निवेदन।


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मंगलवार, 3 मार्च 2026

4670...नीले,पीले,हरे रंग जामुनी डाल अबकी बार होली में ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से। 

भारतीय समाज की समृध्द सांस्कृतिक परंपरा का उमंग और उत्साह से परिपूर्ण 

रंगोत्सव होली की शुभकामनाएँ। 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

अबकी बार होली में

तन भी भींगे मन भी भींगे 
आंचल भींगे अंगिया भी भींगे 
नीले,पीले,हरे रंग जामुनी डाल
अबकी बार होली में ।

*****
होली को मनाने आ गये !
 गम की गली न दाल कर उदासी को बेहाल हम खुशियाँ मनाने आ गये। दे कदमों को झूमती चाल हाथ हवा में उछाल हम सबको नचाने आ गये। *****होली आई

चिंतन के उस पावन रंग में

अपनी गरिमा भी आ सिमटा

विचारशील लोगों ने तो

होली को उन्माद ही समझा।

*****

गुबार मन में हो या पवन में ...

युद्ध-प्रतियुद्ध, अत्याधुनिक रासायनिक अस्त्र,

धमाके-धुआँ जानलेवा, पारिस्थितिकी दुस्सह।

हानिकारक है सदा गुबार मन में हो या पवन में,

होते हैं नष्ट देश-धरती संग समस्त ग्रह-उपग्रह।


मानसिक स्वास्थ्य केवल 'बीमारी की अनुपस्थिति' के रूप में नहीं

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर मानसिक स्वास्थ्य को केवल 'बीमारी की अनुपस्थिति' के रूप में नहीं, बल्कि एक मनो-सामाजिक (Psychosocial) वास्तविकता के रूप में देखना अनिवार्य है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य केवल हमारे दिमाग के रसायनों (Chemicals) पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि हम समाज में कैसे रहते हैं और दूसरे हमसे कैसे जुड़ते हैं.

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें नियंत्रित करने की क्षमता.

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 





सोमवार, 2 मार्च 2026

4669 ..जला के ईष्या,द्वेष की होलिका राख मले मतवारे,

सादर अभिवादन 


खट्टी-मीठी- चरपरी
रंगो का उत्सव
फागुन की 
रंगीन पिचकारियां
ईद की सिवैय्या



रचनाएं देखें



हृदय भरा उल्लास 
हथेलियों में मल रंग लिये,
सुगंधहीन पलाश बिखरी 
तन में मादक गंध लिये।

जला के ईष्या,द्वेष की होलिका
राख मले मतवारे,
रंग-गुलाल भरी पिचकारी
निकले अपने संग लिये।





साजन मत छेड़ो जी,
जाने दो मुझको,
हठ अब तुम छोड़ो जी।

रंगों की पिचकारी,
हाथ लिए पीछे,
मुझ पर क्यों दे मारी।




दूरियों से मिटती नहीं गर एहसास सच्चे हो
दूर नज़र से होके रहे कोई दिल के मकान में

दावा न कीजिए साथ उम्रभर निभाने का
जाने वक्त क्या कह जाये चुपके से कान में




वो मय थी या के जाम इश्क के भरे हुए,
महफ़िल में आपने हुजूर क्या पिला दिया

बाजू में बैठना नहीं कुबूल आपको,
हम उठ गए तो क्यों उठे है ये गिला दिया.

खुद जिंदगी की ऐश की हर शै खरीद ली,
हम भी थे साथ हमको झुनझुना दिला दिया.





प्रकृति के रंगों की छटा
जो मौसम से अपने आप
आ जाती है धरती पर
फीके हो जाते हैं हमारे
निर्मित कृत्रिम रंग
डर लगने लगता है

कोई काट न ले वृक्षों को
ढंक न ले प्रदूषण सूरज को
उपाय ऐसा सोचें
प्रकृति के संग हम
खेल सकें होली





रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”

“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और 

रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”






एक सुरमई भीगी-भीगी शाम, 
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम।

सुनो, तुम जरा मेरे साथ तो आओ,
कुछ मौसमों को भी बुला लाओ।
मैं ...... मैं बादल ले आऊं,
और इस भीगी-भीगी शाम में,
गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।





आज का ये अंक
रंगो से भरा
सादर वंदन

रविवार, 1 मार्च 2026

4668...मेरा मन ही है जो सब जानता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

सफ़र का क़िस्सा

यक़ीन की धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं

*****

हम दोनों प्यार में थे

हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर

जहां न जाने कितने नाउम्मीद

लोगों के कदमों के निशान थे

कितनी उदासियों का ठौर था

कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे

*****

गिला

झांकता, कभी खिड़कियों से,

जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,

शाख की, रंगीनियों से,

पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,

झूलती, उनकी पत्तियों से,

कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!

पता ही ना चला....

 व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,

कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!

पता ही ना चला....

*****

सरपंच सच

मास्टर को सरपंच साहेब हड़का रहे हैं, अवमानना के आरोप में! गलती से मास्टर ने सही लिख दिया है। सरपंच बैठा है ऊँचे इजलास पर। मास्टर नीचे  थरथर काँप रहा है। डर के मारे खड़ा। ……

अश्वत्थामा बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।

राजा  जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते। कौन सच । वह सच। या यह सच!

*****

नई दिशा

काउंसलिंग 18 से 22 जून तक थी. आयुष को 19 जून को आईआईटी दिल्ली पहुँचना था. गुप्ताजी और आयुष 18 जून की शाम दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठ गए. अगले दिन आईआईटी दिल्ली में मूल दस्तावेजों की जाँच हुई, आयुष ने सेंटर एलॉटमेंट के लिए चॉइस शीट भरी और उसी शाम उन्होंने वापसी की ट्रेन पकड़ ली.

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

4667 फरवरी का अंतिम दिवस

 सादर अभिवादन 


है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़

मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।  

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।

बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है 

-रामधारी सिंह दिनकर

रचनाएं देखें




रामदीन ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था। तुमने कहा था, “देखो न दीदी। उसकी मुस्कान में जवाब नहीं, 
बस धैर्य है! बच्चों को कौन समझा सकता है कि ऐसा ही यह गुब्बारा उसके बीमार पोते की जिद है,”

“हाँ, उसका पोता, जिसकी खाँसी रातों को दीवारों से टकराती रहती है। चिकित्सक ने दवाइयाँ दी है। 
पर बच्चे ने दादा से कहा था, -‘दादा, बड़ा वाला गुब्बारा लाना, आसमान जितना।’ मैंने कहा था और 

रामदीन बुदबुदा रहा था—“क्या आसमान खरीदा जा सकता है?”




जिस दिन
जज़्बातों का द्रव्यमान बढ़ेगा,
और अहंकार की दूरियाँ घटेंगी,
उस दिन
वो भी महसूस करेगा
तुम्हारी ओर खिंचती हुई
अपने दिल की कक्षा।

क्योंकि प्रेम
कोई चमत्कार नहीं—
यह भी प्रकृति का नियम है।




किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।





असंख्य बसंत गुज़रे छू कर
इस झूलते दालान को,
अनगिनत बार
देखा है
लड़खड़ाते सूरज के अवसान
को, उड़ान पुलों की रफ़्तार
रुक जाती है आधी रात,
कोई याद नहीं
करता



आज का ये अंक
फरवरी का अंतिम अंक है
सादर वंदन

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

4666... प्रेम ने दर्द को स्वीकार कर लिया है...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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जब भोर की अलसाई हवाएँ सर्दी का लिहाफ़
 हौले से सरकाने लगे,
जब फागुन की पहली लहर गाँव के खेतों को
 पियरी पहनाने लगे,
जब शीतल हवाओं से लदी माघ की मदमस्त रात 
चाँदनी में नहाने लगे,
 जब कोयलिया पीपल की फुनगी में झूलकर
 स्वागत गीत गाने लगे,
 जब भँवरे तितलियों संग छुआ-छाई खेल-खेल कर
 फूलों को लुभाने लगे,
तब समझो...
 रंगों की छुअन से बौराने का मौसम आया है।
दिलों में जमी बर्फ पिघलाने का मौसम आया है।
 जीवन में रचे प्रेम, उत्सव और समर्पण के रंग;
फगुनहट में सॉंसें महकाने का मौसम आया है।

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आज की रचनाऍं- 
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धूप जब उन पर गिरती है,
तो रंग और गहरा हो जाता है,
मानो प्रेम ने
दर्द को भी स्वीकार लिया हो।
इस अग्नि में
कोई राख नहीं,
सिर्फ़ अस्तित्व की चमक है 
जो कहती है,
“मैं जलता हूँ,
इसलिए हूँ।”



दोनों बातूनी थे।
एक ने कहा
मरने के बाद बड़ा मज़ा आया दोस्त,
जिनके लिए मैं ज़िंदगी भर बोझ था,
आज वही
मुझे अपने कंधों पर उठाकर लाए हैं।

 




इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले 
पकड़कर हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |



सितम सहकर भी 'शायर' मुस्कुराता ही रहा हरदम,
यही तो ज़िंदगी की खूबसूरत ये अदाएं हैं।

खिज़ां का खौफ़ क्या होगा जिसे मंज़िल  मिल पाई,
लहू से सींच दी हमने चमन की सब कथाएं हैं।

दुआ में हाथ जो उठता है तो महसूस होता ,
मिरे हक में ज़माने की बदलती अब दुआएं हैं।



लगता है समूचा बनारस
गंगा की केवल एक बूँद से बना है
मूल है गंगा, बनारस तना है
जो भी बनारस जाता है
कोई सिर के बाल, कोई जेब, कोई मन, कोई तन
अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है
और जब कोई यहाँ से जाता है
हरी झंडी की तरह
बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

4665..ख़्वाहिशें..

 भोर वंदन 

गुरुवारीय प्रस्तुति में शामिल
'आपका ब्लॉग 'से रचनाए
कई शब्द रंग-ढंग को समेटे..✍️






न बीवी मिली न प्यारे

  आओ किस्सा तुम्हे सुनाए 

recent सा है यार 

साठ साल की उमर में हो गया 

ऑनलाइन मुझे प्यार 

ऑनलाइन मुझे प्यार 

मिले वो टिंडर पे थे यार

प्रोफाइल देखकर रीझ गया दिल 

हुआ पहली नज़र में प्यार 

✨️

बांचती रही हूं

 बस तुम्हें औ तुम्हारा लिखा ही  मैं बाँचती रही हूं

तुम्हे सोना चांदी हीरा मोती सम मैं आंकती रही हूं


 अक्षरशः पढ़ना तुझे जैसे सांस सांस लेना

तेरा वजूद तूफान सा और मैं पत्ते सी कांपती रही हूं

✨️



टेली कॉल वालों के जी के जंजालों ने


अजब मोबाइल है

गजब सी उस की उल्फ़त है

नजदीकिया है दूरी

दूरियां में क़ुर्बत है

कोई दुखड़ा सुना रहा

अपना व्हाट्सएप पे..
✨️
जिंदगी में कुछ पाने की ख़्वाहिश हमेशा होनी चाहिए क्योंकि ख्वाहिशें ही हकीक़त बनती हैं।जब ख़्वाहिशें हकीकत का जामा पहनती हैं तब जो आंतरिक सुख मिलता है, उसका रसास्वादन स्वयं के अलावा कोई नहीं कर सकता। हम दूसरों से अपने अनुभव बता तो सकते हैं, किंतु उन्हें महसूस नहीं..
✨️
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



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