सादर अभिवादन
कृपया एक दृष्टि अद्यतन रचनाों पर
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वह अनदेखा, वह अनजाना
निकट से भी निकट लगता,
सुरभि सुमिरन की अनोखी
पोर-पोर प्रमुदित होता !
माँग जो भी, वह मिला है
तुझसे न कोई गिला है,
कभी कुम्हलाया न अंतर
जिस घड़ी से यह खिला है !
मेरे प्यारे साहेब,
आज
मेरे, सिर्फ मेरे साहब' ही लिखूँगी
क्योंकि यह पूरा *'नवंबर * माह 'मेरा' है..
और आपने आज पूछा भी था कि
"सोचो, पूरा साल नवंबर हो तो.."...
सोचिए, नवंबर आपकी और
मेरी ज़िन्दगी में कितना
महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है..
तो बात यूँ हुई कि मन की तरंगें
द्रुत गति से दौड़ने लगीं और सच कहूँ
तो धड़कनें भी इस रहस्यमय
वार्तालाप का हिस्सा होना चाह रहीं..
यह प्रेम-प्रसंग होते ही हैं स्वप्निल इन्द्रधनुष माफ़िक..
एक दिन बेटे ने कुछ निश्चय करके उसने लकड़ी का एक ताबूत बनवाया।
उसने उस ताबूत में अपने पिता को डालकर वह खेतों के पास पहाड़ी पर ले गया। जब वह ताबूत को पहाड़ी से नीचे फेंकने ही वाला था कि ताबूत में खटखटाने की आवाज आई। उसने ताबूत खोला, तो उसके पिता ने कहा कि मैं जानता हूं कि तुम मुझे पहाड़ी से फेंकने वाले हो। इस सुंदर ताबूत को खराब करने की क्या जरूरत है। मुझे ऐसे ही फेंक दो। यह ताबूत तुम्हारे बेटे के काम आएगा। यह सुनकर बेटे को बड़ी लज्जा आई। वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसने पिता से क्षमा मांगी और उसे वापस घर ले आया।
झुलसाती लपट बन गई दीपशिखा
मेटने तम अज्ञान, स्पृहा, विषाद का ,
छोटे-छोटे दीयों की सजा अल्पना
पर्व प्रकाश का मना रहा मतवाला !
बड़ी- बड़ी आँखों में दो जून की रोटी का रोना है
नियति, ईंट- गारा और बालू ही ढोना है
वो भला क्या जाने क्या होती है नजाकत
मटमैली धोती और ब्लाउज है देह पर
मर्दाना कमीज़ भी पहनी है उसके ऊपर
सकुचाती है छोटे कपड़ेवालियों को देखकर
आज बस
सादर वंदन
