निवेदन।


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शनिवार, 30 मई 2026

4758 डॉ. बशीर बद्र ..बिना बताए रुखसत हो गए

सादर अभिवादन


डॉ. बशीर बद्र ..बिना बताए रुखसत हो गए
मशहूर है जो अचानक मौजूं हो उठा है- 
‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दे 
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।‘


हालांकि बशीर साहब के लिए यह शाम न जाने कितने बरसों से ढल ही रही थी, उनकी याद जा चुकी थी, जो मुशायरे वे लूटा करते थे, वे बीत चुके थे, उनकी शायरी लोगों के बीच थी, बस उनकी ज़ुबान पर नहीं थी, उनको देखने वाले मायूस हुआ करते थे कि ज़िंदगी ने उनके महबूब शायर के साथ क्या किया। लेकिन आखिरकार ये बाज़ी खत्म हुई। शायर चला गया, और हमारे पास उसकी शायरी बची हुई है- एक रोशनी की तरह, जिसमें हम अपनी भी शक्ल देख सकते हैं और अपना रास्ता भी पहचान सकते हैं।

रचनाएं




बातें कम होती गईं, सपने रूठ गए
खुद को, दुन‍िया भर के खूबसूरत दृश्‍यों को
आंखें देखतीं, पर उनमें ठहरता नहीं कुछ 
मगर न रोई नहीं, न अफसोस क‍िया  




कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये





आज माँ नहीं है 
फिर भी 
नए कपड़े पहनते वक़्त 
सोचता हूँ 
आज पहनूँ 
या तब 
जब किसी बड़े के घर जाना हो 




धान रोपते 
खेतों में फिर 
पायल छन छन बोलेगी,
ठंडी ठंडी पुरवा 
फिर यादों की 
खिड़की खोलेगी,
प्यासे पर्वत 
झरनों का जल 
पीकर गीत सुनाएंगे.

सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 29 मई 2026

4757....न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए"


अलविदा डॉक्टर बशीर बद्र

   उर्दू ग़ज़लों के आसमान का इक ऐसा सितारा 

, जिन्होंने न केवल अपनी कला से, बल्कि अपनी इंसानियत से भी पूरे एक दौर को रोशन कर दिया। आज, ऐसी ही एक रोशनी अचानक बुझ गई। डॉ. सैयद मुहम्मद बशीर बद्र का निधन एक संवेदनशील दौर के अंत का दुख है। यह महान ग़ज़लकार, जिसने हमें शब्दों के साथ इत्र की तरह जीना सिखाया, जिसने कोमलता से दुख व्यक्त किया और प्यार को रोज़मर्रा की ज़िंदगी की भाषा में ढाला, आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी ग़ज़लें आज भी अनगिनत दिलों में धड़कती हैं।

आज, जब समाज और भी ज़्यादा बँट रहा है, और भी ज़्यादा असहिष्णु और मशीनी होता जा रहा है, तब बशीर बद्र की ग़ज़लें हमें फिर से इंसान बनना सिखाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि शब्दों का काम दीवारें खड़ी करना नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ना है। उनकी ग़ज़लों में, मोहब्बत महज़ एक रोमानी जज़्बा नहीं है; यह इंसानियत का सबसे आला इज़हार है।


बशीर बद्र का इंतकाल उस आवाज़ का खामोश हो जाना है, जिसने दर्द को भी संगीत में बदल दिया था। लेकिन सच्चे शायर कभी नहीं मरते। वे अपने शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। आज भी, जब किसी तन्हा रात में कोई दिल टूट रहा होता है, तो शायद बशीर बद्र का कोई शेर उसे तसल्ली देता है। ग़ज़लों की दुनिया आज शोक में डूबी है, लेकिन शायद यही एक महान कवि की अमरता है—उनका शरीर भले ही चला जाए, पर उनकी भावनाएँ समय की सीमाओं से परे जीवित रहती हैं।


हमारे पॉंच लिंक परिवार की आपको विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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किसी का जाना महज जाना नहीं होता
मगर दुनिया में संग किसी के मर जाना नहीं।
रो-रोकर तडप के भी यादों की गलियॉं में 
 साथ किसी के सॉंसों का थम जाना नहीं होता।#श्वेता
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आज की रचनाऍं- 

कमरा टेबल और मैं 

शब्दों से भरे

कागज़ों का ढेर 

बचपन के साथ साथ 

बढ़ते गए भावनाओं के चिनार 

चन्द दिनों भीड़ में 

गुज़ारने के बाद

वापस खामोशी की ओर 

रुख करना 







बेरंग भूख की बस्ती में

आश्वासन रंग-बिरंगा है।

 

समझ रहे जिनको दाता

सच में वो भिखमंगा है।

 

जिसको उडता देख रहे

वह महज एक पतंगा है।

 



पत्तों पर गिरती हुई जल धार 

अचानक सीढ़ियों से आयी

पानी गिरने की आवाज़

सोचा नहीं था कि होने लगेगी 

घर के अंदर ही बरसात 

देखते ही देखते बहने लगी 

पानी की धार

 पहली मंज़िल की बालकनी में 

आ गयी थी बाढ़




गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।

बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।

“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।

“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।




नाटक के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भरसक, कहीं-कहीं तो कालजयी हैं। बानगी देखिए – ‘धर्म अगर इंसानियत से बड़ा हुआ तो ईश्वर भी रोएगा’, ‘वोट नहीं, संकल्प दो’, ‘जहाँ शरीर क़ैद होता है, वहीं आत्मा का विस्तार होता है। इतिहास के सबसे उजले अध्याय अक्सर जेल की कोठरियों में लिखे जाते हैं’, ‘जब विचार हथियार बन जाए और जनता ढाल, तब इतिहास की दिशा बदलती है’, आज़ादी बाहर नहीं होती, भीतर होती है’, ‘समय बहुत कुछ छीन लेता है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय को ही बदल देते हैं’, ‘जो आज पीछे हटा, समझो वह पीढ़ियों तक झुका रहेगा’, ‘क्रान्ति केवल टकराव नहीं, साहचर्य भी है। जहाँ विचार मिलते हैं, वहाँ इतिहास की रगों में रक्त तेज़ी से बहने लगता है’, तुम्हारे साहस में करुणा भी है’, और अंत में संवेदना का गढ़ियापन शब्दों में उतरता देखिए, ‘आज कोई माँ हिन्दू नहीं, कोई माँ मुसलमान नहीं, सबकी कोख डर से थर-थर काँप रही है, बाबू!’ 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 28 मई 2026

4756 बरस रहा है पसीना टप टप, टप टप.

 सादर अभिवादन


बरस रहा है पसीना 
टप टप, टप टप.
नौतपा का चौथा दिन

रचनाएं





दीवारों से नहीं बना है 
असली घर है रिक्त आकाश, 
वातावरण विशुद्ध बना लें 
अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !

वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों 
भाव विमल मुस्कान सजीली, 
घर के भीतर रहने वाला 
हर इक छेड़े तान सुरीली !





"चलो प्रिया, अब आज का काम तो बहुत अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?

प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर संभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.




जीवन की राह सँवारी,
छाँव सुला देती।

जलते पथरों पर
नंगे पाँव चलना सीखा,
हौसले खिल उठे।




बरस रहा है पानी रिमझिम,
तर हो गई है सूखी मिट्टी,
जुताई के लिए तैयार हैं खेत,
अब गूंजना चाहिए फ़ज़ाओं में 
उल्लास में तर संगीत। 



आशंकित जीव है मनुष्य



एक आम धारणा है कि यदि मैंने उपासना नहीं कि तो ईश्वर नाराज हो मुझे और मेरे परिवार को दंडित कर देंगे ! यह डर तो बचपन से इंसान के मन में बैठ जाता है, पर वह यह भूल जाता है कि प्रभु हम सबके पालनहार हैं, न्यायप्रिय हैं, दयालु हैं, बेवजह वे किसी को दंड नहीं देते ! हमारे कर्म ही हमारा भाग्य निर्धारित करते हैं ! पर अनहोनी का डर उसके दिलो दिमाग पर ताउम्र हावी रह उससे कुछ ना कुछ उल्टा-सीधा करवाता ही रहता है ! देखा जाए तो यह भी तो प्रभु की इच्छा अनुसार ही होता है...! 
 


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 27 मई 2026

4755..छूट गयी जब “मैं”

।।प्रातःवंदन।।

 लहू-लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो, 

शरीफ़ लोग उठे, दूर जा के बैठ गए।

~ दुष्यंत कुमार

बुधवार भोर और हम हाजिर है चिरपरिचित अंदाज में लिंकों के संग...✍️


अज फ‍िर चर्चा में है इलीट ग्रुप की 'मीट‍िंग्स' का आलीशान ठिकाना... जिमखाना क्लब

 केंद्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली के ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब पर बड़ा फैसला लेते हुए 5 जून तक उन्हें कैंपस खाली करने का आदेश दिया है. इसी आदेश के बाद अब आमजन के ल‍िए कौतूहल का व‍िषय बना ज‍िमखाना क्लब अब चर्चा के केंद्र में आ गया है और साथ ही चर्चा में आ गए हैं वो लोग भी जो इस क्लब और इसकी रवायतों की आड़ में ना जाने क्या क्या कुचक्र रचते रहे हैं।.

✨️

एक गीत -मैं अपनी वंशी को टेरूंगा 

गाओ कुछ 

मैं अपनी 

वंशी को टेरूंगा.


खेत हुए 

अग्निकुण्ड 

✨️

प्रचण्ड गर्मी


***

1.

प्रचण्ड गर्मी

धरा उबल रही

सूर्य अलाव।

2.

तपती धरा

हाहाकार है मचा..

✨️

लम्हे भर का बचपन

कोई टूटा हुआ बल्ला भी मौसम बदल रहा है

किसी वीरान से लम्हे में जैसे कुछ मचल रहा है

✨️

छूट गयी जब “मैं”

छूट गयीं सहज

 सारी व्यस्तताएँ

छूट गयी जब मैं,

सारे जहान का समय

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 26 मई 2026

4754.... ये परिस्थितियॉं चिर-परिचित हैं...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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इस सृष्टि में पूर्णतया नष्ट कुछ भी नहीं होता,हर कण  परिस्थितियों के घर्षण से स्वरूप बदल लेती है।
एक प्रेम ही है जो हर रूप में शांति और आत्मिक सुख की जादुई अनुभूतियाँ
  सतत प्रवाहित करता रहता है।
प्रेम की अनुभूति का अलौकिक सुख समय की भट्ठी में चढ़कर मीठा होता या फीका यह परिस्थितियों की आँच पर निर्भर है।
प्रेम करना जितना सहज है प्रेम से मिली पीड़ा को सहना उतना ही कष्टकारी। 
पर सच तो यह भी है कि
क्रोध,लोभ,मोह अंहकार, ईष्या जैसी भावनाओं की विषाक्तता को मिटाने की एक औषधि है संसार में  वह है प्रेम। प्रेम जो मनुष्य को साधारण से विशेष होने की अनुभूति कराता है।
प्रेम को परिभाषित करने में हर शब्द, हर भाव असमर्थ हो जाते है। 
प्रेम की कोई भाषा नहीं 
होती, प्रेम का फूल मौन में खिलता हैं। प्रेम संगीत है, प्रेम अंतर्नाद है, प्रेम ही अनाहद नाद है।
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आज की रचनाऍं- 

आज जिस तरह दुनिया
युद्धजनित ऊर्जा-संकट से
हाहाकार कर रही है,
प्रेम के लिए तो
ये परिस्थितियाँ
चिर-परिचित हैं;
वह तो अक्सर
अभाव, प्रतिबंध
और प्रतिरोध की अँधेरी सुरंगों में ही
सबसे अधिक परिपुष्ट होता है।



जो आदमी याद दिलाता है
भूलने वाले याद दिलाने को
खराब आदत मानने लगते हैं
लगभग झक्की जैसा
आदतें बनती चुपचाप हैं
और बिगड़ती हैं  गहरा शोर करके  



इस बायोस्कोप  की  दुनिया  में  अपने  किरदार को दिलोजान से
निभाती  मंच  से   चली  जाती  हूँ
सपनों  की  फूलदार  तश्तरियाँ   टूटी  पर
मैनें  फेंका  नहीं , क्यों  भाई , अजी  क्यों कबाड़  बढ़ाती हो ?
क्यों  इस  इस  छोटे  से  कमरे  को  लाचार  बनाती  हो ?


दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास भले ही 113 साल पुराना हो, लेकिन देश में अंग्रेजों के जमाने में बने ऐसे एलीट क्लब की नींव 150 साल पहले पड़ी. सबसे पहले जिमखाना क्लब मुंबई में 1875 में खुला, जबकि दिल्ली में 1913 में. लुटियंस दिल्ली के पावर सेंटर 2 सफदरजंग रोड) में दिल्ली जिमखाना क्लब (DGC) महज सोशल क्लब नहीं है, बल्कि ब्रिटिश इतिहास, सत्तानशीनों के सियासी चर्चा के साथ एलीट क्लास के के मनोरंजन का केंद्र रहा है. केंद्र सरकार ने 27.3 एकड़ में फैले जिमखाना क्लब की बेशकीमती जमीन का लीज डीड रद्द कर 5 जून तक क्लब खाली करने का आदेश दिया है. ये प्रधानमंत्री आवास (लोक कल्याण मार्ग) के ठीक बगल  में है. सरकार ने इस क्लब को सुरक्षा और सैन्य जरूरतों की वजह से हाथ में लेने का फैसला किया है.
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 25 मई 2026

4753...मानो यक़ीन, मुझको कभी घर नहीं मिला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन प्रकाशित रचनाएँ-

कभी घर नहीं मिला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी

*****
तपती गर्मी ,बचपन की यादें 
जलती तपती हुयी धूप से सब दुनिया अकुलाई।
कहीं किसी भी तरू का पत्ता कोई एक न हिलता
आग बरसती थी मानो तृण तृण कण कण था जलता।
तर हो गया पसीने से तन भीगे कपड़े सारे
घबरा गया पथिक झट उसने अपने वस्त्र उतारे ।
*****

आज की शायरी

*****

प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

*****

क्या हम बंदरों की संतानें हैं?

विज्ञान के अनुसार, मनुष्य सीधे तौर पर आज के बंदरों की संतान नहीं है।  इसके बजायदूसरे शब्दों में कहें कि इंसान और आज के बंदर (जैसे चिम्पांजी) दोनों एक ही विलुप्त हो चुके प्राचीन 'वानर (Ape)' प्रजाति के वंशज हैं। लाखों वर्ष के क्रमिक विकास (Evolution) के बाद दोनों अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए हैं। मानव उत्पत्ति और विकास के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस प्रकार है:*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 24 मई 2026

4752 भीतर ही तो तू मिलता है

 सादर अभिवादन


कुंडलिनी 
शरीर के सात चक्र 

कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति।
मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।।




भीतर ही तो तू मिलता है 
कण-कण, पोर-पोर खिलता है 
अब न कोई दूरी कहीं  है 
इक दूजे में ही बसता है !




प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

“आप आकाश ही हैं न? प्रिया ने बताया था कि आपने आज ही फ्लैट में सामान रखा है. आपको फ्लैट प्रवेश की बहुत बधाई.”





क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी 
अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,
वह क़तार के आख़िर में इसलिए है 
कि नए-नए लोग आते गए
और यह कहकर आगे खड़े होते गए 
कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,
लाइन वहीं से शुरू होती है। 





अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 


सादर समर्पित
सादर वंदन
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