निवेदन।


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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

4650..चक्र सृष्टि का

 ।।प्रातःवंदन।।

उगते सूरज की रंगोली को देखिए,

इन परिंदों की उस टोली को देखिए,
फूूल-पत्तों की हमजोली को देखिए,
ये सुबह की हवा! ये सुबह की हवा!

ये नजारा है बस थोड़ी ही देर का,
मुफ्त ले लीजिए बस मज़ा खेल का,
ये सुबह की हवा! ये सुबह की हवा!

~ रमेश तैलंग
लिजिए बुधवारिय प्रस्तुति में...




पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे ..
✨️


इंसान होता है 
और 
कुत्ता, 
कुत्ता होता है 
दोनों प्रजातियों में 
स्वाभाविक अंतर होता है। 
इंसान ..
✨️
तरह, कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम गुज़रते रहे, कहने
को यूं तो बहोत सारे थे
रुकने के ठिकाने,
उम्र भर का
संधिपत्र
रहा
निरर्थक, हमक़दम रह कर भी एक दूसरे से
हम रहे अनजाने, कुछ स्मृतियाँ ओझल..
✨️

ऐसे पुरुषों से सवाल करना 
लगभग गुनाह है 
जो अपना प्रेम स्त्रियों पर उलीचने को 
लगभग बेसब्र हुए जा रहे हैं 

जो मजे से हँसकर कहते हैं 
मेरे पास बहुत प्रेम है 
और मैं सारे जमाने की औरतों में 
बांटना चाहता हूँ ..
✨️
✍️ अनीता सैनी
….
बहुत सुंदर संयोग है,
या कहूँ
अर्थ से भरी हुई नियति।

पीछे पलट कर
न देखने की चाह के बावजूद..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

4649... शब्दों का यह अधूरापन..

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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कभी जब मन उदास हो तो  कुछ भी नहीं अच्छा नही लगता और कभी नभ में उड़ता अकेला पक्षी भी मन को आशा से भर देता है। इसी तरह किसी की लिखी अच्छी, रौशन बातें पढ़कर भी मन उत्साह से भर सकता है। 
नकारात्मकता की भीड़ को परे धकेलकर
आइये क्यों न कुछ सकारात्मकता आत्मसात करें-
अपने जीवन में अच्छे बुरे बदलाव का कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ हम स्वयं होते हैं। दुनिया हमारे अनुसार चलेगी ऐसा सोचने से बड़ी बेवकूफी कुछ नहीं है।
कहीं पढ़ा था-
*"जब आप उड़ने के लिए पैदा हुए हो, तो जीवन में रेंगना क्यों चाहते हो?"
*“तुम सागर की एक बूंद नहीं हो। तुम एक बूंद में सारा सागर हो।”
*"अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं।"
*"दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।"
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आज की रचनाऍं- 

झड़ने शुरू हो जायेंगे 
पत्ते 
फेंक दिए जायेंगे 
बुहार कर शहर के बाहर 
कूड़े के ढेर में 
मिटटी से मिलने की उनकी चाहत 
अधूरी रह जायेगी 
इस बार भी . 




उसने हाथ बढाया

और गुलाब हाथ में लिया

गुलाब देने और लेने के

इस प्रक्रम में अनायास

उंगलिया स्पर्शित हो गई





शब्दों का यह अधूरापन वाक्य रूपी समाज में
एक चिरगामी रिक्तता का आविर्भाव कराता है।
यह रिक्तता व्यक्तिगत नैतिकता को जीर्ण करती है
और समाज को शून्यता के दुश्चक्र में झोंक देती है॥







मिट्टी का जिस्म मिले मिट्टी में ।
ले कर क़्या साथ बशर जायेंगे ।।

आईनों से मत सच को पूछो ।
सुन के सच, आप मुकर जायेंगे ।





आयुष ने रोहित की आँखों में देखा, आत्मविश्वास. वह आत्मविश्वास जो सिर्फ अच्छे अंकों से नहीं, बल्कि एक सुनिश्चित पृष्ठभूमि से आता है. रोहित के पिता आईआईटी से थे. उसकी बहन आईआईटी में थी. उसका घर शिक्षा से भरा था.

आयुष के पिता फैक्ट्री में सहायक मैनेजर थे. उनके लिए आईआईटी एक सपना था; एक ऐसा सपना जो वे अपने बेटे के माध्यम से पूरा देखना चाहते थे.
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

4648...बाकी मुँह पर ताला हउवै...

 शीर्षक पंक्ति; आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

भावों की अभिव्यक्ति

होता था  पहले  मे'यार   कभी   उनका,
अब  रिश्तों को  धन से  तोला जाता है।

मिल  जाती  है   एक  नई  इच्छा  उसमें,
मन  को  जितनी  बार  टटोला जाता है।
*****

आया सुंदर भोर

     मिटा   मन  के
          सारे   अवसाद 
     आया प्यारा सुंदर भोर
   सूर्य-किरण फैली चहुँ ओर 
  सभी जीव का मन विहसता
 खुशियों से तन - मन हुलसता
  उड़ी चिरैया भर मन उल्लास
    चहक कर करती परिहास
         खुश कर मन उदास
*****

अदृश्य विभाजनकिरण अपने बिस्तर पर वज्रासन की मुद्रा में थी. वह खादी के स्थान पर एक महंगे ट्रैकसूट में थी. और राजपूत परिवार की फिटनेस के प्रति सचेतता अभिव्यक्त कर रही थी.****चूड़ीदार ...

कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।

तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ? 

*****

एक प्रेम गीत लोकभाषा में-प्रेम के रंग

सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ

बाकी मुँह पर ताला हउवै

ई बाजारू प्रेम दिवस हौ

प्रेम क रंग निराला हउवै

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 










रविवार, 8 फ़रवरी 2026

4647...सुख सार्वजनिक है दुख निजी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया पूनम चौधरी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

समुद्री यात्रा

अब सुनो,

हम सागर की बात कर रहे थे

सागर में तैर रहा है एक जहाज़

जहाज़ पर हज़ारों लोग

लोगों में एक परिवार

जिनके मध्य बहता है प्यार

*****

पितामाँ और रोने की भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी

पिता कहते थे

पुरुष अगर रोए

तो समय को असहज कर देता है,

और समय

कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।

उन्होंने सिखाया,

सुख सार्वजनिक है दुख निजी

*****

पापा अब ठीक हो रहे हैं

अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।
*****

अलग-अलग लड़ाइयाँ

उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:

शत्रु: शिक्षा का पाखंड

 युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

शस्त्र: ज्ञान

 सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

 उसे लगा इसमें कमी है, पर क्या? वह सोचने लगा. उसे शगुन के मंत्र की याद आई.

*****

कविता: "बच्चे काम जा रहे है"

एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।

ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।

बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

4646..देख निज राजा बसन्ती, पुलकती फूली फली ।

सादर अभिवादन 

वासंती बयार प्रारम्भ
शिवरात्रि तक चलेगा

विश्वास करने को जी नहीं चाहता
कि ऐसे युग में भी जिए है हमारे अपने पूर्वज
70 पार की मानसिक हलचल

रचनाएं देखें



“हां मेरे समय के पहले की बात है। पर अपने बचपन में (1970 की आसपास) 
बनारस में कोयले से चलता रोड रोलर तो अपनी आंखों देखा है।” टुन्नू ने कहा।
बैलगाड़ी का कारवां, स्टीम इंजन की बस — हमारी कल्पना में भी नहीं था यह भारत, यह इलाका। 
मैने सोचा – गज़ब चल रहा है टुन्नू  का यह बताना। 
मैं टिप्पणी करने में असमर्थ हुआ





दृग से दृग का ज्यों हो मिलना
रेख अधरों का संवरना
दृष्टि में उतरा वसंती
कौमार्य का मादक सा हँसना
भाव गूँथे वेणियों में
केश बिच यामिनी का अंतरण है





तुम्हारा स्पर्श
किसी एक बिंदु पर
आकर ठहर जाता है,
जबकि मेरा अस्तित्व
घूमता रहता है
अपने ही केंद्र के चारों ओर।

तुम आगे बढ़ती हो
दिशा के भरोसे,
मैं लौट आता हूँ
हर बार
खुद तक।






एक प्याली  चाय और  तुम्हारी  हँसी
अपनी  हँसी  ...
सोती  जागती  भागती  जिंदगी
के  बीच   एक  स्त्री  की   हँसी 
वह  रिक्त  कोना  जहाँ   अक्सर  अपने
जिम्मेदारियों  का  बीहड़  उगाते  रहते  है






ओह बड़ा सुकून मिला यह सुनकर। चलो अच्छा हुआ कम से कम यहाँ अकेले नहीं रहना पड़ा।
उसने तसल्ली से सिर हिलाया। 
नाश्ता खत्म हो चुका था। उसने प्लेट उठा ली। काउंटर पर थर्मस फ्लास्क देखकर
मैंने पूछा क्या पिला रही हो चाय या काफी?
वह मुस्कुराई जो आप को पसंद हो मैम चाय भी है काफी भी है।
अच्छा तब एक कप बढ़िया कॉफी पिला दो ।वह कॉफी बनाने लगी। तब तक अन्य लोग चाय दूध कॉफी लेने वहाँ आ गये और मैं भी कुर्सी पर बैठ कॉफी पीने लगी।
काॅफी खत्म कर खड़े होते एक नजर उस पर डाली वह मुझे ही देख रही थी। सौंफ लेते मैंने उससे कहा नाश्ता कर लेना बेटा और अपनी भीगी आँखें उससे छुपाते बाहर आ गई 
इस उम्मीद के साथ कि सभी बेटियों को ऐसे ही प्यार के दो बोल मिलें चाहे वे कहीं भी हों। 




आ गए राजा बसन्ती, क्या छटा रस रूप की
मैं निराली संग हो ली, चिर सुहागिन भूप की ।

नाम मेरा सरस सरसों, बरस बीते मैं खिली,
देख निज राजा बसन्ती, पुलकती फूली फली ।


आज बस
सादर वंदन

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

4645....यात्राओं का अंत कभी मंजिल पर नहीं...

 शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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इस संसार  में सभी को अपनी ज़िंदगी में कुछ न कुछ चाहिए, नाम, यश, पैसा, प्रेम, परिवार, स्थिरता, सुख, भोग और सुरक्षा, जो कुछ भी इस नश्वर संसार में भावनात्मक अस्तित्व में है। कोई न कोई शिकायत या लगातार किसी न किसी अभाव से जूझते रहते लोग और उसी अभाव को भरने के लिए जीवन भर दौड़ते भी हैं।
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ख़ानाबदोश की प्रश्नवाचक यात्रा -सी
दर-ब-दर भटकती है ज़िंदगी
समय की बारिश के साथ
बहता रहता है उम्र का कच्चापन
देखे-अनदेखे पलों के ब्लैक बोर्ड पर
उकेरे
तितली,मछली,फूल, जंगल
चिड़िया,मौसम, हरियाली, नदी,
 सपनीले चित्रों के पंख
अनायास ही पोंछ दी जाती है
बिछ जाती है 
पैरों के नीचे
ख़ुरदरी , कँटीली पगडंड़ियाँ...
जिनपर दौड
कर आकाश छूने की
लालसा में ख़ुद को
भुलाये बस भागती
रहती है ज़िंदगी...।
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-श्वेता


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आज की रचनाऍं- 
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हर यात्री को लौटना होता है वहीं,
जहाँ से वह चलता है।
लौट आना प्रकृति है,
लौट आना प्रेम है।
यात्रा में लौटना यात्रा का सबसे अहम भाग है।
यात्राओं का अंत कभी मंज़िल पर नहीं
हमेशा प्रस्थान बिंदु पर ही होता है।



दाएं देखो 
बाएं देखो 
देखो सिग्नल बत्ती,
पटना, काशी 
दिल्ली, दमदम 
या गोवा, कवरत्ती,
मोबाइल से 
बात न करना 
रखना कम रफ़्तार.




बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से

झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता 


कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?

झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता  


छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब 

मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता 




भ्रम में मत रहो, 
मैं तुम्हारे पैरों में हूँ, 
पर अपने लिए नहीं, 
तुम्हारे लिए। 



लड़का हँसा: "बोर्ड का नियम है. यह हमारा 'लीगल एड्रेस' है. असली 'एजुकेशनल एड्रेस' तुम्हारा कोचिंग है."

लीगल एड्रेस. एजुकेशनल एड्रेस.

आयुष सोचने लगा: "यहाँ हमें 'विद्यार्थी' कहते हैं, पर यहाँ कोई विद्या नहीं. यहाँ बस बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है."

प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा हुआ. बिना देखे सिग्नेचर. पूरी प्रक्रिया में पाँच मिनट.

जाते-जाते उसने बोर्ड को फिर देखा: "शिक्षा ही उन्नति है." आज यह वाक्य झूठा लगा.





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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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