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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

4855.....जीवन क्षणभंगुर है

शुक्रवारवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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राधे-राधे


पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥

अर्थात्

मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ, अग्नि में उष्मा हूँ, समस्त प्राणियों में वायु रूप में प्राण हूँ और तपस्वियों में तपस्या भी मैं ही हूँ। 

गीता में कृष्ण ने स्वयं कहा है कि

संसार के समस्त प्राणियों में उनका अंश है फिर

क्यूँ रह-रह कर पुकारते हो ,बाट जोहते हो, रोते-कलपते हो, शिकायतें ,उलाहना और उनके अस्तित्व पर प्रश्न क्यों?
 उनके दिये ज्ञान को आत्मसात करो,अपने कर्मों का विश्लेषण करो, अपने अंतर के
कृष्ण को पहचानो तभी अंधकार मिट पायेगा।

जीवन में कर्म ही प्रधान है,सर्वोपरि है।

श्री कृष्ण एक ऐसा चरित्र है जो बाल,युवा,वृद्ध,स्त्री पुरुष सभी के लिए आनंदकारक हैं।

कृष्ण का अवतरण अंतःकरण के ज्ञान चक्षुओं को खोलकर प्रकाश फैलाने के लिए हुआ है।

भगवत गीता में निहित उपदेश ज्ञान,भक्ति,अध्यात्म,सामाजिक,वैज्ञानिक,राजनीति और दर्शन का निचोड़ है जो जीवन में निराशा और नकारात्मकता को दूर कर सद्कर्म और सकारात्मकता की ज्योति जगाता है।

*बिना फल की इच्छा किये कर्म किये जा।

*मानव तन एक वस्त्र मात्र है आत्मा अजर-अमर है।

*क्रोध सही गलत सब भुलाकर बस भ्रम पैदा करता है। हमें क्रोध से बचना चाहिए।

*जीवन में किसी भी प्रकार की अति से बचना चाहिए।

*स्वार्थ शीशे में पड़ी धूल की तरह जिसमें व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख पाता।

 *आज या कल की चिंता किये बिना परमात्मा पर को सर्वस्व समर्पित कर चिंता मुक्त हो जायें।

 *मृत्यु का भय न करें। 


 और भी ऐसे अनगिनत प्रेरक और सार्थक संदेश है 

कर्म के संबंध में श्रीकृष्ण के बेजोड़ विचार अनुकरणीय है। भटकों को राह दिखाता उनका जीवन चरित्र उस दीपक के समान है जिसकी रोशनी से सामाजिक चरित्र के दशा और दिशा में कल्याणकारी परिवर्तन लाया जा सकता है।

एकमात्र सत्य यही है कि

कृष्ण को शब्दों में बाँध पाना असंभव है।


आज की रचनाएँ-
























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अधुरम मधुरम


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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