निवेदन।


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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

4900 ..ये किसकी आहट पर दरवाज़े ने सिसकी ली है

 सादर अभिवादन

आज दशहरा है

रचनाएं देखें




जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं 
तीनों गुणों को करें सक्रिय, 
घोर विनाश की महारात्रि 
भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !

 


ये किसकी आहट पर दरवाज़े ने सिसकी ली है 
ये किसकी याद ने आज फिर हिचकी ली है 

कितनी बरसियाँ मना लीं ग़म की 
गाहे-बगाहे फिर हवाओं ने दस्तक दी है 






सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कन्वर्जन के बाद आरक्षण के लाभ पर रोक लगाने का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा करने वाला एक अत्यंत आवश्यक कदम है। मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए और तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई मत अपना लेता है, तो वह अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद-16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायालय की यह टिप्पणी पूरी तरह से तार्किक और वस्तुनिष्ठ है





स्तन  की  गांठ  या  मन  की गाँठ 
सौंदर्य  लुप्त  होती  गाँठ
बंधे  दृष्टिकोण  में   कसी  गई  गाँठ  
एक  उपेक्षा  में  धँसी पहचान  खोती अधूरी गांठ 
स्तन से  बाह्य  रिश्ते  में  उभरती  गाँठ 
जब  अपनापन  अवहेलित  कर  देता  है  
 





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सादर समर्पित
वंदन

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

4899 ...आरती के धुएं से नहीं होती दूषित हवा

 सादर अभिवादन

नेपाल का प्रमुख अवकाश
सार्वजनिक बिदाहरू
हमारे यहां भी कन्या पूजन के उपरांत
नौ देवियां को उपहार आदि देकर विदा करते हैं


और छःमास उपरांत फिर से आने का  न्योता देते हैं

 


बज़ रहे हैं ढोल ढाक 
नाच रहे हैं पुरुष 
नाच रही हैं स्त्रियां 
 नाच रहे हैं बच्चे 
आरती के धुएं से 
नहीं  होती दूषित हवा 





ये सब तब से है
जब से
अदालत ने साबित कर दिया—

मछलियों की मौत
पानी में डूबने से हुई है।





लाला जी की अनोखी सीख
अपनी स्थिति देखनी चाहिए. 

तुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. 






हर पत्थर पहाड़ से टूट कर नीचे गिरता जा रहा था। इस बात का गवाह बनने के लिए पहाड़ ने भी मुझे बुलाया था।  तुम ही सोचो कि बिछड़ने का दृश्य देखने की हिम्मत करने के लिए मैंने दिल पर कितने पत्थर रखे होंगे। इन सब घटनाओं के बाद बदलाव यह हुआ कि मुझे काँटा होने का ख़िताब मिला, तुम्हें लोग अब भी गुलाब कहते हैं। बेवफाई का जहर मैंने पीया और प्रेम में अमर तुम हो गई।




ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्षियों का आरोप है कि मतदाताओं के नाम हटने का लाभ भाजपा को मिला है; उसको वोट न देने वालों के नाम काटे गए हैं. इस हास्यास्पद आरोप पर विपक्षी दल स्वयं ही बता पा रहे कि वे किस आधार पर दावा कर रहे कि भाजपा को वोट न देने वालों के ही नाम काटे गए हैं. क्या विपक्ष के पास ऐसे आँकड़े हैं? इस बात को विपक्षी दलों द्वारा उठाये जाने का आधार वे अवैध नागरिक हैं जिनका नाम मतदाता सूची से हटाया गया है. देश का संविधान भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्रदान करता है. विदेशी नागरिक, वे चाहे किसी भी देश के क्यों न हों, भारत में निवास करने के कारण भारतीय मतदाता नहीं हो सकते. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि विगत वर्षों में रोहिंग्या, बांग्लादेशी शरणार्थियों के नाम पर अवैध नागरिकों की संख्या देश में बढ़ी है. यदि ऐसे लोगों का किसी भी तरीके से मतदाता सूची में नाम अंकित हो गया था और जाँच के बाद यह सत्यापित होने पर उनके नाम को हटाया जाना वोट चोरी कैसे हो गया?





सफेद, सफेद ना रहे 
नीला, नीला ना रहे 
लाल, लाल ना रहे 
पीला, पीला ना रहे 
कुछ इधर से उधर हो 
कुछ उधर से इधर हो 
लेकिन अब 
कपड़े रंग छोड़ते नहीं 


सादर समर्पित
वंदन

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

4898...किसी हजूर को बना भी दिया जाएगा हजूरे आला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।

सादर अभिवादन

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

किसलिए रट लगाए है बैठा है ये भी लिख दो और वो भी लिख दो

पूंछ मोटी होना शुरू हो गई बाल खड़े हो जाएंगे

साहिब के साहिबान पर लिख दो

शर्म नहीं आएगी जरा भी

बलात्कार की खबर सुबह से लेकर शाम लिख दो

किसी हजूर को बना भी दिया जाएगा हजूरे आला

क्या उखाड़ लोगे आला कमान लिख दो

*****

1231 सेदोका / विचित्र वक़्त 

मिटी उम्मीद

अमावस की रात

नहीं बीतती,

कोई तो हो उपाय

नन्हा दीया जलाएँ।

*****

तिनकों का आशियाना

कद्र चीज़ों की नहीं, उन्हें परखने वाली नज़र की होती है,
वरना महलों में भी लोग तन्हाइयों में रह जाते हैं।

*****

साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण

चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। उसी दौर में 'हमकदम' (१९८०) जैसी सार्थक फ़िल्म भी बनी जो नारी के नौकरी करने के विषय पर आधारित थी। नब्बे के दशक तक जब भारतीय दर्शक समुदाय की मानसिकता पुरुष-प्रधान समाज वाली थी तो फ़िल्मों में प्रायः नारियों को ही झुकते हुए दिखाया जाता था लेकिन जब नारी-सशक्तिकरण का दौर आया तो 'अस्तित्व' (२०००) तथा 'थप्पड़' (२०२०) जैसी फ़िल्में भी बनीं। आज के दौर के सिनेमा की नायिका के परिधान, हाव-भाव, शारीरिक व्यवहार और मानसिकता; सभी कुछ समाज में आए परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तित हो चुके हैं।

*****

डर

हमारे ये मित्र झुमरी तल्लैय्या बैंक से दस साल पहले बतौर जनरल मैनेजर रिटायर हो चुके हैं। सिर के बाल उड़ चुके हैं पर पांच सात सफ़ेद बालों का गुच्छा अभी मौजूद है। इन पांच सात बालों को हमारे साब ने बड़े जतन से संभाल कर रखा हुआ है। पंखे की हवा में जब भी ये लहराते हैं तो तो उन्हें अपनी जवानी याद आ जाती है! आँखों पर मोटा चश्मा है और शरीर गोल मटोल है - बियर के शौक़ीन रहे हैं अपने जमाने में। 

***** 

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव 

 


शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

4897..इन्वेस्टमेंट कुछ समय तक..

 ।।भोर वंदन।।

 शुभ शनिवार  माँ दुर्गा केवल शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, करुणा और धर्म की साक्षात प्रेरणा हैं।🙏नवरात्र पर्व की शुभेच्क्षा के साथ आनंद लिजिए रचनाओ के साथ✍️

अच्छा जी

 नई टाउनशिप आ गयी है यहाँ भैय्या | प्लॉटिंग चल रही | 

"अच्छा जी "

तगड़ा मुआवजा मिला है इन गाँवों में | 

"अच्छा जी"

किया हुआ मुआवजे का ?

इन्वेस्टमेंट , शहर में प्लाट ले लिए | अपार्टमेंट ले लिए | 

अच्छा जी 

मतलब गांव की जमीन बेच कर शहर में प्लाट ले लिए ?

हाँ , ग्रोथ ज्यादा है 

फिर धरा भी क्या है खेता में ? 

खाएंगे क्या ? प्लाट ?

प्लाट क्यों , नौकरी 

क्या बनेंगे , आर्किटेक्ट ?

✨️

नदी  चली थी समन्दर से मिलने

कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचानक कोई अनजाना, अनदेखा सा ख़्वाब टकरा जाता है। उसे देख अचकचाती हूँ। विस्मय से पूछती हूँ, 'तुम कौन? क्या तुम राह भटक गए हो?' वो मुस्कुराकर, सर पर हाथ फिराते हुए बोलता है 'अरी पगली, राह नहीं भटका, तेरा ही ख़्वाब हूँ। उन तमाम ख़्वाबों में से एक जिन्हें देखने से डरती ही रही तुम। आओ न, चलो, मेरे साथ।' ना-नुकुर करती हूँ लेकिन कोई सम्मोहन खींचता है।  ..

✨️

प्रेम 

प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !

जो कभी एक बीज था 

अपने आप में सिमटा 

ऊर्जा भीतर छिपाये 

 मिटकर बीज ही 

एक दिन फूल उगाये..

✨️

बालगीत: बारिश आई खुशियाँ लाई

मेढक बोला टर्र टर्र टर्र

बारिश का मौसम है सर

बोर हो गया हूँ पढ़-पढ़कर

जल्दी से अब छुट्टी कर..

✨️

खुल कर जियो आज में ज़िन्दगी

भवजाल के जंजाल में ना फंस पिस जाए नौजवानी 

छोटी सी ज़िन्दगी है मौज-मस्ती में बिताएं जिंदगानी 

चार दिन हैं उम्र के ज़िन्दा-दिली ज़िंदगी के नाम कर 

बेफिक्र हो ये ज़िंदगी का सफ़र सुबह-शाम में रवानी ।

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

4896 ...वृंदावन गोकुल का ग्वाला कनेर कुण्डल वाला

सादर अभिवादन

हमारा नवरात तो प्रतिपदा से शुरु होता है

पर पश्चिम बंगाल नें उत्सव छठी से प्रारंभ होता है, 
तदनुसार आज छठ है, जिसे वहां महा षष्ठी कहते हैं

अब देखिए रचनाएं

नया ब्लॉग पहली बार


आजिमला शिव मंदिर  के लिए जहां शिव जी गंगाधरेश्वर की विशालतम प्रतिमा में विराजमान है
दीप जलाकर दीप दान किया। प्रसाद लिया और गुड़ की खीर का एक टीन पैक्ड प्रसाद भी घर के लिए लिया। अंदर विभिन्न देवी देवताओं की कलाकृतियाँ हैं।
हम रेस्टोरेंट मैँ ब्रेकफ़ास्ट के लिए आगए, स्वादिस्ट नाश्ते में साउथ इंडियन के साथ साथ नोर्थे इंडियन पूरी सब्जी, फ्रूट्स, जूस, लाजवाब , लजीज और बाहर समंदर का दिलकश नजारा और खुला नीला आसमान दोनों एक होते हुये , कोवलम बिच 





फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में गुजराती खाने को लेकर करीना कपूर का एक डायलॉग बड़ा चर्चित हुआ था- “तुम्हारे खाने के नाम ऐसे होते हैं जैसे कोई मिसाइल फटने वाली हो... ढोकला, फाफड़ा, हांडवा, थेपला... ऐसा लगता है जैसे कोई बम ब्लास्ट होने वाला है!"...शायद करीना या इस फिल्म के संवाद लेखक का कभी हिमाचली खानपान से सामना नहीं हुआ होगा वरना वे गुजरात की बजाए हिमाचल की पृष्ठभूमि को फिल्म में रखते। 





बंसी   का  स्वर   मधुर  प्यारा
विहान   का   नीलांबर  पीलाभ   को   समेटे
चुपचाप   आ   जाता  गोधूलि   की  धूल  उड़ाता
वृंदावन  गोकुल का ग्वाला  कनेर  कुण्डल  वाला







तभी दरवाज़े पर जमादारनी आ खड़ी हुई ! 
“बीबी जी, कुछ हो बचा खुचा तो दे दो मुझे भी आज तो बच्चों के मुँह में दाना भी नहीं गया है ! बड़ी आस लेकर आई हूँ !” 
शालिनी की त्योरियाँ चढ़ गईं, “देख नहीं रही हो मेहमान आये हैं घर में ! देवी को न देवता को नकटा भूत को पहले दे दो ! जाओ अभी ! सुबह आना तब देखेंगे !” 
अपूर्वा हतप्रभ हो उठी थी ! उसने आवाज़ देकर रोका जमादारनी को ! 
“रुको अम्माँ !” तीखी नज़रों से शालिनी को घूरते हुए मेज़ पर रखे सारे बचे हुए पकवान उसने एक थैली में डाल कर जमादारनी को दे दिए ! 






सादर समर्पित
वंदन

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

4895...कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी की नहीं कोई कहानी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

871. सीमाएं

जो मैं कर पाया,

वह बहुत अच्छा था,

पर जो कर नहीं पाया,

उसको कर न पाने से

मैं उदास रहता हूँ।

*****

अहंकार का भोजन दुख है

नहीं सरल समर्पण की राह

पीड़ा से होकर जाती है,

पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा

दुनिया सुखमय हो जाती है!

*****

जादुई झोला

नियति उसे

डाँटती-फटकारती है।

एक उम्र तक

दोनों खूब झगड़ते हैं।

फिर

एक दिन

कवि झोले में हाथ डालता है।

*****

खुल कर जियो आज में ज़िन्दगी

कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी की नहीं कोई कहानी

धुवें के छल्ले की तरह उड़ा दें हंस के सारी परेशानी

ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा देते ठोकरों से सावधानी

अपनी मौज में रह सीखें सलीका जीने का आसानी।

*****

व्यक्ति पूजा

व्यक्ति पूजा का जैसा हाल वर्तमान में है, वैसा शायद ही कभी रहा हो ! आज अधिकांश लोग किसी के भी नाम, दाम या व्यक्तित्व के मायाजाल में फंस कर उसके मुरीद बन जाते हैं ! उन्हें सामने वाले की मानसिकता, उसकी नैतिकता, उसके चरित्र से कोई मतलब नहीं होता, उनके लिए अपने आदर्श के मुख से निकली बात ही ब्रह्म-वाक्य होती है !  ये लोग उसके विरुद्ध कोई सच्ची बात भी सुनना भी गवारा नहीं करते ! इतना ही नहीं अपने अगड़े का प्रतिद्वंद्वी उन्हें दुश्मन सरीखा नजर आने लगता है। यह बात आज चहूं ओर नजर आ रही है ! 

  *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

4894 ..नौ दिन माँ के नाम और दसवां दिन विजयादशमी

 सादर अभिवादन


नवरात्रि , नवरात्रि , नवरात्रि , नवरात्रि 
नौ दिन माँ के नाम
और दसवां दिन 
विजयादशमी
सिर्फ नै दिन क्यों ,
सारी उमर माँ के नाम ही तो है
और फिर दीपावली
फिर साल खतम

देखिए रचनाएं...

आज पम्मी जी को आना को आना था
नहीं आई तो...क्या हुआ
हम और आप हैं न
ओह आह क्यों ...




आज एक  बूंद ओस मिली है,
प्यासे को बस बरबस मिली है I 
आज शाख पे कली खिली है,
आज राख में रौशनी मिली है I




हमसे मत पूछो कैसे चलता है आंदोलन सब का
वोटों की बात नहीं है ये किस्सा है हसरत का
जिन्हें काम है काज है करना वो न भीड़ लगाए
जो भीड़ को आग में झोंके उन्हें कौन जिताए





खिलाड़ी को पहली बार अपनी हार का अंदेशा होने लगा। उसने अपने गुंडों को रास्ते में तैनात कर दिया। प्रतिद्वंद्वी जिस विमान से आ रहा था, लैंड होते ही उसे घेर लिया गया और एक गुप्त स्थान पर पहुँचा दिया गया।

निर्धारित समय पर प्रतियोगिता शुरू हुई। प्रतिद्वंद्वी का स्थान खाली था। खिलाड़ी ने स्वायंभू ढंग से खुद को विजेता घोषित कर दिया। उसके पाले हुए लोग तालियाँ बजाने लगे और उसकी 'अजेय छवि' का गुणगान करने लगे।








सादर समर्पित
वंदन

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

4893....जग के भीषण कोलाहल में...

मंगलवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
------------

देवी का आह्वान करने से तात्पर्य  मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं, अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।



व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करना और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों अर्थात् रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कु-वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं अध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।


आज की रचनाऍं- 

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।
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