

मधुर गीतों का ये सफर ;
रूँध कंठ में दम तोड़ देगें
आत्मा के स्वर प्रखर ;
बसना मेरी मुस्कान में नित
ना संग आँसुओं के बहना तुम





आज बस
सादर
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...







धुआँ धुआँ सी ,
जो मोड़ दिए
जाते हैं
अगली रात
पढ़ने के लिए।...
और ये कविता पढ़ जो मुझे लगा वो ये कि ......
कभी कभी इंसान इतना थक जाता है कि सोने के लिए ही किताबों का साथ ढूँढता है ...
आप कितना ही विचार करें सही गलत को समझें ,
लेकिन क्या ज़रूरी है जो आपको सही लगता हो वही न्याय व्यवस्था भी समझे ....
अब सियासत बस गालियाँ रह गईं
ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !
चोर भी सर उठा कर चले आ रहें
उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !
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और अब सब पढ़ते पढ़ाते जो हमेशा ही अपनी सोच से सकारात्मक रहे उनके लेखन में भी कहीं कहीं निराशा की सी भावना दिख रही है ... प्रवीण पाण्डेय जी को बहुत समय से पढ़ रही हूँ और उनके उत्कृष्ट लेखन की कायल रही हूँ .... निराशा में भी आशा तो दिख ही रही है ...आप भी पढ़ें
रहे अन्य कारण, विवशता प्रखर थी
नहीं कर सका, जो संजोया हृदय ने।
बड़ी चाह, ऊर्जा प्रयासों में ढाली,
नहीं स्वप्न वैसा पिरोया समय ने ।०।



हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...
हमारे पूर्वज कहते थे कि पीपल, बरगद, गूलर, नीम बेल के वृक्ष नही काटना चाहिए, इससे वंश का नाश होता हैं। यह कथन आज ऑक्सीजन की कमी से जूझते लोगो को देखकर सिद्ध हो रहा है।
जिन लोगों ने अभी तक इस वासा (अडूसा, बाकस) का उपयोग किया उन्होंने पहले से काफी राहत महसूस किया। चूंकि हम इसे मंगवा कर पीड़ित लोगों के घर तक निःशुल्क पहुंचा रहे हैं तो इसके लिए उन लोगों ने हमें फोन करके धन्यवाद दिया। पर असली धन्यवाद के पात्र तो यह औषधि है, जो लोगों की कफ, खांसी और फेफड़ों की समस्या को दूर कर रहा है। खुशी हो रही कि बिहार के बाहर वाले कई लोगों ने इसकी माँग की। कल तक उनलोगों का भी पार्सल भेज दिया जाएगा। जिन्हें निःशुल्क चाहिए 9334821929 पर संपर्क करें।शुक्रवारीय अंक में

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनुपमा त्रिपाठी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है।
करोना की दूसरी लहर कमज़ोर पड़ती नज़र आ रही है अर्थात ग्राफ पीक (शीर्ष) से नीचे की ओर आया है जो सीधा नीचे नहीं आएगा बल्कि फ़्लैट होकर आगे कुछ महीनों तक चलता रहेगा। अतः सावधानियों में समझौता न करें। कोविड-19 नियमों का पालन करें।
आइए पढ़ते सद्य प्रकाशित कुछ पसंदीदा रचनाएँ-
पीले पत्तों सी परिणति...कुसुम कोठारी
गर्व टूटके बिखरा ऐसा
इक दूजे का मुंह तके।
मोम बनी है पिघली पीड़ा
ठंडी होकर ओस झरे।।
बारिश .....!!...अनुपमा त्रिपाठी
जग मेले में आकर मिलते
सँग-सँग खुशियां सोग बांटते,
इक दूजे का स्नेह पात्र बन
बढ़ते, पलते, और पनपते !
इक झटके में गुम हो जाते
मधुर याद बनकर रह जाते !
इतिहास में हम | कविता | डॉ शरद सिंह
आँखों में आँखे डालकर !!!... सीमा 'सदा'