।।प्रातःवंदन।।
उगते सूरज की रंगोली को देखिए,
मुफ्त ले लीजिए बस मज़ा खेल का,
ये सुबह की हवा! ये सुबह की हवा!
~ रमेश तैलंग
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
।।प्रातःवंदन।।
उगते सूरज की रंगोली को देखिए,
शीर्षक पंक्ति; आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।
तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ?
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एक प्रेम गीत लोकभाषा में-प्रेम के रंग
सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ
बाकी मुँह पर ताला हउवै
ई बाजारू प्रेम दिवस हौ
प्रेम क रंग निराला हउवै
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया पूनम चौधरी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
अब सुनो,
हम सागर की बात कर रहे थे
सागर में तैर रहा है एक जहाज़
जहाज़ पर हज़ारों लोग
लोगों में एक परिवार
जिनके मध्य बहता है प्यार
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पिता, माँ और रोने की
भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी
पिता कहते थे—
पुरुष अगर रोए
तो समय को असहज कर देता है,
और समय
कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।
उन्होंने सिखाया,
सुख सार्वजनिक है दुख निजी
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अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी
मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के
बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।
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उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:
शत्रु: शिक्षा का पाखंड
शस्त्र: ज्ञान
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एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।।
सादर अभिवादन
वासंती बयार प्रारम्भ
शिवरात्रि तक चलेगा
-श्वेता
बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से
झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता
कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?
झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता
छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब
मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता