निवेदन।


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मंगलवार, 10 मार्च 2026

4677.... पीढ़ियों की विरासत है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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इंसानियत
..................................
दुनिया के बाज़ार में इंसान खिलौना है।
मज़हब सबसे ऊपर इंसानियत बौना है।।
बिकता है ईमान चंद कागज़ के टुकड़ों में,
दौर मतलबों का, हृदयहीनता बिछौना है। 
धर्म ही धर्म दिखता है चौराहों पर आजकल,
रब के बंदे के लिए अफ़सोस नहीं कोना है।
जन्म से हे! सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति कहो,
कर्म का तुम्हारे रुप क्यों घिनौना है?#श्वेता

आज की रचनाऍं- 
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अगर यह सच नहीं है
तो अपनी रश्मियों को आदेश दो
वे उतरें
उन तंग गलियों में भी
जहाँ अँधेरा
सिर्फ रात नहीं,
पीढ़ियों की विरासत है।


भीड़ के बीच पुकारा,
रास्तों से पूछा,
आईनों से जाना चाहा
मगर हर जगह
बस सन्नाटा मिला।

फिर एक रात
जब तन्हाई ने
मेरे कंधे पर हाथ रखा,
और ख़ामोशी
मेरे पास बैठ गई




बादल भी निराशा के सताते हैं सफ़र में,
उम्मीद के लम्हों से नई राह बनाना.

इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.

माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.




भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 




शगुन ने आयुष की बात शांति से सुनी. उसने आयुष का हाथ थाम लिया. "आयुष, पापा की चुप्पी उनका डर है, और विवेक की माँ का अहंकार उनकी कंडीशनिंग. उन्हें लगता है कि स्त्रियों का जीवन परिवार और घर के पिंजरे के लिए है. उन्होंने खुद इसे जिया है. उसी में वे खुद को और तमाम स्त्रियों को सुरक्षित समझती हैं. उन्होंने अपनी बहू के लिए अपने यहाँ सुन्दर 'पिंजरा' तैयार किया है. उस पिंजरे के गुण भी उन्होंने खूब बताए होंगे. पर उन्हें पता नहीं कि शगुन उस पिंजरे में रहने को तैयार नहीं है, वह उड़ना सीख चुकी है उसके पंख अब पेरालाइज नहीं हैं."



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 9 मार्च 2026

4676 माँ का दिल तब भी धड़कता था फ़िक्र के साये में,

 सादर अभिवादन 




खुश रहो सदा, किसी को दुःख न देना जीवन में,
इंसानियत का हाथ बढ़ाना तुम भी हर रास्ते।

'फ़िज़ा' की दुआ है माँ के दिल की गहराइयों से,
मुस्कुराते रहो तुम यूँ ही जीवन भर हर रास्ते।




रंग देखे अनगिनत ..
सुबह-शाम के 
भोर और गोधूलि के ।
हरे-भरे पात वर्षा में धुले,
ओस की बूँद में धनक,
फूलों में खिले रंग शर्मीले,





इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.

माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.




अगर मेरे बस में ये बादलों की स़फेद रुई होती,
तो मैं इससे तुम्हारे लिए एक नरम सी ज़मीन ढालता,
चुनता समंदर की लहरों से संगीत के कुछ क़तरे,
और तुम्हारे रास्ते में ख़ामोश ख़ुशबू सी बिछाता।






सम्मान एक संस्कार है, 
एक दृष्टि है, एक सोच है।
जिस दिन हमारी नज़रों में 
हर महिला के लिए 
सच्चा आदर होगा,जिस दिन 
हर बेटी खुद को 
सुरक्षित महसूस करेगी,
वह दिन वास्तव में महिला दिवस बन जाएगा।


सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 8 मार्च 2026

4675...कुछ देर और ज़रा जी लें...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय शांतनु सान्याल जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। युद्दों में अधिकांश महिलाएँ और बच्चे असह पीड़ा भोगते हैं। महिलाओं को युद्ध में हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। 

अब यह सिलसिला रुकना चाहिए। युद्द के बाद भी दोनों पक्ष शांति वार्ता करते हैं तो युद्द से पहले क्यों नहीं। सनकी बूढ़ों का ईगो हर्ट होना मासूमों की ज़िंदगी से खिलवाड़ का अधिकार कैसे बन गया?

बहरहाल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ।   

रविवारीय अंक में पढ़िए चुनिंदा रचनाएँ-

सौंदर्य रजनी का

निशा  नील परिधान में,

रुपहले बूटे चमक रहे थे।

कदम रखा निशापति ने,

निशा थी  थिरकने लगी।।

*****

कुछ और पल--

कुछ देर और ज़रा जी लें बंद
पंखुड़ियों के मधुरिम
आवास में, कुछ
पल ग़र मिल
जाए, ये
ज़िन्दगी
फिर
बदलने को है एक गहन छटपटाहट के साथ
रात बस ढलने को है।

*****

एक था, अहोम साम्राज्य

पने इतने अहम और महत्वपूर्ण साम्राज्य के बारे में अपने ही देश के लोगों की जानकारी नगण्य सी है ! उसी को प्रकाश में लाने का उपक्रम मार्च, 2021 में किया गया, जब अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बोड़फुकन कोजिनका जन्म 24 नवंबर, 1622 को हुआ था और जिन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध में अपनी सेना का प्रभावी नेतृत्व करते हुए मुगल सेना का असम पर कब्जा करने का प्रयास विफल कर दिया थाभारत की "आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक'’ की उपाधी प्रदान की गई ! इसके अलावा उनके नाम का एक स्वर्ण पदक भी जारी किया गया जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को प्रदान किया जाता है !*****

स्वावलंबन

विभागाध्यक्ष के केबिन के बाहर पाँच और उम्मीदवार थीं, सभी एम.एससी. (M.Sc.) अंतिम वर्ष के विद्यार्थी. शगुन अकेली थी जो अभी बी.एससी. (B.Sc.) के आखिरी सेमेस्टर में थी. उसकी धड़कनें तेज़ थीं, पर इरादा स्थिर. एक-एक कर सभी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. शगुन सबसे आखिरी थी.

*****

बेटी के सामने सरेआम फांसी पर लटके और मुस्कुराते प‍िता ने ही ल‍िख दी थी ईरान की बर्बादी की कहानी

दर्दनाक स्केच-जब पिता को अंतिम बार देखा 

यह बेहद दुखद चित्र ईरान की महना अहमदी ने बनाया है, जिसमें उसके पिता हामिद को फांसी पर लटकाया जा रहा है, जबकि वह और उसकी मां यह सब देख रही हैं. इस दृश्य में, महना और उसकी मां एक फांसी के तख्ते के बगल में हाथ पकड़े खड़ी हैं, जिसके नीचे उसके पिता एक ब्लॉक पर खड़े हैं। उसने यह चित्र अपने पिता को अंतिम बार देखने के इंतजार में बनाया है।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

शनिवार, 7 मार्च 2026

4674 ...एक बीज की स्वतंत्रता, जमीन के अंधेरे में खो जाती है

सादर अभिवादन 

रंग अबीर
रंगरेज ने डारे
धरा सुखाती !

गेंहू की बाली
फूली पीली सरसों
बसंत आया


श्वेत कपास
सा उड़ता बादल
घेरे है घटा ! 
-सदा

रचनाएं देखें

"शांति" हमेशा "युद्ध"
से बेहतर है! इस बात से 
कौन कौन सहमत है।



एक बीज की स्वतंत्रता,
जमीन के अंधेरे में खो जाती है,
मिट्टी की चुप तहों में उसकी
पहली सांस ही सो जाती है।
वह अकेला है —
पर हार मानना उसे आता नहीं,





ये तुम्हारा भरम है कि वे गुलाब रक्खेंगे
मंजिल से ठीक पहले वे सैलाब रक्खेंगे

हकीकत कही तुमसे रूबरू न हो जाये
तुम्हारे पलको पर अब वे ख्वाब रक्खेंगे
  
औंधे पडे मिलेंगे तुम्हारे सवालो  के तेवर
चाशनी से लिपटे जब वे जवाब रक्खेंगे



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सजनी   को   कैसे  फबे,होली  का  त्योहार।
बैठे   हों  जब  साजना, सात  समुंदर  पार।।

है  बस  इतनी  कामना, होली  पर  हर बार।
करें  सभी  अपनत्व  के, रंगों  की  बौछार।।




लालसा उस बौर की 
अमिया की डाली पर 
पल्लवित-पुष्पित होती। 
नाहक था इंतजार 
छोटी-छोटी अमिया !
लू चलती
हवाओं के थपेड़े में 
नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में 
बैठे हम। 
गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'
नमक,मिर्च की पुड़िया,
छील रहा था 'काका'
अमिया को,
तालाब से निकले उस सीप के 
चाकू से,

सादर वंदन

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

4673.... अयोग्यता योग्यता नहीं होती...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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कितनी अजीब बात है न
शांति के लिए युद्ध का आह्वान
जीवन के लिए मृत्यु का वाहन
क्यों
 शांति के लिए क्या युद्ध ही विकल्प है.?

एक कविता पढ़िए -

युद्ध

के सामने

अहिंसा शब्द

कितना बौना हो जाता है


दया और प्रेम

छटपटाते हुए मरते

दिखाई देते हैं


करुणा

के परखच्चे उड़ते हैं

धड़ाकों के साथ


इमारतें

विकास से लड़ते हुए

हो जाती हैं मलवे में तब्दील

आकाश


भर जाता है धुएँ से

ज़मीन

साक्षी बन रही होती है

खंडहरों की


ताक़तवर दर्ज़ करता है

फ़तह

लाशों के ढ़ेर पर

मानवता को कुचलते हुए

करुणा का गला घोंट कर।

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रचयिता का नाम याद नहीं मुझे

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आज की रचनाऍं- 
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तारों ने
अपनी दहकती भट्टियों में
संलयन की क्रिया चलाई
हाइड्रोजन से हीलियम,
हीलियम से कार्बन,
और आगे…
जब तक लोहा
स्थायित्व की सीमा बनकर न उभरा।

अधिकार 


हठ से
तमस
नहीं होता उजास,
रात
नहीं होती भोर,
पक्षीवृंद
नहीं करते कलरव,
कलियाँ
नहीं होतीं कुसुमित,
कुक्कुट भी
बाँग नहीं देते,
शिथिलता
दृढ़ता नहीं होती,
अयोग्यता
योग्यता नहीं होती,
केवल
मिलते हैं अवसर
छीन लेने के
दूसरों के अवसर
होने के सिंहासनारूढ़
प्रवंचना और धूर्तता के।




रिमझिम  बौछार 
फूलों  सी  महक
निर्दोष  चहक
मिले ,  गिले -  शिकवे
की  जगह  न  रहे
इस  होली  रंग  यूँ  रंगे
हर  मन  खुशी  झूम  उठे
कोई  क्षण  भर  न  उदास  रहे



उस रात उसने अपनी नई 'संबलनोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के खिलाफ नहींबल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए होगा."



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 5 मार्च 2026

4672 ..जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे

 सादर अभिवादन 


समय एक खुली किताब है,
जिसके पन्ने हवा में उड़ते हैं,
कुछ शब्द धुंधले हो जाते हैं,
कुछ अक्षर दिल में जुड़ते हैं।

हर पन्ना एक कहानी है,
हर कहानी में एक मोड़ है,
कहीं हँसी की धूप खिली है,
कहीं आँसुओं का भी शोर है।


रचनाएं देखें



वे जानते हैं—
जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,
उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...
और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—
महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!




तिरी एक ही नज़र से मेरा दिल मचल न जाये,
कि पिघल के मोम जैसा ये वजूद ढल न जाये ।

मिरी आँख का सितारा तिरी राह देखता है,
कोई अश्क बन के पलकों से यूँ ही फिसल न जाये।

तिरी याद का चराग़ाँ मिरी रूह में सजा है,
जो थिरक रही है लौ ये कहीं बुझ के जल न जाये।




 शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे। आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे...............




ऐसे हुआ संपन्न होलिका दहन
कुटिलता के अभेद्य अस्त्र-शस्त्र
सरलता के तेज से जाते पिघल
अंततः वरदान भी होता विफल


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 4 मार्च 2026

4671..रंगों की आत्मगाथा

।।भोर वंदन।।



" तो बस इस बार 

फेंकना अमन का गुलाल 

कि सलामत रहे हर माँ का लाल 

सब के हिस्से रहे आसमान नीले 

हों निर्धन की बिटिया के हाथ पीले 

घाव भर जाएं सब जो हैं अभी हरे 

होली जीवन मे शान्ति का रंग भरे ।।"


होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.


- बुशरा तबस्सुम 

होली के दौरान  बजने वाले होली गीत.. के साथ 



ट्रम्प जोगीरा

जोगीरा

आपस में ही लड़वाकर के, बेचे खुद हथियार।

युद्ध कराकर नोबेल चाहे, सामन्ती सरदार।।

जोगीरा सा रा रा रा


पल-पल में ये बोली बदले, बदले अपना भाव।

खुद को तानाशाह समझता, देता टैरिफ ताव।।

जोगीरा सा रा रा रा..

✨️

अबकी बार होली में

- मार्च 02, 2026

केसर रंग,रंग देना पिया अंग

अबकी बार होली में

फाग,चैती गाते बजाते मृदंग 

अबकी बार होली में ।


माथे पे रोली गाल गुलाल

कोरी चूनर कर देना लाल 

धो देना मन का मलाल 

अबकी बार होली में ।

✨️

होली: रंगों की आत्मगाथा 

फागुन की पहली आहट में,

जब पवन ने गुपचुप संदेश दिया,

धरती ने ओढ़ी गुलाल की चूनर,

अंबर ने भी हँसकर साथ लिया।

टेसू की डालों से टपका सूरज,

सरसों ने सोने सा गान किया,

✨️

रंग बरसे



रंगों का अब इंतजाम ..बस करों,

होली पे ये इल्जाम ..बस करों

शिकायत अबकी हम से न होगी,

सुर्ख़ आरिज़ के अंजाम..बस करों। .

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


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