निवेदन।


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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

4286...तुम भटक गए बाजार में...

शीर्षक पंक्ति:
आदरणीया सरिता सैल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए पढ़ते हैं आज की पाँच पसंदीदा रचनाएँ-


इश्क़ तुम्हारे लिए बाजार था
हमारे लिए ईश्वर का दरबार
*****

फ़हमी बदायूंनी: आज पैबंद की ज़रूरत है, ये सज़ा है रफ़ू न करने की...


सुनो लोगों को ये शक हो गया है
कि हम जीने की साज़िश कर रहे हैं

*****

नवकिरण पत्रिका में प्रकाशित तीन गीत

*****

सीख जीवन की

खिलखिलाते से पौधे को यूँ मुरझाया सा देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था कि तभी हमने देखा कि एक पत्ती के किनारे से एक बूंद टपक रही है, ध्यान से देखा तो लगभग हरेक पत्ती के सिरे पर पानी की एक बूंद थी। मेरी खुशी का पारावार न रहा, मैंने बोला कि अब पत्ते एकदम स्फुर्ती से पहले जैसे हो जायेंगे क्योकि जो पानी अधिक था, पौधा स्वयं पत्तियों के माध्यम से निकाल देगा और आश्चर्यजनक रुप से मात्र तीन दिनों में ही मुरझाये लटके पत्ते फिर से सीधे और जीवंत हो गये।

*****

सुनने-सुनाने की उम्र


अब नहीं कोई उनकी सुनने वाला
फिर भी जब तब सुनाने से बाज नहीं आती
भले ही किसी के कान में जूं रेंगे या न रेंगें
बस एक बार शुरू क्या हुई कि
सुनाती चली जाती है
सुनाती चली जाती है

*****

फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 


 


बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

4285.. चाँद पर जाने की ज़िद..

 

।।प्रातःवंदन। ।


ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए
और फिर नेताओं की शोलाबयानी देखिए।
भीख का लेकर कटोरा चाँद पर जाने की ज़िद,
ये अदा, ये बाँकपन ये लंतरानी देखिए !
अदम गोंडवी
कवि/शायर अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) की जयंती पर उन्हें याद करते हुए...✍️

देव और असुर 


किन्हीं सबल क्षणों का नाम देव 

और दुर्बल क्षणों का नाम असुर रखकर 

मानव ने मुक्ति पा ली !


जब मन स्वस्थ है, सजग है ..

✨️

दो पल


बहला गया, पल कोई, दो पल,
कुछ समझा गया, 
मन को!

वो सपना, बस इक सपन सलोना,
पर लगता, वो जागा सा!..
✨️

आज हिंदुस्तान मेरे घर आया,
दिल्ली की खुशबु भी साथ लाया,
इस immigrant की ज़िन्दगी में ऐसा लम्हा,
कभी-कभी ही हाथ आया।  
आज हिंलेखक और उसका आचरण
✨️
किसी भी लेखक के लेखन में उसके व्यक्तित्व या उसके आचरण की झलक दिखना आवश्यक तो नहीं होता फिर हम उसे ढूँढने की कोशिश ही क्यों करते हैं ! लेखक सर्वप्रथम एक इंसान है और लेखन दुस्तान मेरे घर आया। ..
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024

4284 ...धूल की इस वीणा पर मैं तार हर त्रण का मिला लूं!

 सादर अभिवादन


घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं


क्षितिज कारा तोड़कर अब
गा उठी उन्मत आंधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास तन्मय तड़ित बांधी,
धूल की इस वीणा पर मैं तार हर त्रण का मिला लूं!

भीत तारक मूंदते द्रग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता
उंगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूं!


आज की शुरुआत



यों बोलचाल में देशज प्रयोग ‘दिवाली’ हम सुन सकते हैं, पर पढ़े-लिखे लोग लिखने-बोलने में सही रूप का प्रयोग करेंगे तो अन्ततः यही हिन्दी के हित में होगा। दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी ही भाषा के शब्द के लिए वर्तनी निर्धारण अँग्रेज़ी में लिखे जा रहे DIWALI के आधार पर करने लगते हैं और आई (I) देखकर ‘दीवाली’ के ‘द’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा तय कर देते हैं।

मूल शब्द है, दीप। बताने की ज़रूरत नहीं है कि दीप का मतलब दीया। ‘दीप’ में जुड़ा ‘आलि/आली’ (कतार, शृङ्खला) तो बना ‘दीपालि/दीपाली’। ‘आवलि’ या ‘आवली’ जोड़िए तो ‘दीपावलि’ या ‘दीपावली’। ‘दीप’ में ‘माला’ जुड़ा तो ‘दीपमाला’। ‘मालिका’ जोड़िए तो ‘दीपमालिका’। अर्थ वही है। हिन्दी के स्वभाव के हिसाब से ‘दीपाली’ और ‘दीपावली’ का सहज परिवर्तन ‘दीवाली’ है।

महादेवी वर्मा की कृति ‘दीपशिखा’ की यह पंंक्त‍ि पढ़िए—इस मरण के पर्व को मैं आज दीवाली बना लूँ।





है जो पथ कल्याण का, बुद्धि वहाँ पर एक।
कामी जन संसार के, मानें इसे अनेक ।।33 ।।

नज़र स्वर्ग पर है टिकी, दिखे नहीं कुछ और।
दूषित ऐसी सोच है, करना इस पर गौर।।34।।





हाथों में हो हाथ
मिले कदम से कदम,
जीवन के हर हाल में
रहे समन्वय और संयम ।

एक दूजे के लिये चांद से
यह दुआ है ता उम्र ,
हो पल पल सुकून का
और हर पल शुभ शगुन ।




प्रत्यूषा का प्रसव काल है,
जल में थोड़ी हलचल है।
चतुर्दशी का चाँद  गगन में,
डल के तल में कोलाहल है।

यह झील सती का सरोवर,
शंकर समीप पर्वत ऊपर।
नीचे जल झलमल-झलमल
सोहै  दूधिया चंद्रशेखर।




शब्द की सामर्थ्य कहती,
बचपना कब लिख सके हम
ओट से आ चांद बोले,
हम निकट ही नित खड़े हैं।।

******
आज सखी व्यस्त है
सो आज भी मैं ही हूं

आज बस
वंदन

सोमवार, 21 अक्टूबर 2024

4283 ..पर सच बताना … ये इंतज़ार है चाँद का... या ?

 सादर अभिवादन

इस माह और अगले माह
सारे विशिष्ठ उत्सव
न लिखने का समय और
न ही पढ़ने का समय
बस खाने-खिलाने का  समय
चलिए करें ....
आज की शुरुआत

मैं तुमसे नहीं कहूँगा


कि आजकल चाय बनाते वक़्त
मेरे हाथ काँपते हैं,
यह भी नहीं कहूँगा
कि आजकल मेरे घुटनों में
बहुत दर्द रहता है.






अमन की बातें परिंदे कैसे मेरी मानते
रक्त में डूबा हुआ एक पर था मेरे सामने

अब तलक भूली नहीँ बचपन की मुझको वो सजा
मैं खड़ा था धूप में और घर था मेरे सामने




हंसना कि हंसने से रोशन होती है सारी फिज़ा ,
मिट जाता है गुबार,
आसमान का रंग थोड़ा और नीला हो जाता है
और धरती!
थोड़ी और हरी।।





पर सच बताना … ये इंतज़ार है चाँद का
या आवारा से किसी प्यार के झोंके का ...

जानता हूँ ये करवा चौथ का व्रत
अभिव्यक्ति है प्रेम के अनकहे एहसास की
समर्पण के उस भाव की
जो शिव कर देता है हर बंधन …




टहनियाँ फूल से
भरने लगी हैं

बंजरों की झाड़ काटी
कंटकों की बाड़ छाँटी
मृत पड़ी माटी जगाईं
और कुछ ऐसे जगाईं
मरुधरा विकसित-हरित
खिलने लगी है॥




पूछ लेना तुम सभी नक्षत्र पिंडों की हदों से
पूछ लेना आज अपने आसमाँ की सरहदों से
चार वेदों की ऋचाओं से , पुराणों के पदों से
पूछ लेना देवताओं की सुरा के मयकदों से


आज बस
वंदन

रविवार, 20 अक्टूबर 2024

4282 मक्के का आटा और सरसों का साग

 सादर नमस्कार

मिली जुली
पढ़िए कुछ पसंदीदा रचनाएं




एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि जो मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों?इसका क्या कारण है ?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये। क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं?सब सोच में पड़ गये। तभी एक वृद्ध खड़े हुये और बोले महाराज की जय हो !

आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।

राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं। सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा - "तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ। तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं वे दे सकते हैं।






नभ के भाल पर
जब हुआ उदय
दूधिया चंद्रमा,
झरने लगी चाँदनी
शीतल उजियारी
छल-छल गगरी !
को जागरी ?





न भूले न भूले न भूले रे
मोहे आजी के देवता न भूले रे॥

आजी के देवता बिरवना बिराजें।
आजी के देवता फुलववा बिराजें
पाती-पाती देवी औ साखा-साखा देवा
तुलसी बियहवा न भूले रे॥






अपनी सफाई में इन्होंने हमेशा खजुराहो को सामने कर द‍िया परंतु ये नहीं बताया क‍ि वे काम क्रीड़ा के आसन थे जो योग की श्रेणी में आते हैं।

बहरहाल क‍िसी भी शख्स‍ियत के दो चेहरे होते हैं, रतन टाटा के भी थे, हमें उन दोनों चेहरों को देखकर अपना आंकलन स्वयं करना चाह‍िए क‍ि हम कहां तक इसे देश, संस्कार, और भारतीय सभ्यता के ह‍ित में देखते हैं।





तभी मुझे समझ आया कि सिंधी समाज व्यापार में इतना आगे क्यों है ! उन्होंने ही मुझे बताया कि बांसटाल में कृष्णा आटा चक्की पर यह आपको मिल जाएगा, पर अगली बार आप मुझसे ही लें ! प्रसंगवश बता दूँ कि दो-तीन साल में ही उनकी दूकान से मौसम पर चार से पांच बोरी मक्के का आटा बिकना शुरू हो गया था ! हम जब भी मिलते थे तो इस बात का जिक्र वे वहाँ उपस्थित सभी लोगों से किया करते थे कि शर्मा जी के कारण ये चीज मैंने रखनी शुरू की है ! इसीलिए मुझे तनिक गुमान सा है कि रायपुर में इस व्यंजन को लोकप्रिय बनाने में मेरा भी कुछ योगदान तो जरूर है !  

मकई के आटे के साथ वहाँ सरसों के साग की उपलब्धि की बात भी कर ली जाए ! तो लगे हाथ बता दूँ कि छत्तीसगढ़ में इस तरह के पत्तेदार साग को भाजी कहते हैं, जैसे पालक भाजी, मेथी भाजी,चनाभाजी इत्यादि ! वहाँ के सबसे बड़े सब्जी बाजार, जिसे शास्त्री मार्किट (अंग्रजी भाषा के शब्द छत्तीसगढ़ी में बिलकुल दूध में पानी की तरह घुल-मिल गए हैं) में भी यह ''महोदया'' कभी-कभार ही मिलती थीं !पर शंकर नगर के पास टाटीबंध के इलाके में सुबह लगने वाले बाजार में, जहां छोटे खेतिहर अपना उत्पाद खुद ही ले कर आते थे, इनकी उपलब्धि बनी रहती थी !

****
बस

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

4281...अभ्र ओट मे प्रफुल्लित हर्षित साँवली घटा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।  

सादर अभिवादन।

शनिवारीय प्रस्तुति में आज पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

780. कुछ ताँका (28 ताँका)6. बच्चों की अम्मा

व्यस्त रहती सदा
काम का टीला 

धीरे-धीरे ढाहती

ज़रा भी न थकती।

*****

शरद पूर्णिमा [ चोका ]

अभ्र ओट मे

प्रफुल्लित हर्षित

साँवली घटा

देख ज्योत्सना छटा

धरा गोद में

रवितनया तीरे

*****

ओ शरद के चाँद

भूल गए थे कर्तव्य अपना

और अपनी पहचान

कि उम्मीदों के दीप

बार-बार जलाते रहना ही

है उनका काम।

*****

दो उँगलियों द्वारा बना V चिन्ह, कहां से आया यह

·         वैसे V चिन्ह का सकारात्मक अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि हाथ किस तरह से रखा गया है यानी उसकी स्थिति क्या है। यदि हाथ की हथेली सामने की तरफ हो तब तो वह सकारात्मक संदेश देता है। पर यदि हथेली सामने वाले के विपरीत हो यानी अंदर की तरफ हो तो इसे कई देशों में यथा ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, यूनाइटेड किंगडम इत्यादि में अपमानजनक इशारा माना जाता है। इसलिए किसी भी चीज को अपनाने के पहले उसकी पूरी जानकारी होनी आवश्यक होती है। 

*****

       मेहंदी डिज़ाइन- भाग 11 (mehndi design- part 11)

 
 

·         कहा जाता हैं कि मेहंदी की महक रिश्तों को भी महकाती हैं। आइए, इस करवा चौथ पर हाथों पर सुंदर-सुंदर मेहंदी डिजाइन सजाकर अपने रिश्तों को महकाइएं..

       *****

         फिर मिलेंगे।

     रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

4280...माटी मेरे गाँव की

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।

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मैं जंगल भ्रमण के लिए

उत्सुक रहती हूँ

किंतु जालीदार गाड़ियों से

जानवरों को कौतूहल से देखकर,

पक्षियों की विचित्र किलकारी,

दैत्याकार वृक्षों की 

बनावट से अचंभित

जंगल की रहस्यमयी गंध

स्मृतियों में

भरकर ले तो आती हूँ

पर सोचती हूँ

जंगल के कोने में 

उगी घास की भाँति

दुनिया की भीड़ में

तिनके सा जीना

 क्या यही है जन्म का 

उद्देश्य ?


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आज  की रचनाएँ-


जिस दिन जीत लेंगे उजाला
उस दिन 
घुंघुरुदार पायलें
देहरी देहरी बजेंगी
चूड़ियों की खनकदार हंसी 
अच्छी लगेंगीे

चाँद बजायेगा बांसुरी
तबले पर थाप देगा सूरज
चांदनी की जुल्फों से 
टपकेगी शबनम



चाँद को भी है मयस्सर कहाँ ये दीवाली 
शिव की काशी में गगन दीप जलाते रहिए 

भारतीय संस्कृति की पहचान हैँ मिट्टी के दिए 
घर के आले में या आँगन में जलाते रहिए 

पर्व यह ज्योति,पटाखों का, सफाई का भी 
दिल के पर्दों पे जमीं धूल हटाते रहिए 




वो पहाड़ी धार वाली
बोली द्या अब ना गिरेगी
बाट चौड़े पक्के वाले
 माट में अब ना सनेगी
गाड़ी मोटर पों पों करती
अब तो हर इक ख्वाल आयी
माटी मेरे गाँव की आ के मिली रैबार लायी





जाना कहाँ था, पहुँचे कहाँ हैं 

दाता का दर सदा ही खुला है 


 भटके थे राह अब चेत आया 

क्या वह मिलेगा जो था गँवाया 



दीन के नाम पर खून की होली,
किस ने बताया, ये कौन सा रस्ता है।
दूध तेल की गंगा, नाली में बहती,
सड़क किनारे कोई भूख से खस्ता है।
रोटी के लालच में जो बदला दीन,
या तो मै सस्ता हूँ या दीन सस्ता है


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आप सभी का आभार
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में ।
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