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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

4885 ...शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है

 सादर अभिवादन

चल गया सितंबर भी


उसका भी समय आ गया था
मुझे भी अभी लगा कि अक्टूबर में तो हम हैं
अक्टूबर है  दो-दो उत्सव मनवा कर ही जाएगा
पूरे 31 दिन रहेगा

देखिए रचनाएं....





स्मित माछर 
जैसे बेटों पर है 
गर्व तिरंगा को,
यहीं भीष्म सा 
बेटा मिलता 
मुक्तिदायिनी गंगा को,
गीता पढ़कर 
वंशी सुनती 
वृंदावन की शाम लिखो.




30 दिन का यह सफर 
किसी साल सा बीतता है 
जाने कितनी सदियों का दुख 
सितम्बर के सीने में दफ्न है





मिट जाने का सुख अनुपम है 
मिट कर ग़र यह जान सको तो, 
खोकर ही पा सकता कोई 
सूत्र अनोखा मान सको तो !





किसी  की  बंद  मुट्ठी  खुल  गई है,
बची थी साख जो कुछ,धुल गई है।

अगर  सब  ठीक  है तो  ये बताओ, 
चमन को छोड़ क्यों बुलबुल गई है?




मेहमानों के आने से पहले टमाटर का गाढ़ा-गाढ़ा स्वादिष्ट सूप तैयार हो गया था । मेहमान आ चुके थे और डिनर का पहला कोर्स सूप ही था । पंकज सबके साथ बैठा हुआ बेमन से किसी तरह उस सूप को गले के नीचे उतार रहा था । उसे फिक्र हो रही थी कहीं इस सूप की वजह से वे लोग ऋतु दीदी को रिजेक्ट ना कर दें । तभी मेहरा साहब की बुलंद आवाज गूंजी । "भाभी जी आपने घर में बनाया है यह सूप ? भई वाह । मज़ा आ गया । ऋतु बिटिया को सिखाया है या नहीं आपने यह सूप बनाना । आपने तो दिल ही जीत लिया । बिटिया को अच्छी तरह प्रैक्टिस करवा दीजिएगा। शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है ।"


सादर समर्पित
वंदन

6 टिप्‍पणियां:

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