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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

4447...कौन नहीं जानता हमारे सिवा कि कितने बड़े मूर्ख हैं हम...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

शोभित

जब पुस्तक की कापियाँ शोभित को मिली, तब उसे यह भी जानकारी मिली कि गुरुपूर्णिमा नजदीक ही है। उसने गुरुपूर्णिमा के दिन मैडम के घर जाकर पुस्तक समर्पित करने का सोचा और इसीलिए मैडम के फुरसत के वक्त उन्हें फोन किया। मैडम से बात हुई। उन्होंने शोभित को सुझाया कि गुरुपूर्णिमा के दिन तुम्हारे घर के पास ही एक समारोह है गुरु पूर्णिमा के ही उपलक्ष्य में। वे चाह रही थीं कि यदि ऐतराज न हो तो शेभित उसी समारोह में आ जाए और समर्पण का काम भी वहीं कर लिया जाए । यदि नापसंद हो तो शाम को समय वह घर पर भी आ सकता है।

*****

संवाद

रूह महकी थी जिन अधूरे खत भींगी आँचल साझेदारी में l

नफासत नजाकत लाली शामिल जिसकी रुखसार तरफदारी में ll

काफिर महकी आँखें पेंचों उलझी जिसकी रहदारी में l

उत्कर्ष स्पर्श था उसकी चंदन बिंदी पहेली रंगदारी में ll

*****

 फ़र्स्ट अप्रैल

कौन नहीं जानता हमारे सिवा

कि कितने बड़े मूर्ख हैं हम,

सब जानते हैं, जितने हम लगते हैं,

असल में उससे ज़्यादा ही होंगे।

*****

सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले कभी सुखी नहीं रह पाए हैं

माना कि स्वतंत्र है
अपनी जिंदगी जीने के लिए
खा-पीकर,
देर-सबेर घर लौटने के लिए
लेकिन
क्यों भूल जाता है
कि पत्नी बैठी होगी
दिन भर की थकी हारी दरवाजे पर

*****

गुरुद्वारा पंज प्यारे भाई धरम सिंह, हस्तिनापुर

वाह-वाह गोविंद सिंह आपे गुरु चेला!

गुर सिमर मनाई कालका खंडे की वेला

वाह-वाह गोविंद सिंह आपे गुरु चेला!

पिवो पाहुल खंडे धार होए जनम सुहेला

गुरु संगत कीनी खालसा मनमुखी दुहेला!

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


4 टिप्‍पणियां:

  1. सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
    कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
    सुंदर अंक
    आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. 'गुरुद्वारा पंज प्यारे भाई धरम सिंह, हस्तिनापुर' , ko shamil karne ke liye dhanyvad

    जवाब देंहटाएं

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