शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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लौटना फिर से
अनजानों की भीड़ में
आसान नहीं
जहां आपके इंतज़ार में
कोई न हो....
यादों की छाँव में बैठे अक़सर सीते हैं कुछ टीसते घाव,
हँसाते कभी रूलाते हैं, नहीं भुलाये जाते क्यों दर्द के पाँव..।
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आज की रचनाऍं-
दिन-रात
सागर में लहरें उठती हैं
फेन, बुदबुदे, तरंगें
सभी तो जल हैं !
आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ
भाव, विचार, कल्पनाएँ
सभी तो ऊर्जा हैं !!
लपेटा उँगलियों पे तुमने जो वो दुपट्टा कुछ शरमाकर,
तुम्हारी बेवफ़ाई का हर इक शिकवा अब छूटा हुआ है।
सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से,
मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।
इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास,
फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास
हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे।
आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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शुभ प्रभात
जवाब देंहटाएंपितृ शोक से उबर कर
श्वेता आज हिम्मत कर प्रस्तुति बनाई
वाकई उनके साहस को नमन
वंदन
सुप्रभात! जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब जो नहीं हैं, उनकी याद को शक्ति बनाकर आगे बढ़ना होता है। श्वेता जी को तो ईश्वरीय कृपा प्राप्त है। आज के अंक में 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु बहुत बहुत आभार श्वेता जी !
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