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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

4888...हे पुरुष! तुम नहीं पढ़ पाए तो सिर्फ और सिर्फ स्त्री- मन...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.अंजुल चौहान जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मानो उसने चुरा लिया उर

मची खलबली जिस अभाव से

संग लिए उसको उर फिरता,

एक विचित्र खेल ज्यों चलता

स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता!

*****

आवाज़

मरुस्थल चुप था,

पर उसकी चुप्पी में

कुछ था

जो रेत नहीं थी।

 उठती आँधियाँ

ग़ुस्सा नहीं,

मरुस्थल की

गर्म साँसें थीं।

*****

1532 हे पुरुष!/डॉ.अंजुल चौहान 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए

तो

सिर्फ  और सिर्फ

स्त्री- मन

और

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

*****

तो तब तक बस इंतज़ार...

जिस दिन हम हवा से बादल,

और बादल से बिजली बनेंगे ,

हम दिखाई भी देंगे ,

हम सुनाई भी देंगे I

तो तब तक बस इंतज़ार...

*****


अवसरवादी-एक लघु कथा

"वकील झूठ बोलते हैं" कहने वाले लाला जी को जब एक सिविल केस में कोर्ट में जाना पड़ा तो अपने वकील की दलीलों पर अपने वकील से हाथ मिलाते हुए बोले "NICE"

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर लिंक संयोजन
    स्थान देने के लिए धन्यवाद रवीन्द्र सर 🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात! सराहनीय रचनाओं की खबर देते सूत्र, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु ह्रदय से आभार रवींद्र जी!

    जवाब देंहटाएं
  3. बढ़िया संग्रह! बढ़िया प्रस्तुति !

    जवाब देंहटाएं
  4. हार्दिक धन्यवाद सर मेरी कविता को मंच पर स्थान देने हेतु।
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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