सादर वन्दे...
मंगलवारीय प्रस्तुति बनानी है
सिर्फ दस ही मिनट है हमारे पास....
देर क्यों चलिए चलें...
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दर्द कितने भी हों दिल में,
मुस्कुराते रहिये!
अगर जो गिरा एक आंसू तो,
तमाशा हो जायेगा!!
पोंछने वाले कम मिलेंगे,
वजह पूछने वालों का
अंबार लग जायेगा.!!!
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पिता दिवस पर आज आपकी यादें लेकर
हुई लेखनी मौन बस आँखों से टपकती
वो बीता बचपन दूर कहीं यादों में झिलमिल
झलक आपकी बस माँ की आँखों में मिलती

एक कहावत है
''कौन पढ़ाये मूर्खों को कि
भाषा से साहित्य बनता है''
किन्तु ''साहित्य से ही
भाषा समृद्ध'' होती है,
और उन्हें तो कतई नहीं कि
जो भाषा, साहित्य, संस्कृति और
विचार के प्रति कहीं से भी गंभीर न हों
बद्दुआएं जुबाँ से ही नही दिल से भी निकल जाती हैं
दुखी ह्रदय के आँसूं भी बद्दुआ बन जाती है।
संघर्षों, मुसीबतों, परेशानियों से घबराना कैसा...
सितारे अंधेरों में ही चमकते हैं सोच के देखना ज़रा।।

मेरे घर के ड्राइंगरूम की
दक्षिणी दीवार
जो कभी थी मेरे लिए
'वॉल आफ फेम'
आज ढल गई है
यादों की दीवार में
मन को कुरेदते सूने संसार में।
नजदीकियों में, समाई हैं दूरियाँ,
पास रह कर भी कोई, दूर कितना यहाँ,
दूर कीजिए ना, दो दिलों की दूरियाँ,
यहाँ बन्दगी, कम हैं जरा!
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बस इज़ाज़त दें
बस इज़ाज़त दें


