सादर नमन......
आज न जाने क्यों......
कोरोना जंग
सबक इस बंधनकाल नें
बहुत कुछ हमको सिखा दिया
कैसे जीवन जीना है
पाठ यह पढा़ दिया
भूल चले थे
जिन बातों को
याद उन्हें दिला दिया ।
सबक इस बंधनकाल नें
बहुत कुछ हमको सिखा दिया
कैसे जीवन जीना है
पाठ यह पढा़ दिया
भूल चले थे
जिन बातों को
याद उन्हें दिला दिया ।
संबल
हर पल, आबद्ध रहा मन,
यूँ, मैं था,
हर पल, आबद्ध रहा मन,
यूँ, मैं था,
ज्यूँ, संग मेरे मेरा रब था!
एकाकी, मैं कब था!
कुछ यादें थी,
यूँ, मैं था,
ज्यूँ, संग मेरे मेरा रब था!
यूँ, मैं था,
ज्यूँ, संग मेरे मेरा रब था!
अमीरी की तुलना में गरीबी अधिक सुखद है
जहाँ एक ओर अमीरी मनुष्य के समस्त कार्यों का साधन है वहीँ वह कभी कभी उसके चरित्र का हनन भी करती है। अधिक धन प्राप्त करके व्यक्ति कभी कभी अभिमानी व चरित्रहीन बन जाता है। बिहारी कवि ने कहा भी है - कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।। अर्थात स्वर्ण की चमक व्यक्ति को धतूरे से भी अधिक नशीला बना देती है। अमीरी के मद में मनुष्य अपने मित्रों सम्बन्धियों को भूल जाता है। शराब ,जुआ आदि गंदे व्यवसनों में पड़ जाता है। वह अपने स्तर से निम्न लोगों का सम्मान करना ही भूल जाता है। वह अपने जीवन में धन को सम्पूर्ण महत्व देने लगता है। उसके मन में दुनिया का सबसे बड़ा अमीर बनने की महत्वकांक्षा जागृत हो जाती है तो वह येन केन प्रकारेण अधिक से अधिक धन प्राप्त करने की पिपासा से ग्रसित होकर अपने मन की शांति सुख व चैन से रहित हो जाता है।
घोषणाएं
कि सिर्फ़ घोषणाओं से
पेट नहीं भरता
घोषणाओं पर कर यक़ीन
आम-आदमी है
तिल-तिल मरता।
ये जिंदगी पथ है मंजिल तरफ जाने का,
जिंदगी गीत है तुफान से टकराने का,
आराम से सो जाने की बदनामी है,
जिंदगी गीत है मस्ती में सदा गाने का।।
अपने जीवन काल में रेणु सौ के पार कहानियों की संख्या न पार कर सके। उपन्यास भी अंगुलियों पर गिनने जितने। फिर ऐसा कौन सा रहस्य है कि प्रेमचंद के बाद हिन्दी
जगत के दूसरे शीर्षस्थ कथाशिल्पी। वह कारण है, अनुभूतियों का अलहदापन, शब्दों की अप्रत्याशित सोंधी गंध और चेहरों के समुद्र में गहनतः उतरने की आशिकी। रेणु
चित्रकार हैं, तो बुनकर भी। रंगसाज है, धुन साधक भी, खेतिहर हैं तो माली भी। एक साथ कितनी भूमिकाओं में चोला बदल बदल कर आते हैं वे, कहना इतना आसान नहीं। विषय
के साथ इंसानियत बरतने के सलीका ही रेणु ने बदल दिया। उनकी बुनावट में दर्शन की गूंजें कम सुनाई देंगी, यदि हैं भी तो बस यदा कदा उठ चली बयार की तरह। रेणु की
कलम जड़ को निर्जीव मानती ही नहीं, वह समूचे गंवई अस्तित्व से संवाद करती है। शब्दों की पकड़ से परे का संवाद। सच कहिए तो संवाद का असल स्वरूप मौन के क्षणों में
खिलता है, बाहर प्रकट होते ही स्थूल और आधारण रह जाता है। घटना, चरित्र, चेहरे और वस्तुएं रेणु के चुम्बकीय मानस में सजीवता लिए दिए जीवित होते हैं।
इतना ही
धन्यवाद।