सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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शनिवार, 30 मई 2026
4758 डॉ. बशीर बद्र ..बिना बताए रुखसत हो गए
शुक्रवार, 29 मई 2026
4757....न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
अलविदा डॉक्टर बशीर बद्र
उर्दू ग़ज़लों के आसमान का इक ऐसा सितारा
, जिन्होंने न केवल अपनी कला से, बल्कि अपनी इंसानियत से भी पूरे एक दौर को रोशन कर दिया। आज, ऐसी ही एक रोशनी अचानक बुझ गई। डॉ. सैयद मुहम्मद बशीर बद्र का निधन एक संवेदनशील दौर के अंत का दुख है। यह महान ग़ज़लकार, जिसने हमें शब्दों के साथ इत्र की तरह जीना सिखाया, जिसने कोमलता से दुख व्यक्त किया और प्यार को रोज़मर्रा की ज़िंदगी की भाषा में ढाला, आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी ग़ज़लें आज भी अनगिनत दिलों में धड़कती हैं।
आज, जब समाज और भी ज़्यादा बँट रहा है, और भी ज़्यादा असहिष्णु और मशीनी होता जा रहा है, तब बशीर बद्र की ग़ज़लें हमें फिर से इंसान बनना सिखाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि शब्दों का काम दीवारें खड़ी करना नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ना है। उनकी ग़ज़लों में, मोहब्बत महज़ एक रोमानी जज़्बा नहीं है; यह इंसानियत का सबसे आला इज़हार है।
बशीर बद्र का इंतकाल उस आवाज़ का खामोश हो जाना है, जिसने दर्द को भी संगीत में बदल दिया था। लेकिन सच्चे शायर कभी नहीं मरते। वे अपने शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। आज भी, जब किसी तन्हा रात में कोई दिल टूट रहा होता है, तो शायद बशीर बद्र का कोई शेर उसे तसल्ली देता है। ग़ज़लों की दुनिया आज शोक में डूबी है, लेकिन शायद यही एक महान कवि की अमरता है—उनका शरीर भले ही चला जाए, पर उनकी भावनाएँ समय की सीमाओं से परे जीवित रहती हैं।
हमारे पॉंच लिंक परिवार की आपको विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
कमरा टेबल और मैं
शब्दों से भरे
कागज़ों का ढेर
बचपन के साथ साथ
बढ़ते गए भावनाओं के चिनार
चन्द दिनों भीड़ में
गुज़ारने के बाद
वापस खामोशी की ओर
रुख करना
बेरंग भूख की बस्ती में
आश्वासन रंग-बिरंगा है।
समझ रहे जिनको दाता
सच में वो भिखमंगा है।
जिसको उडता देख रहे
वह महज एक पतंगा है।
पत्तों पर गिरती हुई जल धार
अचानक सीढ़ियों से आयी
पानी गिरने की आवाज़
सोचा नहीं था कि होने लगेगी
घर के अंदर ही बरसात
देखते ही देखते बहने लगी
पानी की धार
पहली मंज़िल की बालकनी में
आ गयी थी बाढ़
गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।
बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।
“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।
“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।
गुरुवार, 28 मई 2026
4756 बरस रहा है पसीना टप टप, टप टप.
सादर अभिवादन
आशंकित जीव है मनुष्य
एक आम धारणा है कि यदि मैंने उपासना नहीं कि तो ईश्वर नाराज हो मुझे और मेरे परिवार को दंडित कर देंगे ! यह डर तो बचपन से इंसान के मन में बैठ जाता है, पर वह यह भूल जाता है कि प्रभु हम सबके पालनहार हैं, न्यायप्रिय हैं, दयालु हैं, बेवजह वे किसी को दंड नहीं देते ! हमारे कर्म ही हमारा भाग्य निर्धारित करते हैं ! पर अनहोनी का डर उसके दिलो दिमाग पर ताउम्र हावी रह उससे कुछ ना कुछ उल्टा-सीधा करवाता ही रहता है ! देखा जाए तो यह भी तो प्रभु की इच्छा अनुसार ही होता है...!
बुधवार, 27 मई 2026
4755..छूट गयी जब “मैं”
।।प्रातःवंदन।।
लहू-लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो,
शरीफ़ लोग उठे, दूर जा के बैठ गए।
~ दुष्यंत कुमार
बुधवार भोर और हम हाजिर है चिरपरिचित अंदाज में लिंकों के संग...✍️
अज फिर चर्चा में है इलीट ग्रुप की 'मीटिंग्स' का आलीशान ठिकाना... जिमखाना क्लब
केंद्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली के ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब पर बड़ा फैसला लेते हुए 5 जून तक उन्हें कैंपस खाली करने का आदेश दिया है. इसी आदेश के बाद अब आमजन के लिए कौतूहल का विषय बना जिमखाना क्लब अब चर्चा के केंद्र में आ गया है और साथ ही चर्चा में आ गए हैं वो लोग भी जो इस क्लब और इसकी रवायतों की आड़ में ना जाने क्या क्या कुचक्र रचते रहे हैं।.
✨️
एक गीत -मैं अपनी वंशी को टेरूंगा
गाओ कुछ
मैं अपनी
वंशी को टेरूंगा.
खेत हुए
अग्निकुण्ड
✨️
प्रचण्ड गर्मी
***
1.
धरा उबल रही
सूर्य अलाव।
2.
तपती धरा
हाहाकार है मचा..
✨️
कोई टूटा हुआ बल्ला भी मौसम बदल रहा है
किसी वीरान से लम्हे में जैसे कुछ मचल रहा है
✨️
छूट गयीं सहज
सारी व्यस्तताएँ
छूट गयी जब मैं,
सारे जहान का समय
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 26 मई 2026
4754.... ये परिस्थितियॉं चिर-परिचित हैं...
युद्धजनित ऊर्जा-संकट से
हाहाकार कर रही है,
प्रेम के लिए तो
ये परिस्थितियाँ
चिर-परिचित हैं;
वह तो अक्सर
अभाव, प्रतिबंध
और प्रतिरोध की अँधेरी सुरंगों में ही
सबसे अधिक परिपुष्ट होता है।
सोमवार, 25 मई 2026
4753...मानो यक़ीन, मुझको कभी घर नहीं मिला...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन प्रकाशित रचनाएँ-
कभी घर नहीं मिला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी
प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.
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क्या हम बंदरों की संतानें हैं?
विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है। इसके बजाय, दूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:*****फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 24 मई 2026
4752 भीतर ही तो तू मिलता है
सादर अभिवादन





















