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रविवार, 4 अक्टूबर 2026

4884...जीवन टूटा शहर बना...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नीरज कुमार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …

हवा सर्द मौसम के नश्तर हों जैसे,
खिली धूप जैसे के जाड़ों की मरहम.

चिनारों पे फ़ुर्क़त के लम्हे मिलेंगे,
सुलगते हैं यादों की सिगड़ी में तुम-हम.

*****

भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है

वही चेहरे, वही हँसी, वही बाल मन लेकर आओ लौट चलें उस सावन में,
जहाँ फिर से वही बचपन मुस्कुराएगा, कमला नेहरू के इस पावन प्रांगण में!
पचास-साठ के पार हुए पर, दिल बचपन में खोया है,
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
हाँ, यादों के उसी पुराने आँगन में, फिर से खो जाने का दिन आया है...

*****

फलक


मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ

महकते फूल सितारे दमकता चाँद

और खूब सारे हंसते खिलखिलाते

चेहरे मासूम बच्चों के…!!

*****

अना

वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे

तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?

 

कैसे होगी जीत बाज़ी की तब,

जब दाँव अपना बेमाना रखोगे !!

*****

सोचा था एक घर बना लूंगा...

न घर बना  ना असर बना ,

जीवन टूटा शहर बना I

****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


5 टिप्‍पणियां:

  1. कब तक ये झूठी सी अना रखोगे
    कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !!
    आभार
    सुंदर अंक आज का
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति में मेरी स्कूल की यादों को स्थान देने हेतु आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. बढ़िया अंक, बढ़िया प्रस्तुति !

    जवाब देंहटाएं

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