निवेदन।


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बुधवार, 26 मई 2021

3040.. अनजानी सी दस्तक से ये दुनिया ही डरी है

सादर अभिवादन
जिनके पास अपने है
वो अपनों से झगड़ते हैं,
नहीं जिनका कोई अपना
वो अपनों को तरसते है..

आज की रचनाएँ देखें

तुम  बिन थम जाएगा  साथी ,
मधुर गीतों का ये सफर ;
रूँध  कंठ में  दम तोड़ देगें
आत्मा के स्वर प्रखर ;
बसना मेरी मुस्कान में नित  
ना संग आँसुओं के बहना तुम

रह-रह, कुछ उभरता है अन्दर,
शायद, तेरी ही कल्पनाओं का समुन्दर,
रह रह, उठता ज्वार,
सिमटती जाती, बन कर इक लहर,
हौले से कहती, पाँवों को छूकर,
एकाकी क्यूँ हो तुम!


इन नाजुक हाँथों से
जिस दिन कलम की तेज धार निकलेगी,
जिस दिन रिश्तों का लिहाज़ किये बिना,
खुल कर रूढ़िवादी विचारधारा पर प्रहार करेगी,
सराफत की नकाब ओढ़ कर बैठे हैं,
जितने सरीफजादे ,
उनके चेहरे बेनकाब करेगी!

हर रात मोबाइल पर देश- दुनिया की खबरें
सोशल मीडिया का चक्कर
यूट्यूब की सैर
इसी में रोज बदलती है तारीख़
और सुबह उठने में देरी-
इस लॉकडाउन में सुबह की
अदरक वाली चाय
मैं खुद ही बनाता हूं
उसके बाद दूध,
सब्जी वगैरह लाने
बाजार निकल जाता हूं


वो कहते हैं करो विश्वास अपने आप पर तुम
मगर जुड़ती नहीं चटकी, जो टूटी सी कड़ी है

किसी आहट पे आँखें ढूँढती हैं कोई अपना
पर अनजानी सी दस्तक से ये दुनिया ही डरी है



एक दिन अचानक  
मृत्यु ने दस्तक दी
कहा, चलो  
चौंक गया  यह क्या  
ना शोर, न शराबा  
ना विरोध, न प्रतिरोध
...
आज बस
सादर


मंगलवार, 25 मई 2021

3039....मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे

जय मां हाटेशवरी..... 
सादर नमन...... 
आज न जाने क्यों...... 
बाबा नागा अर्जुन जी की ये कविता याद आ गयी.....
नागार्जुन ने यह कविता आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी थी।

ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो
प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है
वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है
देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा
तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा

तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो
खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो

गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर
तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर
रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा
तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा

ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा
कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा
हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो
याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो

मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत
बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत
मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में
जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में

यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी
आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी
लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो
मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई
सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है 'इन्द्रा' माई
बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का
गोली ही पर्याय बन गई है राशन का

शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे
हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे
बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे
मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे


कोरोना जंग
सबक इस बंधनकाल नें
बहुत कुछ हमको सिखा दिया 
कैसे जीवन जीना है   
पाठ यह पढा़ दिया   
भूल चले थे   
जिन बातों को   
याद उन्हें दिला दिया ।

संबल
हर पल, आबद्ध रहा मन,
यूँ, मैं था, 
ज्यूँ, संग मेरे मेरा रब था! 
एकाकी, मैं कब था! 
कुछ यादें थी,
यूँ, मैं था,
ज्यूँ, संग मेरे मेरा रब था!

अमीरी की तुलना में गरीबी अधिक सुखद है
जहाँ एक ओर अमीरी मनुष्य के समस्त कार्यों का साधन है वहीँ वह कभी कभी उसके चरित्र का हनन भी करती है। अधिक धन प्राप्त करके व्यक्ति कभी कभी अभिमानी व चरित्रहीन बन जाता है। बिहारी कवि ने कहा भी है -  कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।  वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।  अर्थात स्वर्ण की चमक व्यक्ति को धतूरे से भी अधिक नशीला बना देती है। अमीरी के मद में मनुष्य अपने मित्रों सम्बन्धियों को भूल जाता है। शराब ,जुआ आदि गंदे व्यवसनों में पड़ जाता है। वह अपने स्तर से निम्न लोगों का सम्मान करना ही भूल जाता है। वह अपने जीवन में धन को सम्पूर्ण महत्व देने लगता है। उसके मन में दुनिया का सबसे बड़ा अमीर बनने की महत्वकांक्षा जागृत हो जाती है तो वह येन केन प्रकारेण अधिक से अधिक धन प्राप्त करने की पिपासा से ग्रसित होकर अपने मन की शांति सुख व चैन से रहित हो जाता है। 

घोषणाएं
कि सिर्फ़  घोषणाओं से 
पेट नहीं भरता  
घोषणाओं पर कर यक़ीन 
आम-आदमी है 
तिल-तिल मरता। 

ये जिंदगी पथ है मंजिल तरफ जाने का,        
जिंदगी गीत है तुफान से टकराने का,        
आराम से सो जाने की बदनामी है,        
जिंदगी गीत है मस्ती में सदा गाने का।।  

अपने जीवन काल में रेणु सौ के पार कहानियों की संख्या न पार कर सके। उपन्यास भी अंगुलियों पर गिनने जितने। फिर ऐसा कौन सा रहस्य है कि प्रेमचंद के बाद हिन्दी जगत के दूसरे शीर्षस्थ कथाशिल्पी। वह कारण है, अनुभूतियों का अलहदापन, शब्दों की अप्रत्याशित सोंधी गंध और चेहरों के समुद्र में गहनतः उतरने की आशिकी। रेणु चित्रकार हैं, तो बुनकर भी। रंगसाज है, धुन साधक भी, खेतिहर हैं तो माली भी। एक साथ कितनी भूमिकाओं में चोला बदल बदल कर आते हैं वे, कहना इतना आसान नहीं। विषय के साथ इंसानियत बरतने के सलीका ही रेणु ने बदल दिया। उनकी बुनावट में दर्शन की गूंजें कम सुनाई देंगी, यदि हैं भी तो बस यदा कदा उठ चली बयार की तरह। रेणु की कलम जड़ को निर्जीव मानती ही नहीं, वह समूचे गंवई अस्तित्व से संवाद करती है। शब्दों की पकड़ से परे का संवाद। सच कहिए तो संवाद का असल स्वरूप मौन के क्षणों में खिलता है, बाहर प्रकट होते ही स्थूल और आधारण रह जाता है। घटना, चरित्र, चेहरे और वस्तुएं रेणु के चुम्बकीय मानस में सजीवता लिए दिए जीवित होते हैं। 

इतना ही धन्यवाद।

सोमवार, 24 मई 2021

3038 ..........आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या !

 धुआँ धुआँ सी ,

ज़िन्दगी में 
सुलग रही ,
चिंगारियाँ।
पल पल 
ज़िन्दगी में 
बढ़ती जा रही 
दुश्वारियाँ ।
सुकूँ की तलाश में 
भटकता है 
इंसान दर  - बदर ..
न कोई ठौर है 
न ही ठिकाना 
सोचता हो जैसे 
कहाँ करूँ 
ज़िन्दगी बसर । 
उम्र बीतती है 
साथ आदमी 
बीतता जाता है 
चश्मे पुरनम में 
अश्कों का सैलाब 
उतर आता है । 
फंसता है कंठ में 
कुछ धुआँ सा 
जो अंदर ही 
घुट जाता है । 

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
संगीता स्वरुप  
23 - 5 - 2021 

नमस्कार .......  आज के माहौल में ऐसा ही कुछ कुछ सबका मन है .... .. मन नहीं लगता कहीं भी ... खुद को सँभालते हुए  कुछ प्रयास करते हैं लिखने पढ़ने का  लेकिन कह नहीं सकते कि  कितना पढ़ते हैं और कितना समझते हैं .....अब पढ़ने की बात चल ही पड़ी है तो  संदीप कुमार जी कह रहे हैं कि आदमी किताब में नींद खोजता है ....  देखिये ज़रा उनका फलसफा क्या कहता है .....

किताब में खोजता है एक अदद नींद




किताब के कुछ
पृष्ठ

जो मोड़ दिए

जाते हैं

अगली रात

पढ़ने के लिए।...


और ये कविता पढ़ जो मुझे लगा वो ये कि ......

कभी कभी इंसान इतना थक जाता है कि सोने के लिए ही किताबों का साथ ढूँढता है ...

किताबें पढ़ नए विचार मन में आते हैं .कुछ वैचारिक भूख बढ़ जाती है .... 
कई बार तो एक ही किताब को पढने से नए नए विचार सूझते जाते ...

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आप कितना ही विचार करें सही गलत को समझें , 

लेकिन क्या ज़रूरी है जो आपको सही लगता हो वही न्याय व्यवस्था भी समझे .... 

और क्या पता समझते सब हैं लेकिन एक होता है न रसूख ..... 
बस उसका क्या करें ....   
अलक नंदा सिंह जी का लेख  पढ़िए और सोचिये कि हम कैसी न्याय व्यवस्था पर विश्वास किये बैठे हैं .... 



 



ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र ने ब‍िल्‍कुल ठीक
कहा है कि-

   एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
   धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं
   रेत का हम लिबास पहने हैं
   और हवा के सफ़र पे निकले हैं।

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न्याय व्यवस्था हो या फिर जनता के लिए कोई व्यवस्था ....सब जगह हताशा - निराशा लिए लोग बस सोच रहे हैं और प्रयास कर रहे हैं अपनी बात औरों तक पहुंचाने की ... 
आज अचानक आनन्द पाठक जी के ब्लॉग तक जाना हुआ ..... ऐसा लगा कि कोई खजाना हाथ लग गया हो .... आप भी कुछ मोती चुन ही लीजियेगा .... आश्चर्य ये है कि ये २००७ से ब्लॉग की दुनिया में हैं और इनके गीत और ग़ज़लों से  अब तक हम सब महरूम रहे .... 





अब सियासत बस गालियाँ रह गईं

ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !

चोर भी सर उठा कर चले आ रहें

उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !




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और अब सब पढ़ते पढ़ाते जो हमेशा ही अपनी सोच से सकारात्मक रहे उनके लेखन में भी कहीं कहीं  निराशा  की सी भावना दिख रही है ...  प्रवीण पाण्डेय जी को बहुत समय से पढ़ रही हूँ और उनके उत्कृष्ट लेखन की कायल रही हूँ  .... निराशा में भी आशा तो दिख ही रही है ...आप भी पढ़ें 


दायित्वबोध







रहे अन्य कारण, विवशता प्रखर थी


नहीं कर सका, जो संजोया हृदय ने।


बड़ी चाह, ऊर्जा प्रयासों में ढाली,


नहीं स्वप्न वैसा पिरोया समय ने ।०।



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और आज  की  अंतिम  प्रस्तुति ......  कोरोना से लड़ाई ...... हौसला रहा बुलंद ....... किसी भी क्षण हार मन में न आई ..... . समय की नजाकत और अपनी  हिम्मत के साथ विवेक से परिस्थिति से जूझे .....  
एक संस्मरण जो कविता रावत जी ने साझा किया है जिसे लिखा है उनके श्रीमान जी ने .... 





कोरोना की मार झेलकर 10 दिन बाद हाॅस्पिटल से घर पहुंचा तो एक पल को ऐसे लगा जैसे मैंने दूसरी दुनिया में कदम रख लिए हों। गाड़ी से सारा सामान खुद ही उतारना पड़ा। घरवाले दूरे से ही देखते रहे, कोई पास नहीं आया तो एक पल को मन जरूर उदास हुआ लेकिन जैसे ही मेरे राॅकी की नजर मुझ पड़ी वह दौड़ता-हाँफता मेरे पास आकर मुझसे लिपट-झपट लोटपोट लगाने लगा तो मन को बड़ा सुकून पहुँचा, सोचा चलो कोई तो है जिसने हिम्मत दिखाकर आगे बढ़कर मेरा स्वागत किया। 



आज बस इतना ही अब विदा दीजिये ........... आशा है आपको हर रचना दिल के करीब महसूस होगी ..... 
अपनी प्रतिक्रिया से सूचित ज़रूर कीजियेगा ..... 
शुक्रिया 

आपकी ही 

संगीता स्वरुप 




रविवार, 23 मई 2021

3037 ...एक से हो गए हैं अब सप्ताह के सारे दिन

सादर अभिवादन
औषधि भी और चाय भी
7 जड़ी बूटियों वाला आरोग्य कसायम काढ़ा  
ये एक खास आयुर्वेदिक काढ़ा होता है,
जिसमें गुडूची, शुण्ठी, भूम्यामलकी, यष्टिमधु, मरिच, 
पिप्पली और हरीतकी जड़ी बूटियां होती हैं.
इन सब को सम भाग लेकर खलबत्ते में कूट कर
एक चम्मच एक गिलास पानी में
एक कप बचते तक उबाल लें
हर मर्ज की एक दवा


अब आज की रचनाएँ...

जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत के लिए, उसकी ठोस पहचान के लिए बनाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार डालने, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया

एक से हो गए हैं
अब सप्ताह के सारे दिन,
कोरोना ने छीन लिया है
इतवार से उसका ताज.

सीने पर हिमालय-सा बोझ
ओढ़ाने लगता है अवसाद की चादर
आंसू धोने लगते हैं
सुख के निशानों को
तब
उठाने लगते हैं सिर अनेक प्रश्न -
जीना अब किसके लिए
जीना अब क्यों




मैं सबकुछ छोड़कर
तुम्हारी हर
खता भूलकर
एक नई शुरुआत करती मैं
पर
जब मैंने मुड़कर देखा
तुम तो जा चुके थे
मैं इंतजार करती रह गई
रोक लेना था मुझे...
यह सुनने के लिए



कुछ दर्द तो होगा पर हमेशा नहीं रहेगा
याद रखो तुम्हारे भीतर का प्यार
किसी के प्रति समर्पण वह अब भी तुम्हारे पास है
वह भी तुम्हें खोज रहा है
जिसे तुम्हारे प्यार की तलाश है।

मुस्कुराओ और फिर से  निकल जाओ
अपनी तलाश में।
......
गुडूची- गिलोय, शुण्ठी....सोंठ, भूम्यामलकी..... भूमि आंवला
यष्टिमधु ...मुलहठी,  मरिच...काली मिर्च 
पिप्पली ....फरपीपर, और हरीतकी....हरड़
....
अब बस
कल दीदी आएगी
सादर



शनिवार, 22 मई 2021

3036... अकेला

   हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

विनोद कुमार


काढ़ा

विनोद कुमार 

हमारे पूर्वज कहते थे कि पीपल, बरगद, गूलर, नीम बेल के वृक्ष नही काटना चाहिए, इससे वंश का नाश होता हैं। यह कथन आज ऑक्सीजन की कमी से जूझते लोगो को देखकर सिद्ध हो रहा है।

जिन लोगों ने अभी तक इस वासा (अडूसा, बाकस) का उपयोग किया उन्होंने पहले से काफी राहत महसूस किया।  चूंकि हम इसे मंगवा कर पीड़ित लोगों के घर तक निःशुल्क पहुंचा रहे हैं तो इसके लिए उन लोगों ने हमें फोन करके धन्यवाद दिया। पर असली धन्यवाद के पात्र तो यह औषधि है, जो लोगों की कफ, खांसी और फेफड़ों की समस्या को दूर कर रहा है। खुशी हो रही कि बिहार के बाहर वाले कई लोगों ने इसकी माँग की। कल तक उनलोगों का भी पार्सल भेज दिया जाएगा। जिन्हें निःशुल्क चाहिए 9334821929 पर संपर्क करें।

हर इंसान अकेला  ही तो होता है,
अपने सुख-दुख का एहसास,
सिर्फ उसे ही तो होता है।
सुनते है सब,सहता तो वो ही है।
अपने हक़ में खुदा से कहता तो वो ही है।
हर एक की पीड़ा,
हर एक ही जानता है।
अपने अंदर ही बसे है ईश्वर,
ये बात हर कोई नहीं मानता हैं।
आज कुछ कमजोर हूँ, पर लाचार नहीं।
बेशक मुझे जल्दी है सपनों की, पर किसी गुनाह का मैं तलबगार नहीं।
रफ़्ता रफ़्ता ही सही , कभी तो आएगा वो खुशी का मन्ज़र।
अपनी ख्वाहिशों को समेटे, बस चलता जा रहा हूँ।
मैं अकेला हूँ और अकेला चला जा रहा हूँ।।
जीना किसी ने सिखाया तो नहीं
फिर भी खुद से खुश कैसे रहते हो?
ना गए कल की फिक्र करते देखा
ना आने वाले का अफसोस है
बताओ आज में मशगूल कैसे रहते हो?
अकेले रहना सीख गए हो
रोज रोज मेरा साथ देने के नाम पर तुम , 
कुछ देर मुझसे मिलने भी चली आती हो ;
फिर तुम ही बताओ क्यों तुम बार-बार , 
मुझे ऐसी दोहरी दुविधा में डाल जाती हो ;
यूँ रोज कल आने का बोल कर तुम मुझे ; 
क्यों रोज यूँ अकेला छोड़ जाती हो !
ये समझने के लिए चाहे जितने लोग भी आपके साथ क्यों न चल लें,
कुछ सफ़र आपको अकेले ही तय करने होते हैं।
सच कहूं तो अकेलापन उतना ही खूबसूरत है,
जितना किसी के साथ होना।
उतना ही पाक जितना मंदिर में जल रहा अकेला दिया।
उतना ही सुकून देने वाला जितना माँ का आँचल।

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शायद पुन: भेंट होगी...
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शुक्रवार, 21 मई 2021

3035...समानता के अधिकार का टूट रहा विश्वास

 शुक्रवारीय अंक में

आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
----- 
अपने आस-पास की कराह को अनसुना करना,
परिचित,अनजानी दर्द भरी सिसकियों पर निर्विकार रहना
मरघट में बदलती बस्तियों के मध्य अपने किले की सुरक्षा के लिए रात-दिन प्रार्थना करना सामयिक दौर में मृत्यु औपचारिक समाचार है,जीवन की जटिलता समझने का प्रयास व्यर्थ है ,अगर जीना है तटस्थ रहकर बस सकारात्मकता के मंत्र का जाप करना होगा...
सकारात्मक रहो, सकारात्मकता जरूरी है,जीने के लिए आस चाहिए,उम्मीद पर दुनिया कायम है,समय है रूकेगा थोड़ी गुज़र जायेगा।
क्या सचमुच सकारात्मकता की ओर अग्रसर है हम या स्व के खोल में सिमटे असंवेदनशीलता के नये युग की ओर बढ़ चुके हैं?
-------
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

हर क्षण संविधान के अनुच्छेद चौदह वाले 
समानता के अधिकार का टूट रहा विश्वास।
डाल से लटका आख़िरी पत्ता भी गिरा रहा, 
वो झोंका बंजारा-आवारा हवा का बिंदास।
अनमना मन  इस बारिश के बाद 
इंद्रधनुष को देखूं पर आसमान में काले बादल ही छंट नहीं रहे
सातों रंग अलग न होकर सफेद ही सफेद शेष है
हर तरफ गड़गड़ाहट के बीच चीत्कार गूंजती है
बाहर से न भीग कर भी अंदर तक भीगा है मन
और मैं ताक रही अनमनी सी...उन उम्रदराज शरीरों का मुस्कुराना 
उम्र के इस दौर में सहेजा जाता है 
थके और कमजोर से शरीर के मजबूत हो चुके विचारों में।
उम्र के इस दौर में सुबह अच्छी लगती है सच कि 

तुम्हारी लहराती चुन्नी में
रख रहा हूं सूरज
मुझे मालूम है
तुम फेर कर 
प्रेममयी उंगलियां
बस्तियों की हर चौखट पर
भेजती रहोगी 
सुबह का सवेरा  गुज़रा ज़माना 
वो आहों की गर्मी, वो ख्वाबों में बिखर जाना 
क्या याद नहीं तुमको, वो गुजरा ज़माना
आँखों ही आँखों में दिन यू गुज़रते थे
लब कुछ कहने को रुकते थे, सम्हलते थे।
-----///----
उपर्युक्त रचनाओं के सम्माननीय रचयिता
क्रमशः
एवं
------////----

गुरुवार, 20 मई 2021

3034...रात की सियाही को उजाले से जोड़ोगे कैसे...?

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनुपमा त्रिपाठी जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है। 

करोना की दूसरी लहर कमज़ोर पड़ती नज़र आ रही है अर्थात ग्राफ पीक (शीर्ष) से नीचे की ओर आया है जो सीधा नीचे नहीं आएगा बल्कि फ़्लैट होकर आगे कुछ महीनों तक चलता रहेगा। अतः सावधानियों में समझौता न करें। कोविड-19 नियमों का पालन करें।  

आइए पढ़ते सद्य प्रकाशित कुछ पसंदीदा रचनाएँ- 

पीले पत्तों सी परिणति...कुसुम कोठारी 


खेल खेलती विधना औचक

मानव बन कंदुक लुढ़के

गर्व टूटके बिखरा ऐसा

इक दूजे का मुंह तके।

मोम बनी है पिघली पीड़ा

ठंडी होकर ओस झरे।।


बारिश .....!!...अनुपमा त्रिपाठी 

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को
लिख भी डालो लेकिन
जब तलक सूर्योदय न हो ह्रदय का 
रात की सियाही को
उजाले से जोड़ोगे कैसे  .....?


जग मेले में आकर मिलते 

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते, 

इक दूजे का स्नेह पात्र बन 

बढ़ते, पलते, और पनपते !


इक झटके में गुम हो जाते 

मधुर याद बनकर रह जाते !


इतिहास में हम | कविता | डॉ शरद सिंह

क्यों नहीं खुल कर कोसते 
उनको भी
जो हैं हत्यारे मानवता के 
और बेचते हैं नकली इंग्जेक्शन
नकली दवाएं
नकली ऑक्सीजन
गिद्ध या हायेना से भी बदतर
नोंच-नोंच कर खाने वाले
जीवन की उम्मीदों को

नरभक्षी नहीं तो और क्या?


आँखों में आँखे डालकर !!!... सीमा 'सदा'



किसी उदास मन को 
एक मुस्कान देकर,  
दुआओं के कुछ बोल सौंप दो
 जिंदादिली से, देखना तुम 
गुज़र जाएगा ये वक़्त,
 तमाम मुश्किलों की 
आँखों मे आँखे डालकर !!!

*****
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 
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