सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
गुरुवार, 9 जुलाई 2026
4798... स्पर्शजन्य अनुनाद दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है
बुधवार, 8 जुलाई 2026
4797.. सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...
।।प्रातःवंदन।।
अलि रचो छंद !
आज कण-कण कनक कुंदन,
आज तृण-तृण #हरित चंदन,
आज क्षण-क्षण चरण वंदन
विनय अनुनय लालसा है।
आज वासन्ती उषा है।
अलि रचो छंद !
सोहनलाल द्विवेदी
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढाते हुए..
जब नयनों में नींद नहीं थी
उसका ही तो ख़्वाब बसा था,
सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से
मन का आँगन पूर्ण भरा था !
✨️
अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है..
✨️
बादल भरी
उमस से भरपूर सुबह।
छोटे बच्चे
अपनी मस्तियों को
लगा चुके हैं तह ..
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लूडो के सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...
कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है।
एकबारगी दो-तीन चाल में
हम सांपों से बचकर,
छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर
लाल होने तक पहुंच जाते
और रख चुके हैं
बीते जून ..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
4796...संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के...
मंगलवारीय अंक में
जीना आसान नहीं है,
यह कॉंटों का बिछौना है
मखमली कोई दालान नहीं है।
हर सुबह एक नया इम्तिहान लाती है,
उम्मीदों की पोटली पीठ पर बांधे,
हमें दौड़ना है अंधाधुंध
जिसकी कोई अंतिम रेखा ही नहीं।
ख्वाब कांच की तरह टूटते हैं,
और उनकी किरचें पैरों में नहीं,
सीधे रूह में चुभती हैं।
अपनों के बदले चेहरे,
और वक्त की बेरुखी,
कभी-कभी भीतर तक सब सुखा देती है।
पर शायद,
इस मुश्किल में ही जिंदगी का असली स्वाद है।
आंसुओं से भीगे चेहरे पर
जब एक छोटी सी मुस्कान खिलती है,
जीना आसान तो नहीं है, बिल्कुल नहीं,
लेकिन इस कांटों भरे रास्ते पर
अपने पैरों के निशान छोड़ जाना ही...
जिंदगी है शायद...।
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
अलगनी पर दिन भर टँगी
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई
रात भर चैन की नींद आई ।
भोर उजियारी चुनौती लाई
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई
छाँव बिन धूप रास न आई ।
“मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगी—पहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।”
उस दिन भी रोज की तरह नशे में झूमता शराबी आया और मंदिर का घंटा बजाने लगा। घंटा बजाने से पहले वह एक क्षण के लिए रुका। उसने एक नजर सामने देखा और फिर घंटा बजाने लगा। फिर वही सारी क्रिया दुहराई जो वह रोज करता था। मंदिर से निकलने से पहले उसने गणेश जी की ओर देखा और बोला, छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे। इतना कहकर वह निकल गया।
सोमवार, 6 जुलाई 2026
4795 ..शब्दों से शब्द टकराते रहे
सादर अभिवादन
रविवार, 5 जुलाई 2026
4794 ... जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया
सादर अभिवादन
कुछ चित्र दिखा रहा हूँ
शनिवार, 4 जुलाई 2026
4793 ...संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है
सादर अभिवादन
जिस कुर्सी पर उन्हें बैठना था वह छत पर टंगी हुई थी।
उन्होंने छात्रों की ओर देखा और मुस्कुराए।
बिना कुछ कहे, वे ब्लैकबोर्ड की ओर बढ़े और लिखा:
परीक्षा - 15 मिनट, 30 अंक।
प्रश्न 3. उस छात्र का नाम लिखिए जिसने कुर्सी को छत पर टांगा था और उन दोस्तों का नाम लिखें जिन्होंने उसकी मदद की थी। (28 अंक)।
इसलिए हमेशा ख्याल रहे, गुरु तो हमेशा गुरु ही रहेंगे ।
गुरु से किसी भी प्रकार की मजाक नहीं
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
4792....जहॉं भूख पर लंबी-लंबी चर्चाऍं होती हैं....
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
4791 ..प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, तो जीवन महक उठता है
सादर अभिवादन
"वाह! एकदम प्योर शुगर-फ्री है, गन्ने का स्वाद भी आ रहा है और कैलोरी भी नहीं है!"
बुधवार, 1 जुलाई 2026
4790..धूप का लिबास
।।प्रातःवंदन। ।
रात की अब तह बना दो, विगत को चादर उढ़ा दो,
प्रात की गाओ प्रभाती, उदित रवि को जल चढ़ा दो।
अब उठो कुण्ठा बुहारो !
~ डॉ मृदुल कीर्ति
चलिये चंद वैचारिक,अलंकृत शब्दों से रूबरू हो, अब नज़र डालते हैं लिंको पर..✍️
दुनिया का चलन
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम
समझ न पाये सबब।
छल प्रपंच से भरी..
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दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...
तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.
मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.
कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,
हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे...
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एहसान मानेंगे जनम सात .
तुम आओ न मेरे दिल को याद
एहसान मानेंगे जनम सात ..
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मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं
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रे मन !
मानसून का जोर,
मूसलाधार बारिश,
आंधी और तूफान बहुत हैं,..
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इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️




































