निवेदन।


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रविवार, 31 मार्च 2019

1353.....ईश्वर चाहता था कि वह मुक्त हो ईश्वरत्व से!

जय मां हाटेशवरी......
इंसान कहता है कि पैसा आये तो मैं कुछ करके दिखाऊँ,
और पैसा कहता है कि तू कुछ करके दिखा तो मैं आऊँ.


सादर अभिवादन.....
आज अंतिम दिन है.....
इस वित वर्ष का......
सब ओर मंथन चल रहा है.....
इस वर्ष के वित्तीय खर्चों का......
पर यहां तो आज भी चर्चा ही होगी.....
 आप की रचनाओं की ही.....





तेरहवें दिन कार्य पूर्ण कर, भरत शोक से उबर न पाए
निकट राम के जाने का जब, मन में वह विचार थे लाये

लक्ष्मण के छोटे भाई ने, आकर वचन कहे ये उनसे
स्वजन हों या अन्य कोई भी, राम सदा सबके दुःख हरते

सत्वगुण से सम्पन्न हैं जो, आश्रय जिनका सब लेते थे
एक स्त्री के द्वारा वे, कैसे जंगल में भेज दिए गये


ज़ख्म देने को नये शिरकत हुई !
हम न उससे फेर कर मुँह जायेंगे
हर सितम उसका उठाते जायेंगे
हो न वो मायूस अपनी चाल में
इसलिए बस दर्द से उल्फत हुई !

गुरु जी का विद्यार्थियों से एक पेचीदा प्रश्न -
'कोई एक 15 लाख, हर खाते में डालने का वादा करे,
कोई दूसरा 6000/- हर महीने खाते में डालने का वादा करे,
कोई तीसरा हरेक को एक बंगला देने का वादा करे
और कोई चौथा उन बंगलों में एक-एक मर्सिडीज़ 
खड़ी करने का वादा करे ,
तो बताओ - इनमें से किसका ख़याली पुलाव 
ज़्यादा स्वादिष्ट होगा?'
एक विद्यार्थी -
'गुरु जी, आपके इस सवाल का जवाब तो 23 मई को सारा देश देगा.'

उसका साया भी  पुरगुनाह

वह मेरा रहनुमा नहीं, हरगिज़ नहीं

लोभ लालच का फंदा
सुलह या सौगात नहीं

वो लूटते रहें वैखौफ
यह तो खुशनुमा मंजर नहीं है
जो दिखता है बाहर
यकीनन वह अंदर नहीं है
अल्फाज़ हैं भटके हुए-से
नीयत भी साफ नहीं है

कायम की राय गर समझ बूझ ,
परिणाम मेरे अपने ही हैं ।
फिसल गया कभी पैर कहीं ,
तो टूटन का फिर दुख क्यों है ।

अरे हाँ, एक और बंदा जिसके बिना टीवी देखने की ये पूरी परिकल्पना ही निरर्थक सिद्ध होती! वो था एंटीना ठीक करने वाला लड़का। ये घर के सबसे छोटे पर सक्रिय बच्चे
हुआ करते थे। जिनका बचपन एंटीना घुमाते-घुमाते ही जवानी की दहलीज़ तक पहुँचा है। इन्हें न दिन का होश, न रात का। न कड़ी धूप, न बारिश का। ठिठुरती सर्द रातों में
भी कम्बल ओढ़े छत तक जाना ही इनका प्रारब्ध रहा।   उस पर बोरी भर-भर लानतें भी इनके ही हिस्से आतीं। ध्यान से देखियेगा यदि आपको अपने आसपास कोई जलकुकड़ा, बात-बात
में भिनकने वाला, पतला-दुबला, सुराहीदार गर्दन धारण किये पुरुष दिखाई दे तो समझ जाइये कि ये वही एंटीना ठीक करने वाला बालक है जो अब तक इस अभिशाप से मुक्त नहीं
हो सका है। उसकी गर्दन को ये कमनीयता एंटीना को महबूबा की तरह देखने से प्राप्त हुई है और अगरबत्तीनुमा काया उस यात्रा का प्रमाण हैं जो उसे घरवालों के कहने
पर एंटीना ठीक करने के लिए अरबों-ख़रबों बार सीढ़ियों से चढ़ने-उतरने के कौशल के चलते हासिल हुई है। 'स्किल इंडिया' का कॉन्सेप्ट तो तबका है जी।

धरती चाहती थी
कि
उसकी गोद में
लुटेरों, डाकुओं, चोरों, और बलात्कारियों
को न ज़बरन दफ़नाया जाए,
चाहती तो
सुनरकी भी थी
ब्याह हो जाए बड़के बखरिया में
पर
चाहने से क्या होता है
तन से मनचाहा हमसफ़र तो नहीं मिलता
उसके लिए पैदा होना पड़ता है
कुलीन बनकर,


आज बस इतना ही......
कल यहां फिर सजेगा......
आप की प्यारी-प्यारी रचनाओं से.....
हमकदम का और एक अंक.....
धन्यवाद।





शनिवार, 30 मार्च 2019

1352... स्थान्तरण


चमन से रुख़्सत-ए-गुल है न लौटने के लिए
तो बुलबुलों का तड़पना यहाँ पे जाएज़ है।
उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला।
परिवर्तन
ऐसे परिवर्तनशील जीवन में ‚
क्यों कहीं ठहर जाता दर्द का आभास?
मिले किसी को जीवन–तृप्ती‚ 

कोई करता रहे क्यों कर उपवास?

– राजेन्द्र कृष्ण
सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
परिवर्त्तन प्रकृति का नियम है
बदलते मौसम से एहसास हो जाता है
बदलाव का अर्थ है
स्थान्तरण
चल, चल के देख लें उनको,
अभी जो अपने थे।
सुबह गुलाबी धूप से
रातों में,
आँखों के सपने थे
Navnit Nirav



स्थान्तरण
लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली चले,
       अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले।
   
       बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे,
       पर क्या करें जो काम न बे दिल लगी चले।
ब्लॉग लेखक
कबीर अहमद
परिवर्तन
हर तरफ़ आज कल जैसा देश में माहौल है ,
लेखों में कविताओं में भारत में वर्तमान स्थिति पर चिंताएँ जताई जा रही हैं. 
इसी विषय पर मैं अपने भाई श्री प्रदीप शिशौदिया जी की कविता 
जो दिल्ली से प्रकाशित एक पत्रिका में छपी थी
मेरा फोटो

परिवर्तन
अपना दामन मैला जिन्हे नही दिखता
वो दूसरो को दोषी मानते है
कैसे आम लोगो को बनाये बेवकूफ
यह अच्छे से जानते है



><
फिर मिलेंगे...
चौसठवें अंक का
विषय

अश्रु, अश्क आँसू

प्रेम में कोई अश्रु गिरा आँख से,
और हथेली में उसको सहेजा गया।
उसको तोला गया मोतियों से मगर
मोल उसका अभी तक कहाँ हो सका ?
ना तो तुम दे सके, ना ही मैं ले सकी
प्रेम दुनिया की वस्तु, कहाँ बन सका ?
दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए
वो किसी छंद में कोई कब लिख सका ?
रचनाकार मीनाकुमारी शर्मा
अन्तिम तिथिः 30 मार्च 2019
प्रकाशन तिथि ः 01 अप्रैल 2019
रचनाएँ सम्पर्क प्रारूप के ही माध्यम से ही भेजें



शुक्रवार, 29 मार्च 2019

1351...उसको हर जगह ढूँढ़ती मेरी नज़र है।

स्नेहिल अभिवादन
----
मौसम के बढ़ते तापमान को महसूस किया जा सकता है। तेजी से रंग बदलते हैरान-परेशान करते सियासी दाँव-पेंच आम आदमी की समझ से परे है। फिर भी,लोकतंत्र के इस महापर्व मेंं अपना योगदान करने के लिए सभी उत्सुक है।

गर्मी के साथ-साथ, सरगर्मी भी तेज़ हो चली
दल-बदलुओं की ज़मात,काँटों की सेज़ हो चली
इस क़दर मची अफरा-तफ़री कुर्सी की होड़ में  बैंगन कीमत में कीमा और मुर्गी भी वेज़ हो चली

तो चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते है-

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी
गीतिका


नयन  से  नीर बहना थम गया है
खुशी में गुनगुनाना चाहता  हूँ  |

    छुपाए  जख्म जो दुनिया हमें दी
    निशानी को मिटाना चाहता हूँ |

    निराली जिंदगी है जान लो यह
     सभी को अब  हँसाना चाहता  हूँ |

आदरणीया प्रतिभा कटियार जी
अभिनय

छुट्टे पैसे के लिए सब्जी वाले से झिक-झिक करने 
और सिनेमा देखते वक़्त चुपके से रो लेने 
कॉफ़ी की खुशबू में डूबने 
और उतरते सूरज के संग मुस्कुराने में


आदरणीय दिलबाग सिंह विर्क जी

उनको भी पता है, मुझको भी ख़बर है 
मुहब्बत क्या है, बस एक दर्दे-जिगर है। 

ये नज़र मिली थी उनसे मुद्दतों पहले 
आज तक उस नशे का मुझ पर असर है। 

दिल का चैनो-सकूं लूटकर ले गया जो 
उसको हर जगह ढूँढ़ती मेरी नज़र है।
★★★★★
आदरणीय कैलाश शर्मा जी

बिखरी हुई अशांत लहरें
यद्यपि हो जातीं शांत 
समय के साथ,
लेकिन कितना कठिन है
लगाना अनुमान गहराई का
जहाँ देकर गया चोट
वह फेंका हुआ कंकड़ झील में
★★★★★
आदरणीया नुपूर जी
बूँद
तुम कहीं
जाती नहीं ।
विलय होती ।
बन जाती 
अंतर्चेतना।
★★★★★
आदरणीय अनंत विजय जी के ब्लॉग से
समसामयिक लेख 
चुनाव के वक्त इस तरह की पुस्तकों के प्रकाशन का मकसद लगभग साफ होता है। एक तो पुस्तक की चर्चा हो जाए और जिसको केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक या आलोचनात्मक किताब लिखी गई हो उसपर पुस्तक का प्रभाव पड़े। पुस्तक की मार्फत राजनीति का ये ट्रेंड भारत में नया है। अमेरिका में हर चुनाव के पहले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक और विध्वंसात्मक किताबें आती रही हैं। वहां तो संभावित उम्मीदवारों के निजी प्रसंगों तक पर किताबें लिखने का ट्रेंड रहा है। अब अगर हिंदी के लेखकों ने इस ट्रेंड को अपनाया है तो उनसे पाठकों की एक अपेक्षा यह बन रही है कि ये पुस्तकें भक्तिभाव से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ होकर लिखी जाए ताकि फौरी तौर पर चर्चित होने के बाद ये किताबें गुमनाम ना हो जाएं।
★★★★★

आज का यह अंक आप को कैसा लगा?
आप सभी की बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की
प्रतीक्षा रहती है।

हमक़दम के विषय के लिए


कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही हैं विभा दी अपनी विशेष
प्रस्तुति के साथ।

गुरुवार, 28 मार्च 2019

1350...हो विदा की घड़ी में भी जिसका स्मरण...

सादर अभिवादन। 

है 
दौर 
ग़ज़ब 
वादे-वादे 
वादा-ख़िलाफ़ी  
नेता-आभूषण 
भाषण-प्रदूषण।   


आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें- 

My photo

हो विदा की घड़ी में भी जिसका स्मरण
कब उसे काल भी, है अलग कर सका ?
था विरोधों का स्वर जब मुखर हो चला,
प्रेम सोने सा तपकर, निखरकर उठा।
चिर प्रतीक्षा में मीरा की भक्ति था वह,
प्रेम राधा का अभिमान कब बन सका ? 



हा भूल गई " मैं "
          अब निश्चय है अंत पास में
   मैं तुषार बूंद नश्वर,भूली अपना रूप
         कभी आलंबन अंबर का



मेरी दुनिया, तुम्हीं तक आ कर, 
न जाने क्यों रुकना चाहें। 
इक अजीब सा मोह 
है, तुम्हारे सजल 
नयन के 
कोर,



पीढ़ियों की गाथाएँ
हैं लिपिबद्ध 
धुँधली आँखों से
झरते सपनों को
पोपली उदास घाटियों में समेटे
उम्र की तीलियों का
हिसाब करते



फूल कापियों में रहते थे, नॉवेल कॉलेजी बुक में,
अक्सर टेबिल की दराज़ में, रखा आईना रहता था।

वो भी क्या दिन थे जब रातें भी दिन जैसी लगती थीं,
सांझ से ले कर वक़्त सुबह तक,  खुली आंख से कटता था।


एक धातु से ही भगवान की मूर्ति भी बन सकती है और हथियार भी गढ़े जा सकते हैं. उसी प्रकार चेतना शक्ति एक ही है उसी से प्रेम भी प्रकट हो सकता है और नफरत भी. अक्षर वही हैं, एकता  का संदेश भी दे सकते हैं और वैमनस्य की आग भी फैला सकते हैं.




चढ़ हवाओं के परों पर
अनुगूँज मुड़ जाती किधर
कौन उस प कान देगा
सुर मधुर बिखरा रहा है !


हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 27 मार्च 2019

1349.. चुपके से आकर खड़ी हो जाती है ज़िंदगी..





।।प्रात:वंदन।।

हँस देता जब प्रात, सुनहरे 
अंचल में बिखरा रोली,
लहरों की बिछलन पर जब 
मचली पड़तीं किरनें भोली,
तब कलियाँ चुपचाप उठाकर पल्लव के घूँघट सुकुमार,
छलकी पलकों से कहती हैं ’कितना मादक है संसार’!
महादेवी वर्मा  
उपर्युक्त कालजयी रचना के साथ 
आज की लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍



आदरणीय एम.वर्मा जी,

आदरणीय अरुण साथी जी,
आदरणीया अनिता सैनी जी,
आदरणीया अनुराधा चौहान जी,
आदरणीय ज्योति खरे जी

🔸🔸🔸


धूप में देखिये पसीना सुखाने आया है

खंजरों को वह जख्म दिखाने आया है


नींद में चलते हुए यहाँ तक पहुंचा है

लोगों को लगा कि राह बताने आया है
🔸🔸🔸



चोरी करने की अपनी अद्भुत प्रतिभा के दम पर देशभर में दोनों की बड़ी ख्याति थी। कहा जाता है कि दोनों चोर अपने पेशे में इतने माहिर थे की किसी के आंख..
🔸🔸🔸



बन मधुमास  मिलेंगे दोबारा 
लौटेगें   हसीं  ख़्वाब, नक्षत्र बन 
चमकेगा सौभाग्य का सितारा 



हृदय में उमड़े स्वप्न गूँथू 

दमकना जिंदगी तुम दुल्हन बन के 
अस्तित्व अपना जताने उठाना 

🔸🔸🔸



कब चुपके से आकर
खड़ी हो जाती है ज़िंदगी
 मौत के किनारे पर
तब इंसान बेबस
 होकर रह जाता है
जाने वाला कब चुपचाप से


🔸🔸🔸



फागुन की
समेटकर बैचेनियां
दहक रहा टेसू 
महुये की
दो घूंट पीकर
बहक रहा टेसू---

सुर्ख सूरज को

चिढ़ाता खिलखिलाता
प्रेम की दीवानगी का
रूतबा बताता

🔸🔸🔸
हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए
🔸🔸🔸
।।इति शम।।

धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

मंगलवार, 26 मार्च 2019

1348...हर कोई किसी गिरोह में है, फिर कैसे कहें, आजादी के बाद सोच भी आज आजाद हो गयी है

अब तो हो ली होली..
चैत्र मास का प्रथम पक्ष
लगे रहते हैं लोग प्रतीक्षा में
माता रानी की...
अजीब सी स्थिति..
निर्मित हो रही है...
राम नवमी भी बस आ ही गया
चुनावी दंगल भी चालू है..
कुछ वसूली करें..
अर्पण भी करें...और..
और रचनाएं पढ़ें......

पौधे---अपनों से

कुछ पौधे जो मन को थे भाये
घर लाकर मैंंने गमले सजाये
मन की तन्हाई को दूर कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

हवा जब चली तो ये सरसराये 
मीठी सी सरगम ज्यों गुनगनाये
सुवासित सुसज्जित सदन कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

उदास शाम
एक गरम दिन का 
बचाखुचा ताप 
भिगोती है अपने 
अनदेखे आँसुओं से

वो आरज़ी है 
मरना होगा उसे 
कल कोई नयी शाम 
बिछी होगी इसी पहलू में 
जानती है

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए .....
Related image
तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या
मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं
खुशबू आती रहे दूर से ही सही
सामने हो चमन कोई कम तो नहीं
चाँद मिलता नहीं सबको सँसार में
है दिया ही बहुत रोशनी के लिए

हरसिंगार की लालिमा ...

दौड़ती-भागती,
पिटारों से निकालकर
अलगनी पर डालती
कुछ गीली,सूखी यादों को,
श्वेत-श्याम रंग की सीली खुशबू
को नथुनों में भरकर
 कतरती,गूँथती,पीसती,
अपने स्वप्नों के सुनहरे रंग,
पतझड़ को बुहारकर
देहरी के बाहर रख देती

कलम बीमार है.......

उसे इंतजार है तो बस
उन गुम सम्वेदनाओं की.
उनके मसीहाओं की.
जो इंसान को खोजते हुए
धरती से दूर निकल गए हैं.

सोच भी आज आजाद हो गयी है

क्या 
लिखता है 
क्या सोच है 
‘उलूक’ तेरी 

समझनी भी 
किसे हैं 

बातें सारी 
अनर्थ हो गयी हैं

लूट में 
हिस्सेदारी
 लेने वाली 

इसके बाद विषय के अलावा कुछ भी नहीं बचा
चौसठवें अंक का
विषय

अश्रु, अश्क आँसू

प्रेम में कोई अश्रु गिरा आँख से,
और हथेली में उसको सहेजा गया।
उसको तोला गया मोतियों से मगर
मोल उसका अभी तक कहाँ हो सका ?
ना तो तुम दे सके, ना ही मैं ले सकी
प्रेम दुनिया की वस्तु, कहाँ बन सका ?
दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए
वो किसी छंद में कोई कब लिख सका ?
रचनाकार मीनाकुमारी शर्मा
अन्तिम तिथिः 30 मार्च 2019
प्रकाशन तिथि ः 01 अप्रैल 2019
रचनाएँ सम्पर्क प्रारूप के ही माध्यम से ही भेजें
सादर
यशोदा


















सोमवार, 25 मार्च 2019

1347..हम-क़दम का तिरसठवाँ अंक

स्नेहिल अभिवादन
-----
वसंत धरा पर ऋतुचक्र परिवर्तन कै अंतर्गत प्रकृति को नवीन रुप से श्रृंगारित करने का वार्षिक त्योहार है। 
वसंत
 जीवन की खुशहाली है,आशा है यौवन और 
श्रृंगार  का अद्भुत राग है। 

वसंत पर लिखी गयी अनगिनत रचनाओं में से कुछ 
प्रसिद्ध रचनाकारों की लेखनी से उदृत बंध 
मेरी पसंद के आप भी आनंद लीजिए-
सखि वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी--
पिक-स्वर नभ सरसाया ।
सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"
★★★★★
चैन मिटायो नारि को मैन सैन निज साज ।
याद परी सुख देन की रैन कठिन भई आज ।।

परम सुहावन से भए सबै बिरिछ बन बाग ।
तृबिध पवन लहरत चलत दहकावत उर आग ।।

कोहल अरु पपिहा गगन रटि रटि खायो प्रान ।
सोवन निसि नहिं देत है तलपत होत बिहान ।।
★★★★★
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
★★★★★
धूप बिछाए फूल-बिछौना,
बगिय़ा पहने चांदी-सोना,
कलियां फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
गोपालदास "नीरज"
★★★
रंग-बिरंगी खिली-अधखिली
किसिम-किसिम की गंधों-स्वादों वाली ये मंजरियां
तरुण आम की डाल-डाल टहनी-टहनी पर
झूम रही हैं...
चूम रही हैं--
कुसुमाकर को! ऋतुओं के राजाधिराज को !!
इनकी इठलाहट अर्पित है छुई-मुई की लोच-लाज को !!
तरुण आम की ये मंजरियाँ...
उद्धित जग की ये किन्नरियाँ
नागार्जुन
★★★★★
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
और चलिए अब हमारे प्रिय रचनाकारों
की लेखनी से निसृत बसंत की रचनाओं का
आस्वादन करते हैं-
★★★★★
आदरणीय विश्वमोहन जी

मिलिन्द उन्मत्त मकरन्द मिलन मे,  
मलयज बयार   मदमस्त मदन  में/  
चतुर  चितेरा  चंचल  चितवन  में,  
कसके   हुक    वक्ष-स्पन्दन   में//

प्रणय  पाग  की  घुली  भंग,  
रंजित पराग पुंकेसर   रंग/
मुग्ध मदहोश सौन्दर्य सुधा,  
रासे  प्रकृति  पुरुष  संग //

★★★★
आदरणीया साधना वैद
(दो रचनाएँ)

वसंतागमन
नवयौवना धरा 
इठला कर
कोमल दूर्वादल से
अपने अंग-अंग में
पीली सरसों का उबटन लगा 
अपनी धानी चूनर को
हवा में लहराती है
पंछियों के स्वर मधुर खोने लगे
चाँद तारे क्लांत हो सोने लगे    
क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 

वन्दना के स्वर शिथिल हो मौन हैं
करें किसका गान अतिथि कौन है
भ्रमित नैनों में व्यथा का भास है
भाव विह्वल जा रहा मधुमास है !
★★★★★

आदरणीया आशा  सक्सेना
वसंत पंचमी
आई वसंत ऋतू सर्दी को देती विदाई 
तन मन में हर्ष भरती 
फूली सरसों पीली पीली 
लेकर आई  वासंती बयार
मौसम परिवर्तन का
करती आगाज
धरती ने किया नव श्रृंगार |
★★★★★

आदरणीय रवीन्द्र भारद्वाज
बसंत
Related image
दिन और अवधि के हिसाब से 
हो जाता हैं अंत बसंत का 
प्रत्येक वर्ष 

लेकिन सच पूछो तो 
बसंत छाया रहता हैं 
एक उम्मीद की तरह 
वर्षभर 
हमारे अंदर 
★★★★★

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की
दो रचना
 ऋतु बसंत
हरित धरा मुखरित शाखाएं
कोमल सुषमा बरसाई है
वन उपवन ताल तड़ाग
वल्लरियां मदमाई है।

कुसुम कलिका कल्प की
उतर धरा पर आयी हैं
नंदन कानन उतरा है
लो, वसंत ऋतु आयी है।

सुमन भये सौरभ विहीन
रंग ना भावे सुर्ख चटकीले
खंजन नयन बदरी से सीले
चाँद लुटाये चांदनी रुखी
कैसो री अब वसंत सखी।
★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान
वसंत हो मेरे जीवन में
वसंत  हो तुम मेरे जीवन में,
जीवन के हर पलछिन में।

कितने मौसम आएं-जाएं,
कितने दुख के बादल छाएं।

चाहे बेमौसम हों बरसातें,
चाहें घिर के आएं काली रातें
★★★★★
ऐ रितुराज वसंत ! तुम तो बहुत खुशनुमा हो न !!!
आते ही धरा में रंगीनियां जो बिखेर देते हो.....
बिसरकर बीती सारी आपदाएं..........
खिलती -मुस्कराती है प्रकृति, मन बदल देते हो,
सुनो न ! अब की कुछ तो नया कर दो.........
ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो।
★★★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम कुमार जी

रूप अतिरंजित कली कली मुस्काई,
प्रस्फुटित कलियों के सम्पुट मदमाई,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।

कूक कोयल की संगीत नई भर लाई,
मंत्रमुग्ध होकर भौंरे भन-भन बौराए,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।
★★★★★
आदरणीया अनुराधा जी
ऋतुराज बसंत
 हवाओं में
झूमतीं फसलें
महकती अमराई
सूरज की किरणों से
धरती इठलाई
पीले लहराते
सरसों के खेत
जैसे पीली चूनर
ओढ़कर गोरी

★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीया रेणु जी


ये मन कितना अकेला था 

एकाकीपन में खोया था  , 

 किसी   ख़ुशी  का इन्तजार  कहाँ 
बुझा - बुझा  हर रोयाँ  था ;
बरसे सहसा तपते मन पे  
  शीतल  मस्त फुहार से तुम ! 

 मधु सपना बन  ठहर  गए - 
  थकी  मांदी  सी आँखों में ,
हो पुलकित  मन ने उड़ान भरी -
   थकन बसी थी  पांखोंमें ;
उल्लास का ले आये तोहफा -
  मीठी मन की   मनुहार से तुम !! 
★★★★★
आपको आज का यह विशेषांक कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया सदैव मनोबल में वृद्धि करती है। आपके विचार प्रतिक्रिया के माध्यम से अवश्य प्रेषित करे।
अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

आज के लिए इतना ही
आज्ञा दें

#श्वेता सिन्हा
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