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गुरुवार, 22 सितंबर 2022

3524...दूध-धुला मैं हूँ पापा!

शीर्षक पंक्ति:प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ। 

पढ़िए आज की पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

एक ही थैली के चट्टे-बट्टे की फ़ोर्जरी राइम

पापा: देश-प्रगति फिर रुकती क्यूँ,

रोज़ गरीबी बढ़ती क्यूँ?

चट्टेबट्टे  चोर बड़ा पापा,

मैं निर्दोष सदा पापा!

बट्टे: चट्टे  चीट बड़ा पापा,

दूध-धुला मैं हूँ पापा!

है दोष किसका

जब भी नीचे आना चाहा

मेरे पंख सिमट न पाए

धरा पर आने में असफल रहा

सूर्य की तपती धूप से

भूख प्यास से बेहाल हुआ

नाज़ुक ख्वाब...

कच्ची धूप की पहली किरण

तुम्हारी पलकों पे जब दस्तक दे

हौले से अपनी नज़रें उठाना

नाज़ुक से मेरे ख्वाब

बिखर न जाएँ समय से पहले कहीं...

सुना है तुम चाँद पर रहने लगे हो..

छत पर

थाली में उतारूँगी चाँद को

पूनम की रात को

तुम भी मिलने चले आना..

मैं तुम्हें देना चाहता था

मैं तुम्हें

संस्कार और विरासत में

बूंदें ही देना चाहता था

जानता हूँ

तुम दोनों बूंदों से

सजा लोगी

प्रकृति

और

अपनी बगिया।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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