धुआँ धुआँ सी ,
ज़िन्दगी में
सुलग रही ,
चिंगारियाँ।
पल पल
ज़िन्दगी में
बढ़ती जा रही
दुश्वारियाँ ।
सुकूँ की तलाश में
भटकता है
इंसान दर - बदर ..
न कोई ठौर है
न ही ठिकाना
सोचता हो जैसे
कहाँ करूँ
ज़िन्दगी बसर ।
उम्र बीतती है
साथ आदमी
बीतता जाता है
चश्मे पुरनम में
अश्कों का सैलाब
उतर आता है ।
फंसता है कंठ में
कुछ धुआँ सा
जो अंदर ही
घुट जाता है ।
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संगीता स्वरुप
23 - 5 - 2021
नमस्कार ....... आज के माहौल में ऐसा ही कुछ कुछ सबका मन है .... .. मन नहीं लगता कहीं भी ... खुद को सँभालते हुए कुछ प्रयास करते हैं लिखने पढ़ने का लेकिन कह नहीं सकते कि कितना पढ़ते हैं और कितना समझते हैं .....अब पढ़ने की बात चल ही पड़ी है तो संदीप कुमार जी कह रहे हैं कि आदमी किताब में नींद खोजता है .... देखिये ज़रा उनका फलसफा क्या कहता है .....
पृष्ठ
जो मोड़ दिए
जाते हैं
अगली रात
पढ़ने के लिए।...
और ये कविता पढ़ जो मुझे लगा वो ये कि ......
कभी कभी इंसान इतना थक जाता है कि सोने के लिए ही किताबों का साथ ढूँढता है ...
किताबें पढ़ नए विचार मन में आते हैं .कुछ वैचारिक भूख बढ़ जाती है ....
कई बार तो एक ही किताब को पढने से नए नए विचार सूझते जाते ...
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आप कितना ही विचार करें सही गलत को समझें ,
लेकिन क्या ज़रूरी है जो आपको सही लगता हो वही न्याय व्यवस्था भी समझे ....
और क्या पता समझते सब हैं लेकिन एक होता है न रसूख .....
बस उसका क्या करें ....
अलक नंदा सिंह जी का लेख पढ़िए और सोचिये कि हम कैसी न्याय व्यवस्था पर विश्वास किये बैठे हैं ....

ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र ने बिल्कुल ठीक
कहा है कि- एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं
रेत का हम लिबास पहने हैं
और हवा के सफ़र पे निकले हैं।
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न्याय व्यवस्था हो या फिर जनता के लिए कोई व्यवस्था ....सब जगह हताशा - निराशा लिए लोग बस सोच रहे हैं और प्रयास कर रहे हैं अपनी बात औरों तक पहुंचाने की ...
आज अचानक आनन्द पाठक जी के ब्लॉग तक जाना हुआ ..... ऐसा लगा कि कोई खजाना हाथ लग गया हो .... आप भी कुछ मोती चुन ही लीजियेगा .... आश्चर्य ये है कि ये २००७ से ब्लॉग की दुनिया में हैं और इनके गीत और ग़ज़लों से अब तक हम सब महरूम रहे ....
अब सियासत बस गालियाँ रह गईं
ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !
चोर भी सर उठा कर चले आ रहें
उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !
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और अब सब पढ़ते पढ़ाते जो हमेशा ही अपनी सोच से सकारात्मक रहे उनके लेखन में भी कहीं कहीं निराशा की सी भावना दिख रही है ... प्रवीण पाण्डेय जी को बहुत समय से पढ़ रही हूँ और उनके उत्कृष्ट लेखन की कायल रही हूँ .... निराशा में भी आशा तो दिख ही रही है ...आप भी पढ़ें
रहे अन्य कारण, विवशता प्रखर थी
नहीं कर सका, जो संजोया हृदय ने।
बड़ी चाह, ऊर्जा प्रयासों में ढाली,
नहीं स्वप्न वैसा पिरोया समय ने ।०।
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और आज की अंतिम प्रस्तुति ...... कोरोना से लड़ाई ...... हौसला रहा बुलंद ....... किसी भी क्षण हार मन में न आई ..... . समय की नजाकत और अपनी हिम्मत के साथ विवेक से परिस्थिति से जूझे .....
एक संस्मरण जो कविता रावत जी ने साझा किया है जिसे लिखा है उनके श्रीमान जी ने ....
कोरोना की मार झेलकर 10 दिन बाद हाॅस्पिटल से घर पहुंचा तो एक पल को ऐसे लगा जैसे मैंने दूसरी दुनिया में कदम रख लिए हों। गाड़ी से सारा सामान खुद ही उतारना पड़ा। घरवाले दूरे से ही देखते रहे, कोई पास नहीं आया तो एक पल को मन जरूर उदास हुआ लेकिन जैसे ही मेरे राॅकी की नजर मुझ पड़ी वह दौड़ता-हाँफता मेरे पास आकर मुझसे लिपट-झपट लोटपोट लगाने लगा तो मन को बड़ा सुकून पहुँचा, सोचा चलो कोई तो है जिसने हिम्मत दिखाकर आगे बढ़कर मेरा स्वागत किया।
आज बस इतना ही अब विदा दीजिये ........... आशा है आपको हर रचना दिल के करीब महसूस होगी .....
अपनी प्रतिक्रिया से सूचित ज़रूर कीजियेगा .....
शुक्रिया
आपकी ही
संगीता स्वरुप