निवेदन।


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रविवार, 26 जुलाई 2026

4815...हौंसले रख संभालकर पँछी...

 शीर्षक पंक्ति:आदरणीया डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

रविवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-

190- बैठ ऐसे न हारकर पँछी!

पथ में सूरज कभी सताता है
खुद भी जलता , तुझे जलाता है
इसको ढलना , ढलेगा ही,इसका
आना-जाना यही बताता है -
हौंसले रख संभालकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी!

*****

ज़रा ठहरो!

​लेकिन सुनो,

यह आक्रोश जो तुम्हारी रगों में उबाल मार रहा है,

 कोई अभिशाप नहीं,

 तुम्हारी बची हुई जिजीविषा का प्रमाण है।

यह प्रमाण है कि तुम अभी मरे नहीं हो,

तुम व्यवस्था की खामोश बेड़ियों को

स्वीकारने से इंकार करते हो।

​पर इस आग को

केवल राख बन जाने के लिए मत जलने दो।

​*****

शिक्षा : सबसे बड़ा अस्त्र

जब विद्यार्थी
अपने अधिकार—शिक्षा—के लिए सड़कों पर उतरते हैं,
जब विद्यालयों के बंद होने की खबरें आती हैं,
और जब एक बेटी को शिक्षा के लिए
अपना जीवन गंवाना पड़ता है,
तो यह केवल एक परिवार का नहीं,
पूरे राष्ट्र का दर्द बन जाता है।
*****

छात्र आंदोलन जंतर मंतर

सेंक रहे सब गर्म तवे पर,दो रोटी।
उजले कपड़े नीयत रखते,जब खोटी।।
समाधान में चिकनी चमड़ी,रख मोटी।।
राजनीति की चौसर खेले,नित गोटी।।

*****

काई की पहली हरियाली

तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।

*****

बघेरा मर गया

कल अचानक एक चीख से सुनी जैसे किसी पिले को किसी ने मारा हो जैसे। बाहर देखा तो कुछ नहीं दिखा। 
आज सुबह पता चला कि बघेरा मार गया। मोंटू के आंगन में ही। एरिका वाणी बघेरा को देख रही थी हैरान परेशान। ये क्या हो गया। एरिका ज्यादा परेशान थी।  स्कूल जाने से मना कर रही थी। हम एरिका को नहीं समझ सकते ना ही उसके स्नेह को।  डांट डपट कर एरिका और वाणी को स्कूल भेज दिया। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 

और हां एक बात बताना मैं भूल गया चारों पीलें , बघेरा और स्नोई सभी सुनामी से भी घुलमिल गए थे। सुनामी माला और सुमित की विदेशी नस्ल की कुतिया। बड़ा डर लगता है उससे। स्नोई चारो पीलें और बघेरा सब उससे कब घुलमिल गए मालूम नहीं। अचरज होता था ये देख कर। 
*****
ख़ुश-ख़बरी!

'पाँच लिंकों का आनन्द' अपने सुधी पाठकों एवं रचनाकारों के लिये 'पाक्षिक लघुकथा' अंक आरम्भ करने जा रहा है। लेखक रचना की स्वरचित व मौलिक होने की घोषणा के साथ आगामी अंक में प्रकाशन हेतु भेज सकते हैं। लघुकथा पाक्षिक अंक में प्रकाशन हेतु लघुकथा भेजने की 

अंतिम तिथि: 30 जुलाई 2026 एवं प्रकाशन की तिथि 02 अगस्त 2026 

कैसे भेजें: ब्लॉग संपर्क फार्म के ज़रिये। 
आपके द्वारा लिखी गयी लघुकथाएँ 'पाँच लिंकों का आनन्द' पर प्रकाशित की जाएँगीं साथ ही वरिष्ठ ब्लॉगर एवं लेखक आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी के द्वारा प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा। 

लघुकथा और लघु कथा में अंतर है जिसे नीचे विस्तार से समझाया गया है।     

 हिंदी साहित्य के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में'लघुकथा’ और ‘लघु कथा’ के बीच का अंतर केवल एक 'स्थान' (Space) या वर्तनी का नहीं है, बल्कि यह विधात्मक और संरचनात्मक अंतर है।

अक्सर आम भाषा में लोग इन्हें एक ही मान लेते हैं, परंतु साहित्य-शास्त्र और वर्तमान प्रयोग की दृष्टि से इनमें मौलिक भेद है।

 आधारभूत अंतर 

आधार                               लघुकथा                                                          लघु कथा

1.शब्द-विन्यास-                सामासिक संयुक्त शब्द है।                                         दो पृथक शब्द (विशेषण+विशेष्य)

2. विधागत स्थिति-            हिंदी-साहित्य की स्वतंत्र विधा।                                   यह कहानी विधा का एक रूप है। 

3. आकार/शब्द सीमा-      अत्यंत सूक्ष्म (सामान्यतः 100-500 शब्द)                     अपेक्षाकृत बड़ी (सामान्यतः 800-2500+ शब्द)

4. केन्द्र बिंदु-                     एक क्षण, एक बिंदु अथवा एक मारक विचार।            जीवन का विस्तृत फ़लक,चरित्र-विकास और घटनाक्रम। 

5. शिल्प/तकनीक-            अंत में यकायक प्रहार(Punch Line)                           क्रमिक विकास(प्रारम्भ,मध्य, चरमोत्कर्ष और अंत)

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:

(क) लघुकथा (एक शब्द /स्वतंत्र विधा)   

यह हिंदी साहित्य में पिछले पाँच-छह दशकों में तेज़ गति से विकसित हुई एक गद्य-विधा है।

 एकता और तीखापन: इसमें जीवन के किसी एक दृश्य, विचार या घटना का क्षणिक चित्र होता है। इसमें अनावश्यक विवरण, चरित्रों का लंबा परिचय या पृष्ठभूमि के लिए जगह नहीं होती।

 अंतिम प्रहार (Punch/Climax): लघुकथा की सबसे बड़ी पहचान इसका 'अंतिम वाक्य' या 'अंतिम विचार' होता है जो पाठक की संवेदना और चेतना पर गहरा प्रहार करता है।

 संकेतात्मकता: इसमें कम से कम शब्दों में बड़ी बात कही जाती है। व्यंग्य, प्रतीकात्मकता और संकेत इसके मुख्य हथियार हैं।

उदाहरण के लिए: यदि कोई रचना केवल 150 शब्दों में रिश्वतखोरी या सामाजिक विडंबना पर बिना किसी अनावश्यक विस्तार के तीखा प्रहार करती है और अंत में पाठक को सोचने पर मज़बूर कर देती है, तो वह लघुकथा है।

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। 

(ख) लघु कथा (दो शब्द/छोटी कहानी)

यहाँ 'लघु' एक विशेषण (Adjective) है, जो 'कथा' (Story) की लंबाई या आकार को छोटा बताता है।

 आकार में छोटी कहानी: यह मूलतः 'कहानी' विधा ही है, जो आकार में थोड़ी छोटी होती है (जैसे औसत 1000 से 1500 शब्दों की कहानी)।

 विस्तार और चरित्र विकास: इसमें पात्रों का थोड़ा परिचय, पृष्ठभूमि का वर्णन, घटनाओं का उतार-चढ़ाव और विस्तृत संवाद शामिल हो सकते हैं।

 कथानक का फैलाव: इसमें जीवन के एक से अधिक पहलुओं या घटनाओं के प्रभाव को दिखाया जा सकता है।

 वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में स्थिति:

वर्तमान साहित्यिक परिवेश में इन दोनों रूपों को लेकर एक स्पष्ट विमर्श और प्रवृत्ति दिखाई देती है:

1. दिल्ली-एनसीआर (वैचारिक और पत्र-पत्रिकाओं का केंद्र)

लघुकथा की संगठनात्मक उपस्थिति: दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में लघुकथा के बाकायदा मंच, सम्मेलन और समर्पित पत्रिकाएं (जैसे लघुकथा वृत्त, सबलोगआदि में विशेष स्थान) मौजूद हैं।

 यहाँ लघुकथा को एक ऐसी स्वतंत्र विधा माना जाता है जो तत्काल सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं (जैसे- मीडिया का ध्रुवीकरण, महानगरीय अकेलापन, उपभोक्तावाद) पर त्वरित टिप्पणी करती है।

2. उत्तर प्रदेश (विधागत अनुशासन और बहस): उत्तर प्रदेश (लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, आगरा आदि) हिंदी साहित्य के सिद्धांतों का बड़ा केन्द्र रहा है।

  यहाँ के आलोचकों और लेखकों ने 'लघुकथा' और 'लघु कथा' के अंतर को रेखांकित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ लघुकथा को "गागर में सागर भरने" की कला माना गया है, न कि केवल "किसी बड़ी कहानी का संक्षिप्त रूप।"

3. बिहार और झारखंड (सामाजिक यथार्थ और आक्रामकता)

  बिहार और झारखंड के आंचलिक और शहरी क्षेत्रों में लिखी जा रही लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ, जातिगत विषमता, भ्रष्टाचार और विस्थापन के मुद्दे प्रमुखता से आते हैं।

 यहाँ लिखी जाने वाली लघुकथाएँ भाषा की दृष्टि से अत्यंत सीधी, मारक और आमजन की भाषा के करीब होती हैं।

 निष्कर्ष

 यदि आप एक अत्यंत संक्षिप्त (100-400 शब्द), बिना किसी अतिरिक्त विवरण के, अंतिम वाक्य में गहरा प्रहार करने वाली स्वतंत्र विधा की रचना लिख या पढ़ रहे हैं, तो वह लघुकथा है।

 यदि आप एक ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जिसमें पात्र हैं, वातावरण का वर्णन है, घटनाक्रम का विकास है, लेकिन वह आकार में बहुत लंबी न होकर छोटी (800+ शब्द) है, तो वह लघु कथा (छोटी कहानी) है।

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फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 25 जुलाई 2026

4814....भय केवल मन की छाया है

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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​यह तुमुनाद नहीं,

यह चेतावनी की दुदुंभियॉं है।

यह उबलते हुए रक्त की घेराबंदी है

जो हर छलावा और ढोंग का

इन्द्रजाल तोड़ना चाहती है।

सावधान!

 असंतोष का यह भू-डोल

बदलाव का नया भू-गोल

गढ़ने को आतुर है...।

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पांच लिंकों का अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम
लघुकथा लिखिए ....
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट--

शब्द विशेष है "कल्पना"
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए
रचना भेजने की अंतिम तिथि 30 जुलाई 2026
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म द्वारा
2 अगस्त 2026 को प्रथम अंक
पाक्षिक प्रकाशन
रचनाओं का चयन आपके द्वारा
निश्चित रूप से  आप बेहतर लिखते है
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली
पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा।


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आज की रचनाऍं-


अस्तित्त्व में आया हुआ द्वीप हूँ मैं 
घृणा के गान से उपजी 
प्रचंड आँधियों के बीच जलता हुआ दीप हूँ मैं 
गीदड़ों के कोलाहल में 
गूँजता हुआ सिंहनाद हूँ मैं 



हो अपार गगन जहाँ सम्मुख 

मार्ग स्वयं ही खुलता जाता, 

भय बनकर तो मात्र ह्रदय का 

अंधकार ही जलता जाता ! 


हो भयभीत न पीछे मुड़ना 

सदा स्वर्ण को तपना पड़ता, 

हर इक लपट निखारे जाती 

 अंतर ओज ही साहस बनता !



हर तकरार में
यूँ तो तुमसे हार जाता हूँ,
और तुम हर बार
पूरे कमरे में
जीत की मुस्कान लिए फिरती हो।



नहीं जलती कोई लालटेन,

चुक जाते हैं दीपक के तेल-बाती,

जब नहीं भड़कता कहीं कोई शोला, 

जब नहीं सूझता हाथ को हाथ,

घनघोर अंधेरा हँसता है ठठाकर,

तब मैं उठाता हूँ बीड़ा,




सूखी धरती की प्यास लिए,
हरियाली का विश्वास लिए,
माटी की सौंधी साँस लिए,
जीवन का मधु-उल्लास लिए,
चलता अपना प्रकाश लिए

करुणा की अनुपम जागीर,
यह हिमगिरि का बहता नीर।


   इस अनुभव के मद्देनजर अब मानने लगी हूँ कि लेखक के जीवन का अभिन्न अंग सिर्फ लेखन ही नहीं, कुप्रचार झेलना भी है। साहित्य में अच्छा लिखना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उन बातों से अप्रभावित रहना जो आपकी अनुपस्थिति में कही जा रही हैं।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

4813 ...लघुकथा लिखिए .... अब आप लिख ही डालिए

 सादर अभिवादन 


 पांच लिंकों की अगस्त माह से
एक अभिनव कार्यक्रम (पाक्षिक)
लघुकथा लिखिए .... अब आप लिख ही डालिए
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म 
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी 
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली 
पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा


मेरी पसंदीदा रचनाएं



श्रावण! तुम केवल जलधारा, 
केवल बादल, केवल मेघ नहीं,

तुम जीवन की मौन प्रार्थना, 
करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।

तुमसे ही सूखे अन्तरवन में 
फिर हरियाली जन्मे है,

तुमसे ही मानव के उर में 
फिर विश्वास का सेतु रहे।




“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।





नहीं ठहरता काल तनिक,
तुमसे जादा कौन जाने।
कितने आए कितने गए,
लंगड़े, बहरे काने।

ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर,
आ गए आलमगीर।
रुन्ड-मुन्ड चीखे दारा का,
हाय! हिंद की पीर।





जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सावन का महीना आ गया
चलते- चलते एक गीत तो बनता है

सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ 
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सांवरिया तेरी याद में
सांवरिया तेरी याद में तेरी चिट्ठियां बाँचूँ
हो-हो सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ



सादर समर्पित
सादर वंदन

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

4812 ...अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम

 सादर अभिवादन
अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम
लघुकथा लिखिए ....
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म 
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी 
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली 
पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा


मेरी पसंदीदा रचनाएं

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया


एक दिन वह नदी किनारे अपने घर के बाहर खड़ा था, उसने देखा कि नल से पानी की बूंद टपक कर जमीन पर गिरी और बर्फ बन गई ! उधर नदी का पानी बेकार बह कर बर्बाद हुआ जा रहा था ! उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि इस पानी को किसी तरह जमा दिया जाए तो लद्दाख में पानी की किल्लत दूर हो सकती है !

उसने अपनी योजना का खाका तैयार किया और गांव वालों को साथ ले, उसे मूर्त रूप देने में जुट गया ! सबने मिल कर वहीं के मिटटी-पत्थरों का उपयोग कर, छोटी-छोटी नहरें बना, नदी के पानी का रास्ता बदल उसे पास की छायादार घाटी में बांध बना संग्रहित कर दिया ! कड़ाके की सर्दी में वह पानी जम कर, बर्फ के विशाल ढेर में बदल वहां स्थित हो गया ! इस तरह इंसान ने प्रकृति से होड़ ले, पहाड़ की छोटी से काफी नीचे अपना एक कृत्रिमिक ग्लेशियर बनाने में सफलता पा ली !



रात के इस दूसरे पहर में



दिखा एक चौपाया
जो देखते ही देखते
खड़ा हो गया तो पांवों पर
दौड़ गई सिहरन मेरुदंड पर
टूट गई नींद
तो पाया कि
सपने के बाहर भी
एक बियाबान जंगल है
चार दीवारों के बंद कमरे में
जिसमें कौंधते हैं
परिचित-अपरिचित चेहरों के
गड्ड-मड्ड होते डरावने चेहरे


पहले होर्डिंग का जन्म


पहले होर्डिंग का जन्म
यकीनन
पहले झूठ के साथ हुआ होगा।

और सतरंगी पहला झूठ
शायद
भाषा के आविष्कार के साथ
जन्मा होगा।


नहीं समझोगे ,,,


जिसने गले लगाया, वो हम थे,
लिबास बदलने से बदल नहीं जाता
फ़क़त कोई किरदार 'परचेत',
तुम जानते हो, तमाशा खडा करने मे
वरना हम क्या किसी से कम थे?

सादर समर्पित
सादर वंदन
  

बुधवार, 22 जुलाई 2026

4811..अपना ख़्याल रखा करो

 ।।भोर वंदन।।

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है 

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए 

और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा 

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए 

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।

अवतार सिंह संधु ‘पाश’

सारगर्भित  विचारो के साथ नजर डाले ..✍️

कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..

एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 

तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 

हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म 

आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी 

साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा प्रकाशित होने वाली
त्रैमासिक पत्रिक में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा


प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो...


यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है।

यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उन छोटी-छोटी चूकों का आईना दिखाती है जिन्हें हम अपने अहंकार, जल्दबाज़ी और पूर्वाग्रह से इतना बड़ा बना देते हैं कि रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं।

जीवन में गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। अस्वाभाविक तब होता है, जब हम उन गलतियों को इलास्टिक की तरह खींचते चले जाते हैं, इतना कि वे केवल भूल नहीं रहतीं, किसी के सम्मान पर चोट बन जाती हैं। क्योंकि हर गलती अपराध नहीं होती, और हर चुप्पी दोष स्वीकार..

✨️

धूप

जलते रहे



ज़िंदगी की धूप में

पाँव के छालों की

परवाह किये बगैर

बिना रुके बिना थमे

✨️

अपना ख़्याल रखा करो

मेरी ज़रूरतों पर ज़रा

नीयत-ए-हलाल रखा करो,

कि बेशकीमती हो तुम

मेरी जां, तुम अपना ख्याल रखा करो.......

✨️

चेहरे को धोना चाहिए था

 ग़ज़ल

मुझे चाँदी न सोना चाहिए था

फकत सपना सलोना चाहिए था

अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे

तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था..

✨️

भीतर दीपक एक जला है 

बना रहे जागरण ह्रदय में 

धरा-गगन पावन बन जाते, 

दें दृष्टि सम्मान की भीतर 

ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते ! 

ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता 

ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,

धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा ..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️







मंगलवार, 21 जुलाई 2026

4810 कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई, ये सोच समंदर उदास है

 सादर अभिवादन 


सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
-दिनकर

मेरी पसंदीदा रचनाएं





तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।





जिसमें मेरे प्रेम का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम का ब्याज
दोनों शामिल हैं।

क्योंकि यह सिर्फ जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त में
हम दोनों का होना जरूरी है।




वो भी विवश होकर कुटिया में जितनी भी खाने की सामग्री थी उससे ही राधा जी का भोग लगाते और खुद भोजन करते ऐसे करते करते कुछ दिन तो बीत गए लेकिन अंत में एसी परिस्थिति हों गयी न तो कुटिया में खाने को कुछ रहा न तो कहीं भिक्षा मिल रही थी ,,,






सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI

कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI





हम आँख पर पट्टी बाँधकर बैठे हैं
कि वांगचुक छला जा रहा जंतर मंतर पर
सच तो यह है कि 'उस' भीड़ के अलावा
हम सब छले जा रहे
हमारी आत्माओं पर बोझ बढ़ रहा





आप पुराने हो जाएँगे
वे मुझे डराने की कोशिश करते हैं
मैं पहले से ही डरा हुआ हूँ
मैं जानकारी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर बहुत ज्यादा निर्भर करता हूँ
अपने दिमाग से ज़्यादा
जिसने मुझे सज़ा दी है



‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 



सादर समर्पित
सादर वंदन

सोमवार, 20 जुलाई 2026

4809...देखो…, मेरे पास काम बहुत हैं और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में प्रस्तुत हैं  पाँच+ रचनाएँ-

अस्वीकरण: अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय कंटेन्ट प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंदपरिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।

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आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-

शुरुआत

देखो…,

मेरे पास काम बहुत हैं

और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत

मेरी मानो तो ..,,

खाली वक्त में थोड़ा

आत्ममंथन करना

*****

जगन्नाथ से संवाद

मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल

अश्रु धारा में घुल गया काजल,

घनघोर घटा-सी घिर आई रात,

नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद

स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।

*****

1506 मेघ से मनुहार 

यह धरा ऊसर है तुम बिन

नद स्तर है निम्न तुम बिन

कितने जोड़े सूखी आँखें

बाट जोहती रोज दिन गिन

तप्त धरतीशुष्क वन हैं

आस में सूखे नयन हैं

*****

उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो?

जब संसार में लोकतांत्रिक व्यवस्था आरंभ हुई थी तो मताधिकार केवल वयस्क पुरुषों को दिया गया था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था। संसार की आधी जनसंख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने से वंचित थी। महिला समुदाय ने यह अधिकार लंबे संघर्ष के उपरांत प्राप्त किया। आज किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की बात और विचार पुरुषों की भांति ही महत्व रखते हैं। स्वतंत्र भारत में वयस्क मताधिकार में महिलाओं को आरंभ से ही सम्मिलित रखा गया। यह पृथक् बात है कि सदनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

*****

मन के पार ही वह मिलता है

शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है।

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गांधी के उपवास

देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया थाबेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखेजिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

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फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


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