शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.अंजुल चौहान जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
मची खलबली जिस अभाव से
संग लिए उसको उर फिरता,
एक विचित्र खेल ज्यों चलता
स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता!
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मरुस्थल चुप था,
पर उसकी चुप्पी में
कुछ था
जो रेत नहीं थी।
ग़ुस्सा नहीं,
मरुस्थल की
गर्म साँसें थीं।
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हे पुरुष !
तुम नहीं पढ़ पाए
तो
सिर्फ और सिर्फ
स्त्री- मन
और
उसमें जन्मी असीम पीड़ा
जिस दिन हम हवा से बादल,
और बादल से बिजली बनेंगे ,
हम दिखाई भी देंगे ,
हम सुनाई भी देंगे I
तो तब तक बस इंतज़ार...
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सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
सुन्दर लिंक संयोजन
जवाब देंहटाएंस्थान देने के लिए धन्यवाद रवीन्द्र सर 🙏🙏
सुप्रभात! सराहनीय रचनाओं की खबर देते सूत्र, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु ह्रदय से आभार रवींद्र जी!
जवाब देंहटाएंबढ़िया संग्रह! बढ़िया प्रस्तुति !
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद सर मेरी कविता को मंच पर स्थान देने हेतु।
जवाब देंहटाएंसादर