ऐसे समय में जब यह पवित्र हिमालयी तीर्थस्थल केदारनाथ धाम आमतौर पर 5-8 फीट बर्फ से ढका रहता है, दिसंबर समाप्त हो चुका जनवरी की शुरुआत में भी बर्फ का नामोनिशान नहीं है।
केदारनाथ में बर्फबारी न होना जलवायु परिवर्तन,ग्लोबल वार्मिंग और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जो भविष्य में पानी की कमी, ग्लेशियरों के पिघलने और मौसम के अनियमित पैटर्न (जैसे सूखा और बाढ़) की ओर इशारा करता है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी और लाखों लोगों की जल सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।
तू पुराण है तू नवीन है, तू प्रगट भी हो के विलीन है, तू ही चिर-समाधि में लीन है, ये जगत भी तेरे अधीन है, तू ही ज्ञान ध्यान प्रवीन है, तू ही शंभु-शंभु महेश्वरम्. तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम् …
बहुत बचपन का नव वर्ष तो याद नहीं। स्कूल के दिनों का याद है जब 19 दिसम्बर से बड़े दिन की छुट्टी शुरू हो जाती थी और शायद तीन-चार जनवरी को स्कूल खुलता था। उस ज़माने में न फ़ोन, न टी.वी. न रात में जश्न मनाने के लिए बिजली। जो करना है दिन में ही करना है। इसलिए 31 दिसम्बर के दिन या रात में कुछ भी ख़ास नहीं होता था, सिर्फ़ नए साल में ख़ास कार्यक्रम की की रूपरेखा तैयार होती थी। पहली जनवरी की भोर में पहला काम होता था कि उठते ही जो भी घर में है उसे हैप्पी न्यू ईयर बोलना। दुसरा काम घर के सभी कैलेण्डर को फाड़कर फेंकना। तीसरा काम अपनी कॉपी में पहली जनवरी की तारीख डालना। पिछले दिन तय किए हुए कार्यक्रम का क्रियान्वयन करना। सिनेमा जाना, किसी रेस्तरां में खाना, किसी के घर लोगों के सामूहिक भोजन में हिस्सा लेना (कभी कभी मेरे घर भी होता था) इत्यादि।
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सुन्दर अंक
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सादर