सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
4900 ..ये किसकी आहट पर दरवाज़े ने सिसकी ली है
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
4899 ...आरती के धुएं से नहीं होती दूषित हवा
सादर अभिवादन
हमारे यहां भी कन्या पूजन के उपरांत
नौ देवियां को उपहार आदि देकर विदा करते हैं
रविवार, 18 अक्टूबर 2026
4898...किसी हजूर को बना भी दिया जाएगा हजूरे आला...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।
सादर अभिवादन
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
किसलिए रट लगाए है बैठा है ये भी लिख दो और वो भी लिख
दो
पूंछ मोटी होना शुरू हो गई
बाल खड़े हो जाएंगे
साहिब के साहिबान पर लिख
दो
शर्म नहीं आएगी जरा भी
बलात्कार की खबर सुबह से
लेकर शाम लिख दो
किसी हजूर को बना भी दिया
जाएगा हजूरे आला
क्या उखाड़ लोगे आला कमान
लिख दो
*****
मिटी उम्मीद
अमावस की रात
नहीं बीतती,
कोई तो हो उपाय
नन्हा दीया जलाएँ।
*****
कद्र चीज़ों की नहीं, उन्हें परखने वाली नज़र की होती है,
वरना महलों में भी लोग तन्हाइयों में रह जाते हैं।
साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण
चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। उसी दौर में 'हमकदम' (१९८०) जैसी सार्थक फ़िल्म भी बनी जो नारी के नौकरी करने के विषय पर आधारित थी। नब्बे के दशक तक जब भारतीय दर्शक समुदाय की मानसिकता पुरुष-प्रधान समाज वाली थी तो फ़िल्मों में प्रायः नारियों को ही झुकते हुए दिखाया जाता था लेकिन जब नारी-सशक्तिकरण का दौर आया तो 'अस्तित्व' (२०००) तथा 'थप्पड़' (२०२०) जैसी फ़िल्में भी बनीं। आज के दौर के सिनेमा की नायिका के परिधान, हाव-भाव, शारीरिक व्यवहार और मानसिकता; सभी कुछ समाज में आए परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तित हो चुके हैं।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
4897..इन्वेस्टमेंट कुछ समय तक..
।।भोर वंदन।।
शुभ शनिवार माँ दुर्गा केवल शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, करुणा और धर्म की साक्षात प्रेरणा हैं।🙏नवरात्र पर्व की शुभेच्क्षा के साथ आनंद लिजिए रचनाओ के साथ✍️
नई टाउनशिप आ गयी है यहाँ भैय्या | प्लॉटिंग चल रही |
"अच्छा जी "
तगड़ा मुआवजा मिला है इन गाँवों में |
"अच्छा जी"
किया हुआ मुआवजे का ?
इन्वेस्टमेंट , शहर में प्लाट ले लिए | अपार्टमेंट ले लिए |
अच्छा जी
मतलब गांव की जमीन बेच कर शहर में प्लाट ले लिए ?
हाँ , ग्रोथ ज्यादा है
फिर धरा भी क्या है खेता में ?
खाएंगे क्या ? प्लाट ?
प्लाट क्यों , नौकरी
क्या बनेंगे , आर्किटेक्ट ?
✨️
कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचानक कोई अनजाना, अनदेखा सा ख़्वाब टकरा जाता है। उसे देख अचकचाती हूँ। विस्मय से पूछती हूँ, 'तुम कौन? क्या तुम राह भटक गए हो?' वो मुस्कुराकर, सर पर हाथ फिराते हुए बोलता है 'अरी पगली, राह नहीं भटका, तेरा ही ख़्वाब हूँ। उन तमाम ख़्वाबों में से एक जिन्हें देखने से डरती ही रही तुम। आओ न, चलो, मेरे साथ।' ना-नुकुर करती हूँ लेकिन कोई सम्मोहन खींचता है। ..
✨️
प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !
जो कभी एक बीज था
अपने आप में सिमटा
ऊर्जा भीतर छिपाये
मिटकर बीज ही
एक दिन फूल उगाये..
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मेढक बोला टर्र टर्र टर्र
बारिश का मौसम है सर
बोर हो गया हूँ पढ़-पढ़कर
जल्दी से अब छुट्टी कर..
✨️
भवजाल के जंजाल में ना फंस पिस जाए नौजवानी
छोटी सी ज़िन्दगी है मौज-मस्ती में बिताएं जिंदगानी
चार दिन हैं उम्र के ज़िन्दा-दिली ज़िंदगी के नाम कर
बेफिक्र हो ये ज़िंदगी का सफ़र सुबह-शाम में रवानी ।
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पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
4896 ...वृंदावन गोकुल का ग्वाला कनेर कुण्डल वाला
सादर अभिवादन
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
4895...कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी की नहीं कोई कहानी...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
जो मैं कर पाया,
वह बहुत अच्छा था,
पर जो कर नहीं पाया,
उसको कर न पाने से
मैं उदास रहता हूँ।
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नहीं सरल समर्पण की राह
पीड़ा से होकर जाती है,
पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा
दुनिया सुखमय हो जाती है!
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नियति उसे
डाँटती-फटकारती है।
एक उम्र तक
दोनों खूब झगड़ते हैं।
फिर
एक दिन
कवि झोले में हाथ डालता है।
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कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी
की नहीं कोई कहानी
धुवें के छल्ले की तरह उड़ा
दें हंस के सारी परेशानी
ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा
देते ठोकरों से सावधानी
अपनी मौज में रह सीखें सलीका
जीने का आसानी।
*****
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
4894 ..नौ दिन माँ के नाम और दसवां दिन विजयादशमी
सादर अभिवादन
सिर्फ नै दिन क्यों ,
सारी उमर माँ के नाम ही तो है
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
4893....जग के भीषण कोलाहल में...
देवी का आह्वान करने से तात्पर्य मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं, अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।
व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करना और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों अर्थात् रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कु-वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं अध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।






































