निवेदन।


फ़ॉलोअर

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

4887..बह रही हर नाव..

।।भोर वंदन।।

 "लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से

बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से

आदत न रही कुछ लिखने की

निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से

कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम.."

गोपाल सिंह नेपाली

नजर डालें आज की प्रस्तुति पर..✍️

बिडम्बना

टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को 

काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को 

बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को 

मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll

✨️

वो शहर "



तूफ़ान सुबहों में भरा हर रात में बहाव है

दरार सीने में लिए बह रही हर नाव है

गांव की नींदों में हरदम शहर के सपने रहे

शहर की आँखों में अब बस जागता एक गाँव है

✨️

खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,

वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।

इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,

अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।

✨️

जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का

ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगते दवा उसे अपने मर्ज़ का

कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से

जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे ग़ज़ल बज़्म में मर्म का,..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️


2 टिप्‍पणियां:

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...