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शनिवार, 4 जुलाई 2026

4793 ...संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है

 सादर अभिवादन 

एक शिक्षक कक्षा में दाखिल हुए और उन्होंने देखा कि
जिस कुर्सी पर उन्हें बैठना था वह छत पर टंगी हुई थी।
उन्होंने छात्रों की ओर देखा और मुस्कुराए।
बिना कुछ कहे, वे ब्लैकबोर्ड की ओर बढ़े और लिखा:

परीक्षा - 15 मिनट, 30 अंक


प्रश्न 1. कुर्सी और फर्श के बीच की दूरी सेंटीमीटर में परिकल्पित करें (1 अंक)।
प्रश्न 2. कुर्सी का छत से झुकाव कोण परिकल्पित करें और अपनी कार्यविधि दिखाएं (1 अंक)।
प्रश्न 3. उस छात्र का नाम लिखिए जिसने कुर्सी को छत पर टांगा था और उन दोस्तों का नाम लिखें जिन्होंने उसकी मदद की थी। (28 अंक)।
इसलिए हमेशा ख्याल रहे, गुरु तो हमेशा गुरु ही रहेंगे ।
गुरु से किसी भी प्रकार की मजाक नहीं 


मेरी पसंदीदा रचनाएं



शिक्षक ने राघव की दुविधा को भांप लिया और बेहद शांत स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमंदों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”

“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।





रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।





माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा.





संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,
हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।

बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,
परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।





खिल उठे बहार बन
झुलस गए थे जो वन,
श्रावण की भेंट पा
जुड़े मन, जुड़े नयन !  


सादर समर्पित
सादर वंदन

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