सर्वस्व समर्पित कर चिंता मुक्त हो जायें।
*मृत्यु का भय न करें।
और भी ऐसे अनगिनत प्रेरक और सार्थक संदेश है
कर्म के संबंध में श्रीकृष्ण के बेजोड़ विचार अनुकरणीय है। भटकों को राह दिखाता उनका जीवन चरित्र उस दीपक के समान है जिसकी रोशनी से सामाजिक चरित्र के दशा और दिशा में कल्याणकारी परिवर्तन लाया जा सकता है।
एकमात्र सत्य यही है कि
कृष्ण को शब्दों में बाँध पाना असंभव है।
आज की रचनाएँ-
अधुरम मधुरम






