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सोमवार, 19 सितंबर 2022

3521 / जीव, तू क्यों मरता जीता है?

 

नमस्कार  !  ब्लॉग जगत में आज कल कुछ सन्नाटा  पसरा हुआ है ........  सबकी अपनी - अपनी  समस्याएँ  हैं .......  और मेरी आज के दिन ये समस्या कि  नयी  रचनाएँ  ढूँढें से नहीं मिल रहीं .........  कोई बात नहीं ...... मैं भी निकल गयी हूँ  पुरानी गलियों में ..... कुछ तो मिल ही जायेगा ........आखिर कुछ तो आपको मसौदा देना है पढ़ने के लिए ......... एक तरह से  ब्लॉगर  साथियों को चेतावनी भी है कि यदि ऐसा ही मौन धारण किये रहे तो भैया हम तो अपना डंडा - डोली  ले कर निकल लेंगे ....... क्यों कि अब  पुरानी  गलियों की ख़ाक छानने की हिम्मत नहीं रही ....... यूँ तो बहुत कुछ है  पढ़ने के लिए ........ लेकिन कितना घूमें न हम भी ...... उम्र हो गयी है तो थकान भी हो जाती है ...... थक कर थोडा सुस्ता लेते हैं ...... और चाय  पी कर हो जाते हैं  ताज़ा दम .....और आप मिलिए  . कोलकता  से ....

फ़ुरसत में ….! कुल्हड़ की चाय!


कोलकाता !

मुझे तुम अच्छे लगे!!

बंगाल की धरती, समाज को देखने और अनुभव करने के सुख के मामले में, अपने आप में अद्वितीय है। यहां की भूमि जहां एक ओर सहृदय, सामाजिक और रसिक लोगों की दुनियां है, वहीं दूसरी ओर जीवन की आपाधापी, और बिखराव के बीच परम्परा को सहेजती-समेटती दुनियां का आंगन भी है।

बहुत सजीव वर्णन  किया है कोलकता  का .| कुछ समय रहने का अवसर मिला था मुझे भी ...... और शहरों के मुकाबले अभी भी उसकी अपनी महक बाकी है ........वैसे हमें भी अब तो कोलकता छोड़े  पंद्रह साल हो गए हैं ......  अरे ये  कुल्ल्हड़  की चाय थी या कोई प्रसाद ? इसे   पीने  के बाद तो ऐसा लग रहा कि मन में अध्यात्मिक विचार पैदा हो गए हैं ........ या फिर असर है आज कल धर्म कर्म के बारे में कुछ ज्यादा ही सोच रही हूँ ........ और घूमते घूमते एक जीवन की सत्यता को कहती खूबसूरत रचना से भेंट हो गयी ........तो हाज़िर है आपके लिए भी ..... 

जीव, तू क्यों मरता जीता है?


उपनिषद  व  वेद ऋचा में,
ज्ञान-गंगा गुंजित-व्यंजित है.
संरक्षण हो कर्मफल का,
जनम- चकर में जो संचित है.

आसक्ति के बंधपाश में,
लोभ, मोह और दम्भ-त्रास में.
भ्रूण-भंवर और काल-ग्रास में,
रहे सरकता चक्र-फांस में.

यहाँ तो जीवन चक्र की बात हो रही है  और    वहाँ आस्था किसमें क्या देख रही है ....... आइये पढ़ें   मन के  इन भावों को भी ..... 

जैसे कोई घर लौटा हो 


जीवन का प्रसाद पाएगा 

आज यहीं इस पल में जी ले, 

दिल की धड़कन में जो गूँजे 

गीत बनाकर उसको पी ले ! 


अब कौन घर लौटा है या नहीं ........ लेकिन हमारी सरकार विलुप्त होती चीतों की प्रजाति को बचाने के लिए चीतों को ज़रूर लौटा लायी है ........इस बात का काफी विरोध भी पढने में आ रहा है ..... वैसे भी किसी भी काम से हर इंसान तो खुश नहीं ही हो सकता ....... लेकिन फिर भी मैं एक लेख उठा लायी हूँ आप सबके लिए ....


चीते आ गए, स्वागत है


हमारे यहां एक प्रथा कुछ वर्षों से काफी चलन में है, वह है विरोध ! सरकार द्वारा कुछ भी हो रहा हो या किया जाए तुरंत एक खास पूर्वाग्रही, कुंठित, विघ्नसंतोषी तबका उसके विरोध में चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देता है ! उस काम के औचित्य पर, उसके प्रयोजन पर, उसके परिणाम पर सवाल उठाने आरंभ कर दिए जाते हैं ! भले ही वह काम देश के या लोगों के हित में ही क्यों ना हो ! 

 हम यहाँ चीतों के आने की बात कर रहे हैं   और उधर वो स्वप्न सा देख कर सोच रही हैं कि मुझसे गुज़र कर निकलो ......मुझे तो ख्वाब में , ख्वाहिश में समर्पण की   पराकाष्ठा  सी   लग रही ........ न जाने क्या क्या सोच चलती रहती है ......

सोचती हूँ अक्सर..


सोचती हूँ अक्सर
तुम गुजरो कभी
मुझमें होकर
छूकर एहसास मेरे
कभी देखो नज़रभर
कभी चुन लो मुझे
मोतियों की तरह
आप तो सोच रही हैं   कि  कभी भी जुदा न  होएँ  और अभी इस रचना पर मंथन चल ही रहा था  कि सच ही पहुँच  गयी मंथन ब्लॉग पर  और  वहाँ एक अलग ही सोच की रचना नज़र आ गयी ..... जहाँ समाज से  आग्रह  किया जा रहा कि उसे अपने ढंग से  जीने का अवसर दिया जाये .... 

उसे भी हक दो,वह भी उडना चाहती है,
उसकी परवाजें भी तुम्हारी तरह,
आसमान को छूना चाहती है.
क्यों अनचाहे झपट्टे से
उसके हौसले को तोडना चाहते हो?

आज तो कमाल ही हो गया ....... यहाँ आग्रह है कि उसे  अपने तरीके से  जीने देना चाहिए ...... तो अगली रचना में वह स्वयंसिद्धा  बन गयी है ....... वैसे भी कोई  माँगने  से कुछ देता नहीं ....... अपने अधिकार छीन कर लिए जाते हैं .....  

आज़ाद हुई मैं


चली हूँ अपनी चाल जैसे ही
वो कहते हैं अब तो बर्बाद हुई मैं 
 उड़ रहे हैं पंख अब हवाओं में 
परिंदों का परवाज़ हुई मैं 

रोके कोई बेशक मुझे अब भी 
रुकेगी न उड़ान मेरी यारों 
साथ देंगे जमीं आसमाँ मेरा 
जोड़ करके सजा लूँगी मैं टूटे तारों .

हौसले तो ज़बरदस्त हैं ........ लेकिन इतना आसान भी नहीं है पंखों को फैला  कर उड़ जाना ....... मौका मिलते ही बाज़ की तरह झपट कर तोड़ दिए जाते हैं   पंख  भी और हौसले भी ...... और तब जो मन पर  बीतती है उसको इससे अच्छे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता .... 

बोलो हे !....


बोलो हे ! विधि के विधायक

सघन वीथिका में दृग हमारे

क्यूँ कर दिए वृहद् इतना

उभरती हैं जो वृतियाँ आज ये सहसा

उन्हें कुछ भिन्न सा दिखने लगा है ....


अब इस रचना के बाद मन और मस्तिष्क दोनों को ही थोड़े विश्राम की आवश्यकता है ......... तो आज बस इतना ही ......... आज की प्रस्तुति  अधिकांश रूप से  पुरानी  पोस्ट पर ही आधारित है | ........  अगली बार देखते हैं कि  कहाँ भटकती हूँ मैं .......... उम्मीद तो कर रही हूँ कि पढ़ कर आप निराश नहीं होंगे ........ फिर भी कोई सुझाव देना चाहें तो स्वागत है ........ 

मिलते हैं अगले सोमवार को ........ कुछ नए लिंक्स के साथ .....


नमस्कार  

संगीता स्वरुप .




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