सादर
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
रविवार, 25 सितंबर 2022
3527 ..कल विराजेंगी माताश्री और कल ही है महाराजा अग्रसेन जी की जयन्ती
शनिवार, 24 सितंबर 2022
3526... अहर्निश
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
इस कोलतार के नीचे
महज ज़मीन नही
मेरे बच्चों के खेलने के मैदान हैं
मेरे पुरखों की देह गंध हैं
इस मिट्टी में
जब तुम रो पड़ोगे
आदतन दांतों से नाख़ून कुतरते हुये
मेरी चारपाई का उपरी पायदान पकड़ कर
तब माफ़ कर देना अपने सर्जक को
उसकी अक्षमता को
सजती रहे ये महफ़िल मेरे बाद भी यूँ हीं ,
शेरो सुख़न का वो सिलसिला छोड़ जाऊंगा ।
यूँ हीं नहीं जाऊंगा सुनों देर ए फ़ानी से ,
जाते हुवे मन्ज़िल का पता छोड़ जाऊंगा ।
रँजूर हो जाएगी छलक छलक कर मीना ,
जिस रोज़ भी तेरा मयकदा छोड़ जाऊंगा
जब भी मैं सोचता हूँ कि
कैसे घूमती होगी पृथ्वी
अहर्निश अपनी धुरी पर, और
सूर्य के भी चारों ओर
परिक्रमा करती हुई
शुक्रवार, 23 सितंबर 2022
3525....तुम्हें उजालों की कसम
गुरुवार, 22 सितंबर 2022
3524...दूध-धुला मैं हूँ पापा!
शीर्षक पंक्ति:प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
पढ़िए आज की पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
एक ही थैली के
चट्टे-बट्टे की फ़ोर्जरी राइम
पापा: देश-प्रगति फिर रुकती क्यूँ,
रोज़ गरीबी बढ़ती क्यूँ?
चट्टे: बट्टे चोर बड़ा पापा,
मैं निर्दोष सदा पापा!
बट्टे: चट्टे चीट बड़ा पापा,
दूध-धुला मैं हूँ पापा!
जब भी नीचे
आना चाहा
मेरे पंख
सिमट न पाए
धरा पर आने
में असफल रहा
सूर्य की
तपती धूप से
भूख प्यास से
बेहाल हुआ
कच्ची धूप की पहली किरण
तुम्हारी पलकों पे जब दस्तक दे
हौले से अपनी नज़रें उठाना
नाज़ुक से मेरे ख्वाब
बिखर न जाएँ समय से पहले कहीं...
सुना है तुम चाँद पर रहने लगे हो..
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
बुधवार, 21 सितंबर 2022
3523...सूरज रोज़ निकलता है ..
।।प्रातः वंदन ।।
'रात-रात भर जब आशा का दीप मचलता है,
तम से क्या घबराना सूरज रोज़ निकलता है ।
कोई बादल कब तक रवि-रथ को भरमाएगा?
ज्योति-कलश तो निश्चित हीआँगन में आएगा!"
शिशुपाल सिंह 'निर्धन'
सृजन और विनाश का क्रम तो चलता ही रहता है.. इसी क्रम को आगे बढाते हुए नज़र डालें..✍️
विक्रम बेताल टॉक
विक्रम ने एक बार फिर पेड़ पर लटका शव उतारा और कंधे पर लटका कर चल दिया। शव में स्थित बेताल ने कहा-“हे विक्रम तेरा हठ प्रशंसनीय है। रास्ता लंबा है सो तुझे अधिक थकान न हो इसलिये एक कथा सुनाता हूँ। कथा के आखिर में मैं तुझसे सवाल पूछूंगा, अगर तूने जानते
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साहेब का चीता
कलयुग
दो मुस्कुराते नैन
नैन में जलधार देखा ।
लाल-नीला,श्वेत- श्यामल
सज रहा संसार देखा ॥
नैन में बहता समंदर
प्रेमांकुर
मंगलवार, 20 सितंबर 2022
3522 ....केवल ऊपर की पर्त ही घी की थी
सादर
सोमवार, 19 सितंबर 2022
3521 / जीव, तू क्यों मरता जीता है?
नमस्कार ! ब्लॉग जगत में आज कल कुछ सन्नाटा पसरा हुआ है ........ सबकी अपनी - अपनी समस्याएँ हैं ....... और मेरी आज के दिन ये समस्या कि नयी रचनाएँ ढूँढें से नहीं मिल रहीं ......... कोई बात नहीं ...... मैं भी निकल गयी हूँ पुरानी गलियों में ..... कुछ तो मिल ही जायेगा ........आखिर कुछ तो आपको मसौदा देना है पढ़ने के लिए ......... एक तरह से ब्लॉगर साथियों को चेतावनी भी है कि यदि ऐसा ही मौन धारण किये रहे तो भैया हम तो अपना डंडा - डोली ले कर निकल लेंगे ....... क्यों कि अब पुरानी गलियों की ख़ाक छानने की हिम्मत नहीं रही ....... यूँ तो बहुत कुछ है पढ़ने के लिए ........ लेकिन कितना घूमें न हम भी ...... उम्र हो गयी है तो थकान भी हो जाती है ...... थक कर थोडा सुस्ता लेते हैं ...... और चाय पी कर हो जाते हैं ताज़ा दम .....और आप मिलिए . कोलकता से ....
फ़ुरसत में ….! कुल्हड़ की चाय!
कोलकाता !
मुझे तुम अच्छे लगे!!
बंगाल की धरती, समाज को देखने और अनुभव करने के सुख के मामले में, अपने आप में अद्वितीय है। यहां की भूमि जहां एक ओर सहृदय, सामाजिक और रसिक लोगों की दुनियां है, वहीं दूसरी ओर जीवन की आपाधापी, और बिखराव के बीच परम्परा को सहेजती-समेटती दुनियां का आंगन भी है।
बहुत सजीव वर्णन किया है कोलकता का .| कुछ समय रहने का अवसर मिला था मुझे भी ...... और शहरों के मुकाबले अभी भी उसकी अपनी महक बाकी है ........वैसे हमें भी अब तो कोलकता छोड़े पंद्रह साल हो गए हैं ...... अरे ये कुल्ल्हड़ की चाय थी या कोई प्रसाद ? इसे पीने के बाद तो ऐसा लग रहा कि मन में अध्यात्मिक विचार पैदा हो गए हैं ........ या फिर असर है आज कल धर्म कर्म के बारे में कुछ ज्यादा ही सोच रही हूँ ........ और घूमते घूमते एक जीवन की सत्यता को कहती खूबसूरत रचना से भेंट हो गयी ........तो हाज़िर है आपके लिए भी .....
जीव, तू क्यों मरता जीता है?
जैसे कोई घर लौटा हो
जीवन का प्रसाद पाएगा
आज यहीं इस पल में जी ले,
दिल की धड़कन में जो गूँजे
गीत बनाकर उसको पी ले !
अब कौन घर लौटा है या नहीं ........ लेकिन हमारी सरकार विलुप्त होती चीतों की प्रजाति को बचाने के लिए चीतों को ज़रूर लौटा लायी है ........इस बात का काफी विरोध भी पढने में आ रहा है ..... वैसे भी किसी भी काम से हर इंसान तो खुश नहीं ही हो सकता ....... लेकिन फिर भी मैं एक लेख उठा लायी हूँ आप सबके लिए ....
चीते आ गए, स्वागत है
सोचती हूँ अक्सर..
आज़ाद हुई मैं
बोलो हे !....
सघन वीथिका में दृग हमारे
क्यूँ कर दिए वृहद् इतना
उभरती हैं जो वृतियाँ आज ये सहसा
उन्हें कुछ भिन्न सा दिखने लगा है ....
अब इस रचना के बाद मन और मस्तिष्क दोनों को ही थोड़े विश्राम की आवश्यकता है ......... तो आज बस इतना ही ......... आज की प्रस्तुति अधिकांश रूप से पुरानी पोस्ट पर ही आधारित है | ........ अगली बार देखते हैं कि कहाँ भटकती हूँ मैं .......... उम्मीद तो कर रही हूँ कि पढ़ कर आप निराश नहीं होंगे ........ फिर भी कोई सुझाव देना चाहें तो स्वागत है ........
मिलते हैं अगले सोमवार को ........ कुछ नए लिंक्स के साथ .....
नमस्कार
संगीता स्वरुप .






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