निवेदन।


फ़ॉलोअर

रविवार, 26 जुलाई 2026

4815...हौंसले रख संभालकर पँछी...

 शीर्षक पंक्ति:आदरणीया डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

रविवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-

190- बैठ ऐसे न हारकर पँछी!

पथ में सूरज कभी सताता है
खुद भी जलता , तुझे जलाता है
इसको ढलना , ढलेगा ही,इसका
आना-जाना यही बताता है -
हौंसले रख संभालकर पँछी
देख तू फिर उड़ान भर पँछी!

*****

ज़रा ठहरो!

​लेकिन सुनो,

यह आक्रोश जो तुम्हारी रगों में उबाल मार रहा है,

 कोई अभिशाप नहीं,

 तुम्हारी बची हुई जिजीविषा का प्रमाण है।

यह प्रमाण है कि तुम अभी मरे नहीं हो,

तुम व्यवस्था की खामोश बेड़ियों को

स्वीकारने से इंकार करते हो।

​पर इस आग को

केवल राख बन जाने के लिए मत जलने दो।

​*****

शिक्षा : सबसे बड़ा अस्त्र

जब विद्यार्थी
अपने अधिकार—शिक्षा—के लिए सड़कों पर उतरते हैं,
जब विद्यालयों के बंद होने की खबरें आती हैं,
और जब एक बेटी को शिक्षा के लिए
अपना जीवन गंवाना पड़ता है,
तो यह केवल एक परिवार का नहीं,
पूरे राष्ट्र का दर्द बन जाता है।
*****

छात्र आंदोलन जंतर मंतर

सेंक रहे सब गर्म तवे पर,दो रोटी।
उजले कपड़े नीयत रखते,जब खोटी।।
समाधान में चिकनी चमड़ी,रख मोटी।।
राजनीति की चौसर खेले,नित गोटी।।

*****

काई की पहली हरियाली

तलहटी में पड़े पत्थर
एक ही दिन में वहाँ नहीं पहुँचते।
उन्हें पानी
वर्षों तक
अपनी उँगलियों से
बीच धारा की ओर
सरकाता रहता है।

*****

बघेरा मर गया

कल अचानक एक चीख से सुनी जैसे किसी पिले को किसी ने मारा हो जैसे। बाहर देखा तो कुछ नहीं दिखा। 
आज सुबह पता चला कि बघेरा मार गया। मोंटू के आंगन में ही। एरिका वाणी बघेरा को देख रही थी हैरान परेशान। ये क्या हो गया। एरिका ज्यादा परेशान थी।  स्कूल जाने से मना कर रही थी। हम एरिका को नहीं समझ सकते ना ही उसके स्नेह को।  डांट डपट कर एरिका और वाणी को स्कूल भेज दिया। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 

और हां एक बात बताना मैं भूल गया चारों पीलें , बघेरा और स्नोई सभी सुनामी से भी घुलमिल गए थे। सुनामी माला और सुमित की विदेशी नस्ल की कुतिया। बड़ा डर लगता है उससे। स्नोई चारो पीलें और बघेरा सब उससे कब घुलमिल गए मालूम नहीं। अचरज होता था ये देख कर। 
*****
ख़ुश-ख़बरी!

'पाँच लिंकों का आनन्द' अपने सुधी पाठकों एवं रचनाकारों के लिये 'पाक्षिक लघुकथा' अंक आरम्भ करने जा रहा है। लेखक रचना की स्वरचित व मौलिक होने की घोषणा के साथ आगामी अंक में प्रकाशन हेतु भेज सकते हैं। लघुकथा पाक्षिक अंक में प्रकाशन हेतु लघुकथा भेजने की 

अंतिम तिथि: 30 जुलाई 2026 एवं प्रकाशन की तिथि 02 अगस्त 2026 

कैसे भेजें: ब्लॉग संपर्क फार्म के ज़रिये। 
आपके द्वारा लिखी गयी लघुकथाएँ 'पाँच लिंकों का आनन्द' पर प्रकाशित की जाएँगीं साथ ही वरिष्ठ ब्लॉगर एवं लेखक आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी के द्वारा प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा। 

लघुकथा और लघु कथा में अंतर है जिसे नीचे विस्तार से समझाया गया है।     

 हिंदी साहित्य के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में'लघुकथा’ और ‘लघु कथा’ के बीच का अंतर केवल एक 'स्थान' (Space) या वर्तनी का नहीं है, बल्कि यह विधात्मक और संरचनात्मक अंतर है।

अक्सर आम भाषा में लोग इन्हें एक ही मान लेते हैं, परंतु साहित्य-शास्त्र और वर्तमान प्रयोग की दृष्टि से इनमें मौलिक भेद है।

 आधारभूत अंतर 

आधार                               लघुकथा                                                          लघु कथा

1.शब्द-विन्यास-                सामासिक संयुक्त शब्द है।                                         दो पृथक शब्द (विशेषण+विशेष्य)

2. विधागत स्थिति-            हिंदी-साहित्य की स्वतंत्र विधा।                                   यह कहानी विधा का एक रूप है। 

3. आकार/शब्द सीमा-      अत्यंत सूक्ष्म (सामान्यतः 100-500 शब्द)                     अपेक्षाकृत बड़ी (सामान्यतः 800-2500+ शब्द)

4. केन्द्र बिंदु-                     एक क्षण, एक बिंदु अथवा एक मारक विचार।            जीवन का विस्तृत फ़लक,चरित्र-विकास और घटनाक्रम। 

5. शिल्प/तकनीक-            अंत में यकायक प्रहार(Punch Line)                           क्रमिक विकास(प्रारम्भ,मध्य, चरमोत्कर्ष और अंत)

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:

(क) लघुकथा (एक शब्द /स्वतंत्र विधा)   

यह हिंदी साहित्य में पिछले पाँच-छह दशकों में तेज़ गति से विकसित हुई एक गद्य-विधा है।

 एकता और तीखापन: इसमें जीवन के किसी एक दृश्य, विचार या घटना का क्षणिक चित्र होता है। इसमें अनावश्यक विवरण, चरित्रों का लंबा परिचय या पृष्ठभूमि के लिए जगह नहीं होती।

 अंतिम प्रहार (Punch/Climax): लघुकथा की सबसे बड़ी पहचान इसका 'अंतिम वाक्य' या 'अंतिम विचार' होता है जो पाठक की संवेदना और चेतना पर गहरा प्रहार करता है।

 संकेतात्मकता: इसमें कम से कम शब्दों में बड़ी बात कही जाती है। व्यंग्य, प्रतीकात्मकता और संकेत इसके मुख्य हथियार हैं।

उदाहरण के लिए: यदि कोई रचना केवल 150 शब्दों में रिश्वतखोरी या सामाजिक विडंबना पर बिना किसी अनावश्यक विस्तार के तीखा प्रहार करती है और अंत में पाठक को सोचने पर मज़बूर कर देती है, तो वह लघुकथा है।

हिंदी-भाषी क्षेत्रों में लघुकथा यथोचित विकास कर चुकी है और पाठकों की रूचि की लोकप्रिय विधा बन चुकी है। 

(ख) लघु कथा (दो शब्द/छोटी कहानी)

यहाँ 'लघु' एक विशेषण (Adjective) है, जो 'कथा' (Story) की लंबाई या आकार को छोटा बताता है।

 आकार में छोटी कहानी: यह मूलतः 'कहानी' विधा ही है, जो आकार में थोड़ी छोटी होती है (जैसे औसत 1000 से 1500 शब्दों की कहानी)।

 विस्तार और चरित्र विकास: इसमें पात्रों का थोड़ा परिचय, पृष्ठभूमि का वर्णन, घटनाओं का उतार-चढ़ाव और विस्तृत संवाद शामिल हो सकते हैं।

 कथानक का फैलाव: इसमें जीवन के एक से अधिक पहलुओं या घटनाओं के प्रभाव को दिखाया जा सकता है।

 वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में स्थिति:

वर्तमान साहित्यिक परिवेश में इन दोनों रूपों को लेकर एक स्पष्ट विमर्श और प्रवृत्ति दिखाई देती है:

1. दिल्ली-एनसीआर (वैचारिक और पत्र-पत्रिकाओं का केंद्र)

लघुकथा की संगठनात्मक उपस्थिति: दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में लघुकथा के बाकायदा मंच, सम्मेलन और समर्पित पत्रिकाएं (जैसे लघुकथा वृत्त, सबलोगआदि में विशेष स्थान) मौजूद हैं।

 यहाँ लघुकथा को एक ऐसी स्वतंत्र विधा माना जाता है जो तत्काल सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं (जैसे- मीडिया का ध्रुवीकरण, महानगरीय अकेलापन, उपभोक्तावाद) पर त्वरित टिप्पणी करती है।

2. उत्तर प्रदेश (विधागत अनुशासन और बहस): उत्तर प्रदेश (लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, आगरा आदि) हिंदी साहित्य के सिद्धांतों का बड़ा केन्द्र रहा है।

  यहाँ के आलोचकों और लेखकों ने 'लघुकथा' और 'लघु कथा' के अंतर को रेखांकित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ लघुकथा को "गागर में सागर भरने" की कला माना गया है, न कि केवल "किसी बड़ी कहानी का संक्षिप्त रूप।"

3. बिहार और झारखंड (सामाजिक यथार्थ और आक्रामकता)

  बिहार और झारखंड के आंचलिक और शहरी क्षेत्रों में लिखी जा रही लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ, जातिगत विषमता, भ्रष्टाचार और विस्थापन के मुद्दे प्रमुखता से आते हैं।

 यहाँ लिखी जाने वाली लघुकथाएँ भाषा की दृष्टि से अत्यंत सीधी, मारक और आमजन की भाषा के करीब होती हैं।

 निष्कर्ष

 यदि आप एक अत्यंत संक्षिप्त (100-400 शब्द), बिना किसी अतिरिक्त विवरण के, अंतिम वाक्य में गहरा प्रहार करने वाली स्वतंत्र विधा की रचना लिख या पढ़ रहे हैं, तो वह लघुकथा है।

 यदि आप एक ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जिसमें पात्र हैं, वातावरण का वर्णन है, घटनाक्रम का विकास है, लेकिन वह आकार में बहुत लंबी न होकर छोटी (800+ शब्द) है, तो वह लघु कथा (छोटी कहानी) है।

**************************************************************************

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन अंक
    सारी दुविधाएं दूर कर दी
    लघु कथा अंक का आगाज़
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात, सुंदर प्रस्तुति, उत्तम आयोजन, लघुकथा अंक के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

    जवाब देंहटाएं
  3. अति लघु कथा (अलक) भी मान्य है
    वंदन

    जवाब देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...