निवेदन।


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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

4798... स्पर्शजन्य अनुनाद दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है

 सादर अभिवादन  


ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हों हमारे करम

मेरी पसंदीदा रचनाएं




“भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने बचपन में स्कूल की प्रार्थना के दौरान ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ न गाया हो। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इस अमर प्रार्थना को लिखने वाला कवि किन संघर्षों, टूटे सपनों और गहरे दर्द से गुज़रा था? क्या यह महज़ एक फिल्मी गीत था, या एक ऐसे इंसान की आत्मा की पुकार जिसने जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष को गले लगाया? यह कहानी सिर्फ एक गीतकार की नहीं, बल्कि उस कलम की है जिसने दर्द को शब्दों में बदलकर उसे अमर कर दिया।”




तेरे होठों पे नाम है मेरा,
यूँ लगे जैसे हक़ बयानी है।

मैं तेरे पास यूँ नहीं बैठा,
इक कहानी अभी सुनानी है





मिले ज्ञान-मोती सबको ही जग में
कदमों के नीचे हों फूल मग में
बुद्धि सरल और निश्छल हो वाणी
गुरुओं का आदर करें बन के ध्यानी 
अन्तस् में ज्योति खुशियों की धरना
विद्या की देवी हे श्वेतवर्णा।





स्पर्शजन्य अनुनाद
दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है;
वहीं से जन्म लेता है
एक चुम्बन,
जो प्रगाढ़ आलिंगन को आमंत्रित करता है।





आए दिन अन्याय होते हैं। आए दिन उत्पीड़न होते हैं। पी‌ड़ित न्याय की आस लगाए बैठे रहते हैं लेकिन उनमें से अधिकांश को न्याय नहीं मिलता क्योंकि अत्याचार करने वाले बहुत समर्थ होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो बहुत पहले ही कह गए हैं-समरथ को नहिं दोष गुसाईं। यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति या संस्था किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को व्यवस्था द्वारा न्याय दिलाने का प्रयास करे तो उसे भी शक्तिशाली उत्पीड़क अपने शत्रु के रूप में ही देखते हैं तथा उसे भी ठिकाने लगा देने की कोशिश में लग जाते हैं ताकि फिर कभी कोई किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उठ खड़ा होने का साहस न करे। ऐसे में किसी बेसहारा का हाथ थामना ही बड़ी हिम्मत का काम होता है। यह हिम्मत भारत भूषण तिवारी ने जवइनिया गाँव के विस्थापितों के लिए दिखाई और परिणाम में उसे अपनी शहादत देनी पड़ी। बहुत आत्मबल चाहिए ऐसा कुछ करने के लिए। उसने अपने लाइव वीडियो में कहा है कि यदि वह मारा जाता है तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। कितनी असाधारण बात है यह !



सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 8 जुलाई 2026

4797.. सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...

 ।।प्रातःवंदन।।

अलि रचो छंद !

आज कण-कण कनक कुंदन,

आज तृण-तृण #हरित चंदन,

आज क्षण-क्षण चरण वंदन

विनय अनुनय लालसा है।

आज वासन्ती उषा है।

अलि रचो छंद !

 सोहनलाल द्विवेदी 

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढाते हुए..

उसने अपनी याद जरा सी 

जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !

✨️

मौसम मौसम... लवली मौसम..."

अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है..

✨️

एक जुलाई

आ गई है

एक जुलाई की

बादल भरी

उमस से भरपूर सुबह।

छोटे बच्चे

अपनी मस्तियों को

लगा चुके हैं तह ..

✨️

लूडो के सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...

कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है।

एकबारगी दो-तीन चाल में

हम सांपों से बचकर,

छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर

लाल होने तक पहुंच जाते

और रख चुके हैं

बीते जून ..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

4796...संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के...

 मंगलवारीय अंक में

आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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जीना आसान नहीं है,

यह कॉंटों का बिछौना है



मखमली कोई दालान नहीं है।

​हर सुबह एक नया इम्तिहान लाती है,

उम्मीदों की पोटली पीठ पर बांधे,

हमें दौड़ना है अंधाधुंध 

जिसकी कोई अंतिम रेखा ही नहीं।

​ख्वाब कांच की तरह टूटते हैं,

और उनकी किरचें पैरों में नहीं,

सीधे रूह में चुभती हैं।

अपनों के बदले चेहरे,

और वक्त की बेरुखी,

कभी-कभी भीतर तक सब सुखा देती है।

​पर शायद,

इस मुश्किल में ही जिंदगी का असली स्वाद है।

आंसुओं से भीगे चेहरे पर

जब एक छोटी सी मुस्कान खिलती है,

​जीना आसान तो नहीं है, बिल्कुल नहीं,

लेकिन इस कांटों भरे रास्ते पर

अपने पैरों के निशान छोड़ जाना ही...

जिंदगी है शायद...।


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आज की रचनाऍं- 


वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.

तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.

ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.



अलगनी पर दिन भर टँगी 
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई 
रात भर चैन की नींद आई ।

 

भोर उजियारी चुनौती लाई 
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई 
छाँव बिन धूप रास न आई ।





मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगीपहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।



उस दिन भी रोज की तरह नशे में झूमता शराबी आया और मंदिर का घंटा बजाने लगा। घंटा बजाने से पहले वह एक क्षण के लिए रुका। उसने एक नजर सामने देखा और फिर घंटा बजाने लगा। फिर वही सारी क्रिया दुहराई जो वह रोज करता था। मंदिर से निकलने से पहले उसने गणेश जी की ओर देखा और बोला, छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे। इतना कहकर वह निकल गया।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 6 जुलाई 2026

4795 ..शब्दों से शब्द टकराते रहे

 सादर अभिवादन  


आज ये है

औरों का तो पता नही पर हम उस जमाने के है जब समोसा 25 पैसे में मिल जाता था 
आज 10 rs दे कर भी वो स्वाद नहीं मिलता जो उस वक्त आता था 
हम उस जमाने के साक्षी है जब प्यास बुझाने के लिए एक कंचे वाली बोतल में बस थोड़ा सा नमक डाल कर पी जाते थे 
उस जमाने में कोका कोला और रिमझिम आती थी 
और सबसे अच्छी गोल्ड स्पॉट 
आज बस सब क्लियर नो बकवास वाली ड्रिंक आती है 

मेरी पसंदीदा रचनाएं


बारिश  की  बूँदों  में  भीग  जाये  अंतस  सारा
यहीं  आज  मिल  जाए  वो  बीता बचपन  चहका - चहका  
बरसात के वे कजरारे मेघा
उमड़ - घुमड़  कर  बरसे   छमाछम  
गीत और बाल  कलरव  का  वह  मधुर  स्वर  आज फिर गूँजा ..




सुनो जल की जुबानी
चुक रहा सब पानी
कर लो जतन शीघ्र
समय ना गंवाइये

अतिवृष्टि अनावृष्टि
बिगड़ी समस्त सृष्टि
वन से है संतुलन
वृक्ष भी लगाइये




जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे  
वह घर आने को बेताब जब था

राह  जिसकी तकी बिछाई थी पलकें
आने वाला आया ही हुआ जब था
 
हजारों खत न उसे भेजे होंगे
परदेश कभी गया ही नहीं जब था 




मर्यादा में रहकर बोलो, 
न हो छोटा मुँह और बड़ी बात,
कटु वचनों से मत किसी का, 
हृदय छलनी कर डालो दिन-रात।

जब कर्म निभाकर जीवन के, 
इंसानों को छुट्टी मिलती है,
तब कष्ट, रोग और बाधाएँ, 
जीवन से छू (छूमंतर) हो जाती हैं।




शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।

पर कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही—
वह इस जाल में नही फंसी
और फिसल गयी


सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 5 जुलाई 2026

4794 ... जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

 सादर अभिवादन 


पी.ओ.के. की चर्चा है जोरो पर
कुछ चित्र दिखा रहा हूँ

आपका भी मन करेगा कि जाकर वापस ले आऊं


और भी है , ब्लॉग में जाकर देखिए

मेरी पसंदीदा रचनाए



एक जुनून सा छाया रहा दौर-ए-जवानी 
तेज धार में दरिया के मयार का पता ही नहीं चला

तसव्वुर में तेरा चेहरा रख  यू लिया 
कंकड़ पत्थर और खार का पता ही नहीं चला




अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, फिल्में बनी हैं ! इन चलचित्रों ने इन बिमारियों के प्रति लोगों को जागरूक भी किया है ! यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जिया भी है...............!  




ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल




है अधूरे और पुराने 
गीत हृदय में लिखे है
 पंखुड़ी से प्रीत करते
 भ्रमर भी गुंजित दिखे है 





वहां का कश्मीर ,भारत के कश्मीर से ज्यादा खूबसूरत है , 
वहां हिंगलाज मंदिर है। वो हिन्दुओ के 51 शक्तिपीठों में से एक है । 
जहाँ सती माता का सर काट के गिरा था। 
वहीं पर वेदों की रचना हुई थी। 
जिसे सप्तसैंधव प्रदेश कहते है। वहां सात नदियां थी।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 4 जुलाई 2026

4793 ...संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है

 सादर अभिवादन 

एक शिक्षक कक्षा में दाखिल हुए और उन्होंने देखा कि
जिस कुर्सी पर उन्हें बैठना था वह छत पर टंगी हुई थी।
उन्होंने छात्रों की ओर देखा और मुस्कुराए।
बिना कुछ कहे, वे ब्लैकबोर्ड की ओर बढ़े और लिखा:

परीक्षा - 15 मिनट, 30 अंक


प्रश्न 1. कुर्सी और फर्श के बीच की दूरी सेंटीमीटर में परिकल्पित करें (1 अंक)।
प्रश्न 2. कुर्सी का छत से झुकाव कोण परिकल्पित करें और अपनी कार्यविधि दिखाएं (1 अंक)।
प्रश्न 3. उस छात्र का नाम लिखिए जिसने कुर्सी को छत पर टांगा था और उन दोस्तों का नाम लिखें जिन्होंने उसकी मदद की थी। (28 अंक)।
इसलिए हमेशा ख्याल रहे, गुरु तो हमेशा गुरु ही रहेंगे ।
गुरु से किसी भी प्रकार की मजाक नहीं 


मेरी पसंदीदा रचनाएं



शिक्षक ने राघव की दुविधा को भांप लिया और बेहद शांत स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमंदों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”

“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।





रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।





माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा.





संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,
हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।

बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,
परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।





खिल उठे बहार बन
झुलस गए थे जो वन,
श्रावण की भेंट पा
जुड़े मन, जुड़े नयन !  


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

4792....जहॉं भूख पर लंबी-लंबी चर्चाऍं होती हैं....

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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​रंगमंच बहुत बड़ा है इस दुनिया का,
और हम सब सिर्फ अदाकार हैं,
परदे के पीछे छिपी पटकथा के हिसाब से
अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
​कोई नायक की भूमिका में मुस्कुराता है,
तो कोई खलनायक बनकर कोसा जाता है,
पर सच तो यह है कि भूमिका कोई भी हो—
महत्व इस बात का है कि उसे जिया कैसे गया।
​इतिहास गवाह है,
किताबों की 'भूमिका' अगर कमज़ोर हो,
तो लोग आगे के पन्ने पलटना छोड़ देते हैं,
और यदि जीवन में अपनी 'भूमिका' से इंसान भटक जाए,
तो पीढ़ियाँ रास्ता भूल जाती हैं।
​यह सिर्फ एक पद, एक नाम या एक काम नहीं,
यह तो वह उत्तरदायित्व है,
जो हमें समय सौंपता है।
महान वह नहीं जिसे बड़ी भूमिका मिली,
महान वह है जिसने अपनी भूमिका को बड़ा बना दिया।


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आज की रचनाऍं-


इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।



उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 
सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .
उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 
हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.
आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,
भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.




जनता में महंगाई बिजली पानी का हंगामा
नेताओं ,दलों में सत्ता हथियाने का हंगामा
गरीबी,बेकारी दूर खड़ी देख रही   निःशब्द
वोट किसे  देना होगा मचा है मन में हंगामा।।


कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l
आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll
स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l
टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll



निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

4791 ..प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, तो जीवन महक उठता है

 सादर अभिवादन 


आ गया जुलाई
टिफिन, रिक्शा, बस का चक्कर
 होता मन में धक-धक

मेरी पसंदीदा रचनाएं


प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, 
तो जीवन महक उठता है,

पर मर्यादा खोने वाले का, 
जग में मान घट जाता है।

वरना ऐसी विपदा आएगी, 
फिर चैंदिया खुजानी पड़ जाएगी,

समय की मार पड़ी जो सिर पर, 
चैंदिया पर बाल न छोड़ेगी।




ठेले वाले की आँखों में जो चमक आई, भाई साहब... सीधे अंबानी वाली थी! 
उसने मैडम को आधा नींबू-पानी मिला जूस थमाया, मैडम ने एक घूंट पिया और बोलीं—
"वाह! एकदम प्योर शुगर-फ्री है, गन्ने का स्वाद भी आ रहा है और कैलोरी भी नहीं है!" 
₹120 देकर मैडम तो पतली कमरिया मटकाते हुए चली गईं, पर पीछे हम दोनों का बिजनेस सेट हो गया!




हर बुझी हुई राख में—
एक ऐसी चिंगारी अब भी जीवित रहती है,
जो यदि एक बार विश्वास की हवा पा जाए,
तो
केवल एक दीपक नहीं,
पूरे आकाश को फिर से रोशन कर सकती है।



 हैं रातें काली,डरावनी,दिन पहाड़ से लगते 
हंसी खोखली सी आती है, आंसू खारे लगते 

रोज सुबह सूरज की किरणें आकर मुझे जगाती 
प्रात काल की हवा थपेड़े देकर नींद भगाती 
बासीपन सारा हट जाता , तन हो जाता 
ताजा मेरा मन चेतन हो जाता ,अपनेपन का राजा





पंच इन्द्रियों से हम जानें  
उत्पन्न होकर बढ़े व मिटे
दो पंछी रहते हैं जिस पर
एक सनातन वृक्ष जगत है !


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 1 जुलाई 2026

4790..धूप का लिबास

।।प्रातःवंदन। ।

रात की अब तह बना दो, विगत को चादर उढ़ा दो,

प्रात की गाओ प्रभाती, उदित रवि को जल चढ़ा दो।

अब उठो कुण्ठा बुहारो !


~ डॉ मृदुल कीर्ति

चलिये चंद वैचारिक,अलंकृत शब्दों से रूबरू हो, अब नज़र डालते हैं लिंको पर..✍️



चलन दुनिया का


दुनिया का चलन

लगे सीखने सबक

बहुत नादान थे हम

समझ न पाये सबब।


छल प्रपंच से भरी..

✨️

दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...

तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.

मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.


कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,

हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे...

✨️

कर दो दिल को आज़ाद


एहसान मानेंगे जनम सात .



तुम आओ न मेरे दिल को याद


एहसान मानेंगे जनम सात ..

✨️


मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं

✨️

रे मन !

मानसून का जोर,


मूसलाधार बारिश,


आंधी और तूफान बहुत हैं,..

✨️

इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

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