सादर अभिवादन
आज अंतिम दिन
पितृपक्ष का
जाओ बाबूजी..जाइए माता श्री
काफी से अधिक
अहसान हैं हम पर
कभी उऋण नहीं हो सकते
जाइए पर
मन में रहिए हरदम
हमारी मदद के लिए
कल विराजेंगी माताश्री
और कल ही है
महाराजा अग्रसेन जी की जयन्ती
अब रचनाएं देखें
बहुत
बहुत पहले
देवकी
यशोदा
कौशल्या
सुमित्रा
कैकयी
माया
त्रिशला
मरियम
और
अमीना
बन के
धरती पे आया था
ज़िंदगी इम्तेहान लेती है ,सौ फीसदी लेती है रोज़
हर पल दिमागी सतर्कता ,जरूरी रखना होता है रोज़
घर -गृहस्थी ,शिक्षा ,व्यापार हर छेत्र में इम्तेहान होता रोज़
सावधानी हटी,दुर्घटना घटी उक्ति इस्तेमाल होती रोज़
कुछ प्यार के इजहार मे हैं
और कुछ खोए हुए प्यार मे हैं,
बस, फर्क इतना है, ऐ दोस्त!
कि तुम इस दयार मे हो,
और हम उस दयार मे हैं।
मैं नहीं सोचती तुम्हें,
मन कांप जाता है,सोच कर ,
कैसे! हवा सा एक व्यक्तित्व
गुम हो गया देखते ही देखते।
अभी थे,अब नहीं हो
सब कुछ लौटकर आता है
एक अंतराल के बाद
अपनी प्रतिक्रिया निभाकर
जल ...
कैसे रूक जाऊं
क्यों थक जाऊं
आगे बस आगे की ओर
बढ़ना ही तो मेरा लक्ष्य है
कितने ही अंशों में
विभाजित मैं
भूलती अपना अस्तित्व
कौन हूँ मैं ??
आज बस
सादर





