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सोमवार, 6 जुलाई 2026

4795 ..शब्दों से शब्द टकराते रहे

 सादर अभिवादन  


आज ये है

औरों का तो पता नही पर हम उस जमाने के है जब समोसा 25 पैसे में मिल जाता था 
आज 10 rs दे कर भी वो स्वाद नहीं मिलता जो उस वक्त आता था 
हम उस जमाने के साक्षी है जब प्यास बुझाने के लिए एक कंचे वाली बोतल में बस थोड़ा सा नमक डाल कर पी जाते थे 
उस जमाने में कोका कोला और रिमझिम आती थी 
और सबसे अच्छी गोल्ड स्पॉट 
आज बस सब क्लियर नो बकवास वाली ड्रिंक आती है 

मेरी पसंदीदा रचनाएं


बारिश  की  बूँदों  में  भीग  जाये  अंतस  सारा
यहीं  आज  मिल  जाए  वो  बीता बचपन  चहका - चहका  
बरसात के वे कजरारे मेघा
उमड़ - घुमड़  कर  बरसे   छमाछम  
गीत और बाल  कलरव  का  वह  मधुर  स्वर  आज फिर गूँजा ..




सुनो जल की जुबानी
चुक रहा सब पानी
कर लो जतन शीघ्र
समय ना गंवाइये

अतिवृष्टि अनावृष्टि
बिगड़ी समस्त सृष्टि
वन से है संतुलन
वृक्ष भी लगाइये




जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे  
वह घर आने को बेताब जब था

राह  जिसकी तकी बिछाई थी पलकें
आने वाला आया ही हुआ जब था
 
हजारों खत न उसे भेजे होंगे
परदेश कभी गया ही नहीं जब था 




मर्यादा में रहकर बोलो, 
न हो छोटा मुँह और बड़ी बात,
कटु वचनों से मत किसी का, 
हृदय छलनी कर डालो दिन-रात।

जब कर्म निभाकर जीवन के, 
इंसानों को छुट्टी मिलती है,
तब कष्ट, रोग और बाधाएँ, 
जीवन से छू (छूमंतर) हो जाती हैं।




शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।

पर कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही—
वह इस जाल में नही फंसी
और फिसल गयी


सादर समर्पित
सादर वंदन

2 टिप्‍पणियां:

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