निवेदन।


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सोमवार, 23 मार्च 2026

4690...छाये हैँ परमाणु के बादल, आज दहशत में मानवता...




शीर्षक पंक्ति:आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

दहशत में मानवता

छाये हैँ परमाणु के बादल,

आज दहशत में मानवता।

किस क्षण टकरायें बादल,

अरु हो जाये घनघोर वर्षा।।

*****

848. निश्चय

पानी के घूंट हलक से उतारती है, 

उठकर खिड़की तक जाती है, 

चुपके से गली में झाँकती है,

सब कुछ ठीक पाती है लड़की। 

*****

जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)

इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !*****1499-जल-दिवस

झील है सोई

कविमन खोजता

रूपक कोई।

7

खिली है धूप

स्वर्णमयी हो रहा

झील का रूप।

*****

यमुना किनारे

हरि बोलो ......
सब सखियन मिली वसन उतारे,
हरि बोलो  यमुना के जल में संग नहाबे हरि बोलो
हरि बोलो .......
देख गोपन की स्नान की रीति, 
हरि बोलो धीरे से जाकर कान्हा वसन चुराबें हरि बोलो।
*****
फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 22 मार्च 2026

4689 ...मेरे चारों ओर बिखर गया था प्रेम का लाल रंग

 सादर अभिवादन 


आज मेरे जीभ में छाले से जलन हो रही है
कल सिमई खा लिया था उसका तो नही

आज के इस अंक में दो रचनाएं 
साहित्यिक पत्रिका साहित्य कुंज से है

रचनाएं देखें  



ये बात और है कि वो बेवफ़ा हैं
बेगैरत हैं हम तो, उम्मीद तो रखेंगे

कहते हैं हमसे कि हम ना मिलेंगे 
मिल के भी हम तो मर ही मिटेंगे




अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…

और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।

ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।


वाणी अटकी, बोल न फूटे
अंतर का चैन कोई लूटे,
कविता दिल की भाषा जाने
कितने कूल-किनारे छूटे !

रागी मन बनता अनुरागी
भीतर कैसी पीड़ा जागी,
पलकों में पुतली सा सहेजे
भीतर लपट लगन की लागी !





अमित ने दस रुपये की चाय ली। सौ का नोट पकड़ा दिया।

वेंडर ने जल्दी में अपनी बरसाती जेब टटोली, खुले नोट निकाले और अमित को पकड़ा दिए, 
“गिन लीजिए साहब।”

अमित नोट गिनने लगा। तभी उसे पता लगा कि उसने दस-दस के तीन नोट और 
एक उसी का सौ का नोट वापस कर दिया था। शायद हड़बड़ी में पचास का नोट नहीं निकाल पाया और 
सौ का ही पकड़ा दिया।

“साहब, दस रुपये और नहीं हैं . . . 
आप एक चाय और ले लीजिए साहब। अभी ट्रेन चलने वाली है, 
नहीं तो मैं बाहर से ही खुल्ले कराकर ले आता . . .”




स्मरण हैं मुझे अब भी वो क्षण
जब समेट लिया था तुमने
मेरा प्रेम अपनी मुट्ठियों में
कुछ इसी प्रकार रक्ताभ हो उठी थीं ऋतुएँ
मेरे चारों ओर बिखर गया था
प्रेम का लाल रंग



सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 21 मार्च 2026

4688 इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है

 सादर अभिवादन 


ईद उल-फ़ित्र या ईद उल-फितर 
मुस्लमान रमज़ान उल-मुबारक के 
एक महीने के बाद एक 
मज़हबी ख़ुशी का त्यौहार मनाते हैं। 
जिसे ईद उल-फ़ित्र कहा जाता है। 
ये यक्म शवाल अल-मुकर्रम्म को मनाया जाता है।

रचनाएं देखें


करथे अलकरहा बात कभू
दिन ला वो कहिथे रात कभू

जिनगी के पोनी उरकत हे
तँय सूत करम के कात कभू

जिनगी मा तुम पानी राखव
बिन पानी चुरथे भात कभू



चोंच में तिनके सुतली,टहनी 
काग़ज़, पत्ते बटोर ले जाती,
घोंसला बना कर घर बसाती ।
सीधी-सादी सी मनभाती गौरैया 
मिलनसार किरायेदार बन जाती ।



"वीरता भी देखेगी जनता, पहले सुरक्षा आवश्यक है.
"महाराज एक वातानुकूलित अभेद्य बंकर की ओर भागे. जाते-जाते उन्होंने
चिल्लाकर वह अंतिम पाखंड किया, "मैं ध्यान मुद्रा में हूँ! सैनिकों की बलवृद्धि और
उनकी विजय के लिए साधना-रत हूँ."

भीड़ ने देखा कि उनका 'शेर' बंकर के लोहे के पीछे लुप्त हो गया है. सन्नाटा पसर गया. अब वहाँ केवल धूल थी, धुआँ था और था कोयलों का ढेर, जिसकी कालिख अब सबके चेहरों पर साफ दिखने लगी थी.

वृद्ध शिक्षक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखा: "यह कोयला युग है. यहाँ नायक के वेश में सियार और लोमड़ विचर रहे हैं. पर याद रहे, इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है."



शादी को तैयार न हों अब
बिन फेरों  के साथ रहें अब
रिश्ता चलता पर कुछ ही दिन
का सखि साजन? नहिं सखि ‘लिवइन’

*
पढ़- लिखकर बोलें  अंग्रेजी
मात- पिता पर रखते तेजी
भूल गए  सब अपनी  संस्कृति
का सखि साजन? नहिं सखि संतति




ये कैसा है मंजर 
के ग़ायब सिलेंडर 

सब कुछ है बाहर 
कुछ भी न अंदर
कब से खड़े हैं 
आया न नम्बर
*****
नम्बर वन के आतंकवादी हैे
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) अब सोते से जाग जाओ और
अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान युद्ध को रोकने के यत्न करो.
बहुत हो चुका विनाश,तबाही! अब दुनिया को चैन की सांस लेने दो दुष्टों!
हथियार टेस्टिंग के लिये युद्ध ज़बरन थोपे जाते हैं.
युद्ध भूख के साम्राज्य का विस्तार करते हैं और गिद्धों के लिये भोजन!
अफ़सोस!

सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

4687.... चुनौतियों से डिगता नहीं ध्रुव तारा

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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आदमी,आदमी में फर्क होता है। 
आदमी-आदमी में तर्क होता है।
आदमी जब आदमी को समझे न
आदमी, आदमियत के लिए नर्क होता है।

आज की रचनाऍं- 
 
यदि उस शुभ्र पुष्प पर मन अटका
तो बदल जाएगी सोच की धारा
हर नाव ढूँढती है सुरक्षित किनारा
चुनौतियों से डिगता नहीं ध्रुव तारा



दूर सघन वन अरुणाचल के 
जब मेहमानों को दिखाता, 
उनकी आँखों के विस्मय में 
मेरा अंतर भी मुस्काता !

हिमशिखरों पर रवि किरणों को 
अठखेली करते जब देखा,  
जमी हुई गहरी झीलों को 
निमिष भर में पिघलते देखा !



साँसें अब गहरी हो चली हैं,
उनकी आवाज़
छाती के भीतर से गूंजती है,
मानो कोई लहर
रीढ़ की हड्डी तक उतर रही हो।
हर कंपन, हर हलचल
अब ध्यान का विषय है
अंग-अंग अपनी ही गति में बोल रहा है।


हासिल


सूरज प्रकाश के घर में आज अंधकार छाया था ! रात को चूल्हा भी न जला था ! बच्चों को मन मसोस कर सुबह के बचे खाने से कुछ निवाले खिला दिए घरवाली ने और दोनों पति पत्नी दो घूँट पानी पीकर सोने का उपक्रम करते रहे ! बड़े भाई के घर के जश्न की आवाजें मन पर घन की सी टंकार करती रहीं !


जिस तस्वीर को लेकर भारत जाते हैं वो कभी नहीं मिलती, वो पुरानी हो चुकी होती है। नई तस्वीर अक्सर बेहतर ही होती है। शहर बदल चुके होते हैं। वो गालियां वो सड़कें जो याद में थी सब बदल चुकी होती हैं। उस तस्वीर में मौजूद बहुत से दोस्त और जानने वाले या तो खुद तस्वीर हो चुकते हैं या उम्र की चाल के चलते अब पुरानी तस्वीर से अलग से दिखने लगे होते हैं। पुरानी तस्वीर नई तस्वीर से बदल जाती है जिसे लेकर अगली बार जाएंगे। वो भी बदल जाएगी -जानते हुए भी तस्वीर तो सजा ही लेते हैं। मानव स्वभाव है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 19 मार्च 2026

4686 आज पहली बार टाला है मैंने अपने बालों का रंगा जाना

 सादर अभिवादन 

ईद कब है यह अनिश्चत सा है
बताइए सुबोध जी
क्या यह भी शोध का विषय है?

रचनाएं देखें



भारतीय वेद-पुराणों के आधार पर ब्रह्मा को नाट्यवेद का रचयिता माना जाता है, जबकि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर नाटक सदियों से क्रमवार विकसित होता आने वाला कला का एक स्वरूप है। जिसकी .. युगीन  आदिन युगीन मानव द्वारा हर्षोल्लास के अवसरों पर सामूहिक बेतरतीब थिरकन से लेकर लयबद्ध 
सामूहिक नृत्य तक की यात्रा और फिर नौटंकी, रासलीला व रामलीला से लेकर आधुनिक नाटक तक की  यात्रा भी चार्ल्स डार्विन के जैव-विकास सिद्धांत की तरह ही क्रमवार तय हुई होगी .. शायद ...




चिलबिल सी आतुर निडर
आजाद उन्मुक्त  उड़ान 
देर तक हवा में डोलती रही
किसी दिन देखा मैंने उसे




सबसे कष्टदायी है
सार्थक प्रश्नों को
किसी कुंवारी की कोख से जन्मे
नवजात-सा
कूड़े के ढेर में पड़ा देखना।

धृतराष्ट्र प्रसन्न हैं—
क्योंकि दरबार में
संजय अभी भी वही देख रहा है
जो उसे
दिखाने को कहा गया है। 



आज पहली बार
मुझे अफसोस नहीं
अपने सफेद होते बालों का
मुझे झिझक नहीं
किसी के इन्हें देख लेने पर
आज पहली बार टाला है मैंने
अपने बालों का रंगा जाना
आज पहली बार मैं
बहुत शाँत महसूस कर रही हूँ

****
आज पम्मी जी नहीं है
कृपया आप ही तलाशिए नए चर्चा कार को
अग्रिम आभार

सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 18 मार्च 2026

4685..आगत की आहट ..

 ।।प्रातःवंदन।।

"मन से; वाणी से, कर्मों से,

आधि, व्याधि, उपाधि हरो।।

अक्षय आत्मा के अधिकारी,

किसी विघ्न-भय से न डरो।।

विचरो अपने पैरों के बल,

भुजबल से भव-सिन्धु तरो।।

जियो कर्म के लिए जगत में-

और धर्म के लिए मरो।।"

-मैथिलीशरण गुप्त 

चलिए आज शुरुआत हुई सोच ,विचार से ..बढते है प्रस्तुतिकरण की ओर✍️

उसने मेरा हाथ थाम लिया था

सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता। ..

✨️

प्रकृति से दूर


कल-कल, निश्छल, सी ये नदियाँ,

छल-छल, अविरल, बहती जाती सदियाँ,

निरंतर, इक प्रवाह यहाँ,

पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!..

✨️

वह लड़का है - लघुकथा

राधिका बहुत खुश थी ! उसके परंपरावादी परिवार ने बड़ी कशमकश और तनातनी के बाद अंतत: बड़े भैया माधव के अंतरजातीय विवाह के लिए अनुमति दे ही दी ! उनके रूढ़िवादी ब्राहमण परिवार में यह एक ऐतिहासिक फैसला था कि माधव का विवाह उसके साथ पढ़ने वाली रागिनी के साथ होने जा रहा था ! यद्यपि उसके..

✨️

 मेरी साँसों में अटकी तुम

तुम गई तो

दरवाज़ा बस

हल्के से बंद हुआ,श

पर कमरे में

कुछ रह गया था। .

✨️

विष पान - -



हर एक वक्षःस्थल है एक गहन सरोवर लेकिन

कमल नहीं खिलता हर किसी के सीने में,

कुछ कुहासों को छुपाए नयन कोरों

में हर चेहरा चाहता है सुबह का

मधुर आलिंगन, एक अद्भुत

सुख छुपा होता है जान..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


मंगलवार, 17 मार्च 2026

4684...कौओं की पंचायत से...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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भूख के एहसास पर
आदिम युग से
सभ्यताओं के पनपने के पूर्व
अनवरत,अविराम
जलते चूल्हे...
जिस पर खदकता रहता है
अतृप्त पेट के लिए
आशाओं और सपनों का भात, 
जलते चूल्हों के
आश्वासन पर 
निश्चित किये जाते हैं
वर्तमान और भविष्य की
परोसी थाली के निवाले
 उठते धुएँ से जलती
पनियायी आँखों से
टपकती हैं 
 मजबूरियाँ
कभी छलकती हैं खुशियाँ,
धुएँ की गंध में छिपी होती हैं
सुख-दुःख की कहानियाँ
जलती आग के नीचे
सुलगते अंगारों में
लिखे होते हैं 
आँँसू और मुस्कान के हिसाब
बुझी आग की राख में
उड़ती हैंं
पीढ़ियों की लोककथाएँ
बुझे चूल्हे बहुत रूलाते हैं
स्मरण करवाते हैं
जीवन का सत्य 
कि यही तो होते हैं 
मनुष्य के
 जन्म से मृत्यु तक की 
यात्रा के प्रत्यक्ष साक्षी। #श्वेता


आज की रचनाऍं- 
--------------

कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।



पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !

जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 





मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।


मगर
मेरी आवाज़
समुंदर के शोर में
कहीं खो जाती है,
तुम तक पहुँचने से पहले ही
पानी उसे निगल लेता है।



समय की कमी थी। शादी ब्याह के कार्यक्रम भी अटेन्ड करना थे अतः बहुत लंबा न रुक पाए मगर जितना भी रुके पाण्डे दंपति की मेहमान नवाजी ने दिल जीत लिया। हमारे साथ हमारे साडू भाई भी थे वो भी शहर के इतना नजदीक गाँव के माहौल से बहुत प्रभावित हुए। खास तौर पर पाण्डे जी के सानिध्य में चिड़ियों का दाना चुगना उन्हें काफी भाया।

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 16 मार्च 2026

4683 ..विश्व कीर्तिमान की ओर बढ़ते कदम

 सादर अभिवादन 

आज भी भाई रवीन्द्र जी नहीं हैं
बिना किसी लाग-लपेट के
रचनाएं देखें



चंगों को;
नंगों को;
बनावटी भिखमंगों को,
कभी भी मत दान करो





विश्व कीर्तिमान की ओर बढ़ते कदम
​12 फीट 8 इंच की यह विशालकाय तुलसी संभवतः दुनिया की सबसे ऊँची तुलसी है। इस प्रामाणिक माप के आधार पर अब हम इस अद्वितीय उपलब्धि को 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' और 
'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज कराने हेतु शीघ्र ही आधिकारिक आवेदन प्रस्तुत करने जा रहे हैं।
​सफलता का मंत्र: रसायनों को 'ना' और प्रकृति को 'हाँ'





ओ कान्हा! तू बाँसुरी की मीठी धुन,
रोज सुनाया कर मुझको।

आग की लपटें जब भी घेरें,
 शीतल कर आया कर मुझको।

लहराते तूफानों का शोर दबा,
 मधुर बनाया कर मुझको।





रविवार  की सुबह सुहानी 
बुला रही है घर को आओ !

 कर्मयोगी आधुनिक युग के 
कह सकते हैं जिन्हें तपस्वी, 
 न खाने की सुध न निद्रा का
 निश्चित रहा समय है कोई !

सादर समर्पित
सादर वंदन
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