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शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

मन परिंदा है.. उड़ कर आ बैठा...पचपनवीं डाल पर

मन परिंदा है 
रूठता है 
उड़ता है 
उड़ता चला जाता है 
दूर..कहीं दूर 
फिर रूकता है 
ठहरता है, सोचता है, आकुल हो उठता है 
-स्मृति आदित्य

चलते हैं लिंक्स की ओर..


गाद भरी  
झीलों की  
भाप से निकलते हैं | 
ऐसे ही  
मेघ हमें  
बारिश में छलते हैं |


हँस कर जीना सीख लिया 
हर पल रोना धोना क्या

धीरे धीरे कदम बढ़ा
डर कर पीछे होना क्या


छुट्टी ! 
मतलब नियमों- अनुशासनों से खुली छूट , 
लादी गयी व्यवस्था से मुक्ति , 
मनमाने मौज से रहने का दिन


हम जो गिर-गिर के संभल जाते तो अच्छा होता
वहशत ए दिल से निकल पाते तो अच्छा होता

बदनसीबी ने कई रंग दिखाए अब तक
बिगड़ी तक़दीर बदल पाते तो अच्छा होता


हम्म हम्म !
इको करती, गुंजायमान 
हमिंग बर्ड के तेज फडफडाते 
बहुत छोटे छोटे पर  !

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलते हैं...


सुनिये कुछ नया-पुराना











5 टिप्‍पणियां:

  1. आपका हृदय से आभार |बहुत ही अच्छे लिंक्स |

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर सूत्र संकलन, मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिए हार्दिक आभार

    जवाब देंहटाएं

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