हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
इस कोलतार के नीचे
महज ज़मीन नही
मेरे बच्चों के खेलने के मैदान हैं
मेरे पुरखों की देह गंध हैं
इस मिट्टी में
जब तुम रो पड़ोगे
आदतन दांतों से नाख़ून कुतरते हुये
मेरी चारपाई का उपरी पायदान पकड़ कर
तब माफ़ कर देना अपने सर्जक को
उसकी अक्षमता को
सजती रहे ये महफ़िल मेरे बाद भी यूँ हीं ,
शेरो सुख़न का वो सिलसिला छोड़ जाऊंगा ।
यूँ हीं नहीं जाऊंगा सुनों देर ए फ़ानी से ,
जाते हुवे मन्ज़िल का पता छोड़ जाऊंगा ।
रँजूर हो जाएगी छलक छलक कर मीना ,
जिस रोज़ भी तेरा मयकदा छोड़ जाऊंगा
जब भी मैं सोचता हूँ कि
कैसे घूमती होगी पृथ्वी
अहर्निश अपनी धुरी पर, और
सूर्य के भी चारों ओर
परिक्रमा करती हुई
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पुनः भेंट होगी...
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